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तेल के बदले एथेनॉल : समाधान जब समस्या बन जाए? ...

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  • निलेश देसाई
विकास का वास्तविक अर्थ केवल आर्थिक वृद्धि या आयात बिल में कमी नहीं है। विकास वह है जो प्रकृति, समाज और अर्थव्यवस्था के बीच संतुलन स्थापित करे। इतिहास हमें बार-बार चेतावनी देता रहा है कि तात्कालिक लाभ के लिए बनाए गए समाधान, यदि समग्र दृष्टि के बिना लागू किए जाएं, तो गंभीर संकट का रूप ले सकते हैं।  
पश्चिम एशिया में जारी युद्ध, वैश्विक अस्थिरता और बढ़ती ऊर्जा आवश्यकताओं ने दुनिया को एक बार फिर ऊर्जा संकट के मुहाने पर खड़ा कर दिया है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ रहे दबाव के बीच भारत में इन दिनों 'एथेनॉल ब्लेंडिंग' (पेट्रोल में एथेनॉल का मिश्रण) को ऊर्जा सुरक्षा के एक बड़े समाधान के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। सरकार ने 2025-26 तक पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है।  




गन्ना, मक्का, चावल जैसी स्टार्च वाली फसलों से बनाया जाने वाला 'एथिल अल्कोहल' या एथेनाल पहली दृष्टि में देश की ऊर्जा आत्मनिर्भरता, आयातित तेल पर निर्भरता में कमी और कार्बन उत्सर्जन घटाने की दिशा में एक सकारात्मक कदम प्रतीत होता है। प्रश्न यह है कि क्या हम तेल आयात का बिल कम करने की जल्दबाजी में अपनी आने वाली पीढ़ियों का पानी, भूमि और खाद्य-सुरक्षा दांव पर लगा रहे हैं?  
इतिहास की चेतावनी-मौजूदा विकास के इतिहास को देखें तो पता चलता है कि जब भी किसी तात्कालिक संकट के समाधान के लिए जल्दबाजी में कोई नीति लागू की गई, वह कुछ समय बाद स्वयं एक बड़े संकट का कारण बन गई। आज एथेनॉल के संदर्भ में भी हमें इसी ऐतिहासिक अनुभव से सीखने की आवश्यकता है। स्वतंत्र भारत के इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जहां तत्कालीन समस्याओं के समाधान ने भविष्य के लिए नई चुनौतियों को जन्म दिया।  




'हरित क्रांति'-साठ और सत्तर के दशक में देश खाद्यान्न संकट से जूझ रहा था। रासायनिक उर्वरकों, संकर बीजों और अत्यधिक सिंचाई पर आधारित 'हरित क्रांति' ने तत्कालीन भूख की समस्या का समाधान किया और भारत को खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाया, किंतु आज वही मॉडल मिट्टी की उर्वरता में गिरावट, जैव-विविधता के क्षरण, रासायनिक प्रदूषण और भूजल-दोहन जैसी गंभीर समस्याओं का कारण बन चुका है। पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में भूजल स्तर चिंताजनक रूप से नीचे जा चुका है।  




नलकूप क्रांति-किसानों को मानसून की अनिश्चितता से बचाने के लिए नलकूपों और भूजल आधारित सिंचाई को प्रोत्साहित किया गया। कुछ दशकों बाद स्थिति यह है कि भारत विश्व में भूजल का सबसे बड़ा दोहनकर्ता बन गया है और अनेक क्षेत्र 'डार्क ज़ोनÓ घोषित किए जा चुके हैं। आज एथेनॉल नीति के संदर्भ में भी यही प्रश्न हमारे सामने खड़ा है। क्या हम ऊर्जा सुरक्षा की खोज में जल-सुरक्षा और खाद्य-सुरक्षा को खतरे में डाल रहे हैं?  
आंकड़ों के पीछे छिपा जल संकट-भारत में वर्तमान में मुख्यत: 'पहली पीढ़ी' (1जी) के एथेनॉल उत्पादन के लिए गन्ना, चावल और 'जीएम' (जीनेटिकली मॉडीफाइड) मक्का जैसी खाद्य फसलों का उपयोग किया जा रहा है। ये फसलें अत्यधिक पानी की मांग करती हैं।  




एक लीटर चावल आधारित एथेनॉल उत्पादन के लिए लगभग 10,790 लीटर पानी की आवश्यकता होती है।  
एक लीटर गन्ना आधारित एथेनॉल के लिए लगभग 3,630 लीटर पानी खर्च होता है।  
एक लीटर 'जीएम' मक्का आधारित एथेनॉल के लिए लगभग 4,670 लीटर पानी की आवश्यकता पड़ती है।  
भारत के अनेक राज्य पहले से ही जल संकट का सामना कर रहे हैं। महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश के कई क्षेत्रों में गर्मियों के दौरान पेयजल तक का संकट खड़ा हो जाता है। ऐसे में ज्यादा पानी वाली फसलों को ईंधन उत्पादन के लिए बढ़ावा देना दीर्घकालिक दृष्टि से गंभीर चिंता का विषय है।  

खेती की विविधता का क्षरण-भारत के लगभग 86 प्रतिशत किसान छोटे और सीमांत हैं। इनके पास दो हेक्टेयर से कम भूमि है जिस पर वे अपने भोजन एवं अन्य जरूरत की फसलें लेते हैं। एथेनॉल उद्योग की बढ़ती मांग और बाजार के आकर्षण ने खेती के इस स्वरूप में तेजी से बदलाव लाना शुरू कर दिया है। परंपरागत रूप से किसान अनाज, दालें, तिलहन, सब्जियां और पशुपालन को एकीकृत रूप से अपनाता था। इससे खाद्य-सुरक्षा सुनिश्चित होती थी। आज नकदी फसलों और एकल खेती के विस्तार के कारण किसान स्वयं अपने भोजन के लिए बाजार पर निर्भर होता जा रहा है।  

'बीज संप्रभुता' का संकट-देशी बीजों की परंपरा लगातार कमजोर हो रही है। किसान अब बाजार आधारित संकर बीजों, रासायनिक उर्वरकों और बाहरी आदानों पर अधिक निर्भर होता जा रहा है। इससे खेती की लागत बढ़ती है और किसानों की ऋणग्रस्तता गहराती है।  
ग्रामीण समाज में 'अड़जी-पड़जी' जैसी परंपराएं, जिसमें लोग एक-दूसरे के खेतों में श्रमदान करते थे, धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही हैं। यंत्रीकरण और व्यावसायिक खेती ने सामुदायिक संबंधों को कमजोर किया है।  

भोजन बनाम ईंधन-एथेनॉल नीति का सबसे गंभीर प्रश्न 'भोजन बनाम ईंधन' का है। जब उपजाऊ भूमि और खाद्य फसलें वाहनों के लिए ईंधन उत्पादन में लगाई जाएंगी, तो खाद्य-सुरक्षा पर दबाव बढ़ना स्वाभाविक है। यदि किसान अधिक लाभ के कारण दालों और तिलहनों की खेती छोड़कर एथेनॉल की ओर आकर्षित होते हैं, तो भविष्य में देश को दालों और खाद्य तेलों के आयात पर निर्भर होना पड़ सकता है। ऐसे में हम पेट्रोलियम आयात का बिल तो घटा देंगे, लेकिन भोजन आयात का बिल बढ़ा लेंगे। इससे न तो वास्तविक आत्मनिर्भरता प्राप्त होगी और न ही संसाधनों का न्यायपूर्ण उपयोग सुनिश्चित होगा।  

ऊर्जा सुरक्षा महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे जल, भूमि और खाद्य-सुरक्षा की कीमत पर हासिल नहीं किया जा सकता। इसके लिए कुछ वैकल्पिक और दूरदर्शी कदम आवश्यक हैं।  
एथेनॉल उत्पादन को कृषि अपशिष्ट, जैविक कचरे और दूसरी पीढ़ी (2जी) के बायोफ्यूल तक सीमित किया जाए।  
गांव स्तर पर विकेंद्रीकृत बायोगैस और जैव-ऊर्जा मॉडल विकसित किए जाएं।  
ज्वार, बाजरा, कोदो, कुटकी और रागी जैसी कम पानी वाली मोटे अनाज की फसलों को प्रोत्साहित किया जाए।  

जल उपयोग, खाद्य-सुरक्षा और पर्यावरणीय प्रभावों का समग्र मूल्यांकन किए बिना किसी भी विस्तारवादी नीति को लागू न किया जाए।  
नीति निर्माण में किसानों, वैज्ञानिकों, स्थानीय समुदायों और नागरिक संगठनों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए।  
विकास का वास्तविक अर्थ केवल आर्थिक वृद्धि या आयात बिल में कमी नहीं है। विकास वह है जो प्रकृति, समाज और अर्थव्यवस्था के बीच संतुलन स्थापित करे। इतिहास हमें बार-बार चेतावनी देता रहा है कि तात्कालिक लाभ के लिए बनाए गए समाधान, यदि समग्र दृष्टि के बिना लागू किए जाएं, तो गंभीर संकट का रूप ले सकते हैं।  

एथेनॉल के संदर्भ में भी हमें यही सावधानी बरतनी होगी। आज जो ऊर्जा सुरक्षा का समाधान प्रतीत हो रहा है, वही कल जल संकट, खाद्य-असुरक्षा और कृषि संकट के रूप में हमारे सामने खड़ा हो सकता है। आवश्यकता है कि हम विकास को केवल उत्पादन और उपभोग के चश्मे से नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों और प्रकृति के संतुलन की दृष्टि से भी देखें।   
(लेखक  'संपर्क' संस्था के संस्थापक निदेशक हैं। वे 'जमनालाल बजाज पुरस्कार' से सम्मानित हो चुके हैं।)






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