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बांग्लादेश का चीन की ओर बढ़ता झुकाव: मोंगला ...

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बीजिंग : Bangladesh China relations: बांग्लादेश और चीन के बीच बढ़ते रणनीतिक सहयोग ने दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान की चीन यात्रा के दौरान दोनों देशों ने मोंगला पोर्ट के आधुनिकीकरण और विस्तार परियोजना पर साथ मिलकर काम करने की सहमति जताई है। इसके साथ ही तीस्ता नदी प्रबंधन परियोजना और चटगांव में औद्योगिक एवं आर्थिक क्षेत्र के विकास को भी दोनों देशों के सहयोग का अहम हिस्सा बनाया गया है। विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाक्रम भारत के लिए महत्वपूर्ण रणनीतिक संकेत हो सकता है, क्योंकि मोंगला पोर्ट को भारत लंबे समय से अपने पूर्वोत्तर राज्यों तक बेहतर संपर्क और क्षेत्रीय लॉजिस्टिक्स के एक महत्वपूर्ण विकल्प के रूप में देखता रहा है।




बीजिंग में हुई उच्चस्तरीय वार्ताबीजिंग में प्रधानमंत्री तारिक रहमान और चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग के बीच हुई बैठक के बाद जारी संयुक्त बयान में दोनों देशों ने कई प्रमुख बुनियादी ढांचा परियोजनाओं पर सहयोग बढ़ाने की घोषणा की। संयुक्त बयान के अनुसार, मोंगला पोर्ट के आधुनिकीकरण और विस्तार के अलावा चटगांव में चीनी आर्थिक एवं औद्योगिक क्षेत्र के विकास को भी गति देने पर सहमति बनी है। साथ ही चीन की महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के तहत बांग्लादेश में सहयोग को और मजबूत करने की भी बात कही गई है।





तीस्ता परियोजना में भी चीन की बढ़ी भूमिका

बैठक के दौरान चीन ने तीस्ता नदी के व्यापक प्रबंधन और पुनर्स्थापना परियोजना में अपनी क्षमता के अनुसार वित्तीय और तकनीकी सहयोग देने का आश्वासन भी दिया। यह परियोजना भारत के लिए भी महत्वपूर्ण रही है। जून 2024 में तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों ने तीस्ता नदी के संरक्षण और प्रबंधन पर विस्तृत चर्चा की थी। उस समय भारत ने इस परियोजना के लिए लगभग एक अरब अमेरिकी डॉलर की वित्तीय और तकनीकी सहायता देने की पेशकश की थी। शेख हसीना ने उस समय सार्वजनिक रूप से कहा था कि तीस्ता परियोजना भारत के सहयोग से आगे बढ़ाई जाएगी। हालांकि मौजूदा सरकार के चीन के साथ बढ़ते सहयोग ने इस परियोजना की दिशा को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।




भारत के लिए क्यों अहम है मोंगला पोर्ट?

मोंगला पोर्ट बांग्लादेश का दूसरा सबसे बड़ा समुद्री बंदरगाह है और यह कोलकाता बंदरगाह के अपेक्षाकृत करीब स्थित है। भारत के लिए इसकी रणनीतिक और आर्थिक दोनों दृष्टि से विशेष महत्ता है। वर्ष 2018 में भारत और बांग्लादेश के बीच हुए समझौते के तहत भारत को मोंगला और चटगांव बंदरगाहों का उपयोग अपने सामान, विशेष रूप से पूर्वोत्तर राज्यों के लिए, जलमार्ग, रेल, सड़क और मल्टीमॉडल परिवहन के माध्यम से करने की अनुमति मिली थी। इसके बाद भारत ने इन बंदरगाहों के उपयोग के लिए कई ट्रायल रन भी किए थे ताकि पूर्वोत्तर राज्यों तक माल ढुलाई को अधिक तेज और किफायती बनाया जा सके।




'चिकन नेक' पर निर्भरता कम करने की रणनीति

भारत के पूर्वोत्तर राज्यों का मुख्य भू-भाग देश के बाकी हिस्से से सिलीगुड़ी कॉरिडोर के जरिए जुड़ा है, जिसे आम तौर पर 'चिकन नेक' कहा जाता है। यह बेहद संकरा भूभाग रणनीतिक दृष्टि से संवेदनशील माना जाता है। मोंगला पोर्ट और बांग्लादेश के माध्यम से विकसित होने वाला वैकल्पिक परिवहन मार्ग भारत के लिए इस निर्भरता को कम करने का एक महत्वपूर्ण विकल्प माना जाता रहा है। यदि यह मार्ग पूरी तरह विकसित होता है तो पूर्वोत्तर राज्यों तक माल की आवाजाही अधिक सुगम हो सकती है। इसी वजह से मोंगला पोर्ट भारत की क्षेत्रीय संपर्क नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।

शेख हसीना सरकार के समय अलग थी दिशा

भारत और बांग्लादेश के बीच सहयोग को लेकर वर्ष 2024 तक सकारात्मक संकेत देखने को मिले थे। जुलाई 2024 में तत्कालीन शेख हसीना सरकार ने मोंगला पोर्ट के एक हिस्से के संचालन के लिए एक भारतीय कंपनी को जिम्मेदारी सौंपने की दिशा में सैद्धांतिक कदम भी उठाया था। हालांकि अगस्त 2024 में सत्ता परिवर्तन के बाद बांग्लादेश की नई सरकार ने विदेश नीति और क्षेत्रीय सहयोग के कई पहलुओं की समीक्षा शुरू की। इसके बाद चीन के साथ बढ़ते सहयोग को नई प्राथमिकता मिलती दिखाई दे रही है।

चीन की लंबे समय से रही है रुचि

चीन पहले से ही मोंगला पोर्ट के विकास में निवेश की इच्छा जता चुका था। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, उसने इस परियोजना के लिए लगभग 400 मिलियन अमेरिकी डॉलर के ऋण का प्रस्ताव भी दिया था। मोंगला पोर्ट के अलावा चटगांव बंदरगाह, औद्योगिक पार्क, परिवहन नेटवर्क और ऊर्जा परियोजनाओं में भी चीन लगातार अपनी मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश करता रहा है। यह सहयोग चीन की बेल्ट एंड रोड रणनीति का भी हिस्सा माना जाता है।

क्षेत्रीय राजनीति पर पड़ सकता है असर

विशेषज्ञों का मानना है कि बांग्लादेश का चीन के साथ बुनियादी ढांचा और बंदरगाह परियोजनाओं में बढ़ता सहयोग दक्षिण एशिया की रणनीतिक राजनीति को प्रभावित कर सकता है। वहीं, भारत और बांग्लादेश के बीच 2018 के बंदरगाह उपयोग समझौते सहित पूर्व में हुए विभिन्न द्विपक्षीय समझौते अभी भी औपचारिक रूप से प्रभावी हैं। भविष्य में इन व्यवस्थाओं का स्वरूप दोनों देशों की कूटनीतिक बातचीत और नीतिगत फैसलों पर निर्भर करेगा। भारत के लिए प्राथमिकता यह होगी कि वह बांग्लादेश के साथ अपने आर्थिक, व्यापारिक और रणनीतिक संबंधों को मजबूत बनाए रखे, जबकि चीन के बढ़ते प्रभाव पर भी नजर रखे। आने वाले समय में मोंगला पोर्ट, तीस्ता परियोजना और क्षेत्रीय संपर्क से जुड़े निर्णय भारत-बांग्लादेश-चीन त्रिकोणीय संबंधों की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।






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