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जागी है पूर्वोत्तर इलाके में आर्थिक पुनरुत् ...

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  • जी एन बाजपेयी
पूर्वोत्तर क्षेत्र को उपजाऊ गंगा के मैदान, रेलवे और नदियों का व्यापक नेटवर्क, कोयला और अन्य खनिज संसाधन, ऐतिहासिक औद्योगिक स्थल, बड़ी और युवा आबादी तथा बंगाल की खाड़ी तक पहुंच जैसे वरदान मिले हैं। नेपाल, भूटान, बांग्लादेश और दक्षिण-पूर्व एशिया के करीब होने से विदेशी बाज़ारों तक पहुंचने के बड़े मौके मिलते हैं।  
देश ने चुनावों के दौरान, खासकर पश्चिम बंगाल में काफी राजनीतिक गहमा-गहमी देखी है। चुनावी हाथापाई और उसके बाद तृणमूल कांग्रेस में हुई राजनीतिक हलचल और तीखी बयानबाजी के दौर से हटकर अब समय आ गया है कि पश्चिम बंगाल में आर्थिक विकास के मुद्दों और पूरे पूर्वोत्तर क्षेत्र के एकीकृत विकास पर उनके असर की पड़ताल की जाए।  




दिल्ली से लेकर पश्चिम बंगाल और सात पूर्वोत्तर राज्यों में (जिन्हें 'सेवन सिस्टर्स' कहा जाता है) से 6 में भारतीय जनता पार्टी या तो सीधे तौर पर या गठबंधन की मुख्य सहयोगी के तौर पर सत्ता में है। दिल्ली को छोड़कर बाकी सभी राज्य आर्थिक विकास, प्रति व्यक्ति जीडीपी और मानव विकास के नतीजों के मामले में पीछे हैं। इन राज्यों से बड़े पैमाने पर लोगों का बाहर जाना- जैसे रोज़गार की तलाश में मज़दूरों का, मौकों की तलाश में हुनरमंद लोगों का और मुनाफ़े की तलाश में पूंजी का पलायन-सामाजिक और राजनीतिक चिंता का लगातार कारण रहा है।  




1947 में भारत की राजनीतिक आज़ादी के समय देश का आर्थिक भूगोल आज के दौर से काफी अलग था। देश की औद्योगिक और व्यावसायिक अर्थव्यवस्था में पूर्वी इलाकों की स्थिति काफी अहम थी जिसमें उत्तर प्रदेश, अविभाजित बिहार और पश्चिम बंगाल शामिल थे। इस क्षेत्र में औद्योगिक बुनियादी ढांचा, खनिज संसाधन, रेलवे नेटवर्क, नदी परिवहन और इंजीनियरिंग क्षमताएं बड़ी मात्रा में मौजूद थीं।  
चीनी उत्पादन, कपड़ा बनाने, चमड़े के सामान, कांच और पीतल के सामान के साथ-साथ खेती से होने वाले उत्पादन में भी उत्तरप्रदेश का दबदबा था। कपड़ा मिलों और चमड़े की फैक्ट्रियों की वजह से कानपुर को 'पूरब का मैनचेस्टर' कहा जाता था। वाराणसी, आगरा, मेरठ व मुरादाबाद जैसे शहरों में मैन्युफैक्चरिंग की मज़बूत परंपरा थी। कोयला, लौह अयस्क, अभ्रक, तांबा, बॉक्साइट, चूना पत्थर के उत्पादन और स्टील बनाने के काम में बिहार का वर्चस्व था। बोकारो, रांची, धनबाद और हज़ारीबाग़ शहरों ने माइनिंग, मेटलर्जी और इंजीनियरिंग पर आधारित एक इंटीग्रेटेड इंडस्ट्रियल इकोसिस्टम बनाया।  




उस समय पश्चिम बंगाल निस्संदेह देश का औद्योगिक दृष्टि से सबसे ज़्यादा संपन्न राज्य था। कोलकाता भारत का प्रमुख वाणिज्यिक और औद्योगिक उत्पादन केन्द्र था तथा पूरे पूर्वोत्तर भारत, दक्षिण-पूर्व एशिया और यहां तक कि यूरोप तक फैले बड़े इलाके के लिए व्यापार व व्यापार का द्वार था। यह शहर बैंकिंग, बीमा और शिपिंग का केन्द्र था। जूट, इंजीनियरिंग के सामान, रेलवे के उपकरण, भारी मशीनरी, फाउंड्री और केमिकल के साथ-साथ चाय के व्यापार और निर्यात में भी राज्य अग्रणी था। कोलकाता, हावड़ा, दुर्गापुर, आसनसोल तथा बर्दवान तक फैला औद्योगिक क्षेत्र भारत के भारी उद्योग का प्रतिनिधित्व करता था। शोधकर्ताओं का अनुमान है कि 1950-51 में भारत के औद्योगिक योगदान में पश्चिम बंगाल का हिस्सा लगभग 27 प्रतिशत था। इस इलाके की एकीकृत अर्थव्यवस्था ने ज़्यादा उत्पादकता दी।  




पूर्वोत्तर भारत के पिछड़ेपन की कहानी पर चर्चा करते समय इसके शुरुआती योगदान की ऐतिहासिक सच्चाई को भुला दिया जाता है। आज़ादी के शुरुआती दशकों में उप्र, बिहार और पश्चिम बंगाल में बनाए गए औद्योगिक बुनियादी ढांचे ने भारत के व्यापक आर्थिक बदलाव की अहम नींव रखी थी। पूर्वोत्तर, पश्चिमी एवं दक्षिणी क्षेत्रों के बीच आर्थिक अंतर कई जटिल ऐतिहासिक घटनाओं का नतीजा है जिनमें वृहद आर्थिक नीतियों की कमियां, संरचनात्मक असंतुलन तथा राजनीतिक बदलाव शामिल हैं। 1952 में 'फ्रेट इक्वलाइज़ेशन पॉलिसी' (माल ढुलाई समानीकरण नीति) के साथ यह गिरावट शुरू हुई। इसके तहत केंद्र सरकार ने समानीकरण कोष (इक्वलाइज़ेशन फंड) का इस्तेमाल करके ज़रूरी औद्योगिक सामानों की लंबी दूरी की ढुलाई के लिए सब्सिडी दी और उन भौगोलिक फायदों को खत्म कर दिया जो खनिज भंडारों से भरपूर राज्यों को स्वाभाविक रूप से मिले हुए थे। 'समानीकरण कोष' एक ऐसा वित्तीय या सरकारी कोष है, जिसे आर्थिक असंतुलन को दूर करने, विभिन्न आय या कीमतों के अंतर को पाटने या निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए बनाया जाता है।  

क्षेत्रीय आर्थिक विकास में संतुलन बनाए रखने के व्यापक मकसद से कोयले व स्टील जैसे खनिजों को दूसरे राज्यों तक पहुंचाने के लिए ढुलाई सब्सिडी दी गई। हालांकि कपास और तिलहन जैसी दूसरी चीज़ों की ढुलाई लागत को एक समान नहीं किया गया। एक नज़रिए से देखें तो पूर्वोत्तर को कम इनपुट लागत का जो प्राकृतिक लाभ मिला हुआ था उसे इस नीति ने खत्म कर दिया और इस नुकसान की भरपाई भी नहीं की। पश्चिम बंगाल का सकल घरेलू उत्पाद (ग्रॉस डोमेस्टिक प्रॉडक्ट-जीडीपी) 1960-61 में भारत के जीडीपी के लगभग 10.5 प्रतिशत से घटकर 2023-24 में 5.6 प्रति सैकड़ा हो गया।  

तर्क दिया जाता है कि इस गिरावट को मज़दूरों की अशांति, बुनियादी ढांचे का खराब होना, कुशासन एवं तटीय अर्थव्यवस्थाओं के उभार जैसे कई अन्य कारकों ने और बढ़ा दिया। गिरावट की इस प्रक्रिया ने, जिसे अर्थशास्त्री अक्सर देश के भीतर 'बड़ा अंतर' कहते हैं, संरचनात्मक रूप से आगे रहने वाले क्षेत्र को व्यवस्थित रूप से पिछड़े क्षेत्र में बदल दिया।  
पूर्वोत्तर क्षेत्र को उपजाऊ गंगा के मैदान, रेलवे और नदियों का व्यापक नेटवर्क, कोयला और अन्य खनिज संसाधन, ऐतिहासिक औद्योगिक स्थल, बड़ी और युवा आबादी तथा बंगाल की खाड़ी तक पहुंच जैसे वरदान मिले हैं। नेपाल, भूटान, बांग्लादेश और दक्षिण-पूर्व एशिया के करीब होने से विदेशी बाज़ारों तक पहुंचने के बड़े मौके मिलते हैं।  

इतिहासकार और अर्थशास्त्री गुन्नार मिर्डल ने कहा है- 'विकास और अविकसित अवस्था, दोनों ही लगातार चलने वाली प्रक्रियाएं हैं।' पूर्वोत्तर के पुनरुद्धार को अलग-अलग राज्यों की अर्थव्यवस्थाओं को पृथक-पृथक विकसित करने के बजाय पूरे क्षेत्र को एक एकीकृत अर्थव्यवस्था के रूप में विकसित करने की एक मिली-जुली प्रक्रिया के तौर पर शुरू किया जाना चाहिए। इसके लिए व्यावहारिक नीतियां बनाने और सहयोगपूर्ण दृष्टिकोण अपनाने की ज़रूरत है। एक अत्याधुनिक हाई-स्पीड फ्रेट और औद्योगिक गलियारा विकसित किया जाना चाहिए जिसमें बिजनेस और इंडस्ट्रियल पार्क, वेयरहाउस, लॉजिस्टिक्स हब तथा एक्सपोर्ट ज़ोन शामिल हों। यह औद्योगिक गलियारा उप्र में कानपुर, प्रयागराज और वाराणसी, बिहार में पटना व धनबाद तथा पश्चिम बंगाल में आसनसोल, दुर्गापुर और कोलकाता शहरों को जोड़ेगा। फ्रेट और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क को ईस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर, इनलैंड वॉटरवेज़, कंटेनर टर्मिनल, कोल्ड स्टोरेज चेन व मल्टीमॉडल लॉजिस्टिक्स पार्क के इर्द-गिर्द बनाया जाना चाहिए। बंदरगाह के आधुनिकीकरण, टेक्नोलॉजी पार्क, लॉजिस्टिक्स हब और अंतरराष्ट्रीय व्यापार सुविधाओं के ज़रिए कोलकाता को पूर्वी भारत के प्रवेश द्वार के रूप में फिर से जीवंत किया जाना चाहिए।  

ऐतिहासिक अनुभवों के आधार पर उत्तर प्रदेश में इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा, चमड़ा-टेक्सटाइल और फूड प्रोसेसिंग; बिहार में एग्रो-प्रोसेसिंग, उर्वरक, इंजीनियरिंग, सीमेंट व निर्माण सामग्री तथा नवीकरणीय ऊर्जा उपकरणों और पश्चिम बंगाल में इंजीनियरिंग, पेट्रोकेमिकल्स, जहाज निर्माण, रेलवे उपकरण एवं भारी उद्योगों के निर्माण पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। इन योजनाओं के साथ-साथ शहरी विकास, मानव पूंजी में निवेश, क्रेडिट-टू-डिपॉजिट अनुपात को फिर से व्यवस्थित करने तथा संस्थागत समन्वय पर भी ज़ोर दिया जाना चाहिए। भारत की 'डेवलप ईस्ट पॉलिसी' का लाभ उठाने के लिए यूपी, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल और असम को मिलाकर एक स्थायी 'पूर्वी क्षेत्रीय परिषद' बनाई जानी चाहिए।  

अर्थशास्त्री अल्बर्ट हिर्शमैन का तर्क था कि 'विकास इस बात पर उतना निर्भर नहीं करता कि उपलब्ध संसाधनों एवं उत्पादन के कारकों के लिए सबसे अच्छा संयोजन क्या है, बल्कि इस बात पर आश्रित है कि विकास के उद्देश्यों के लिए उन संसाधनों और क्षमताओं को कैसे जुटाया तथा इस्तेमाल किया जाए जो छिपे हुए, बिखरे हुए या जिनका ठीक से इस्तेमाल नहीं हो रहा है।' इसमें अपार संभावनाएं हैं। कॉरिडोर-आधारित एकीकृत आर्थिक रणनीति, संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल सुनिश्चित करेगी तथा एक अधिक संतुलित, समृद्ध और समावेशी भारत का निर्माण करेगी।  
(लेखक एलआईसी और सेबी के पूर्व अध्यक्ष हैं। सिंडिकेट : द बिलियन प्रेस)






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