नई दिल्ली। गर्भवती महिला आईपीएस अधिकारियों को प्रोबेशन के दौरान प्रशिक्षण से रोकने वाले वर्ष 1993 के गृह मंत्रालय के कार्यालय ज्ञापन की वैधता पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। शीर्ष अदालत ने पूछा कि यदि कोई अधिकारी चिकित्सकीय रूप से प्रशिक्षण के लिए पूरी तरह सक्षम है, तो उसे केवल गर्भावस्था या मातृत्व के आधार पर प्रशिक्षण से दूर रखने का औचित्य क्या है।
जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि सभी महिलाओं पर एक समान नियम लागू करना उचित नहीं हो सकता। अदालत ने टिप्पणी की कि महिलाओं के हित में बनाए गए प्रावधानों का उपयोग उनके अधिकार सीमित करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। पीठ ने यह भी कहा कि किसी महिला की स्वास्थ्य स्थिति व्यक्तिगत होती है और उसका आकलन मेडिकल फिटनेस के आधार पर किया जाना चाहिए।
कोर्ट में केंद्र सरकार की दलील
सुनवाई के दौरान न्यायालय ने केंद्र से यह भी पूछा कि क्या याचिकाकर्ता उर्वशी सेंगर को जून 2026 से आरंभ हुए प्रशिक्षण सत्र में शामिल होने की अनुमति दी जा सकती है। केंद्र सरकार ने दलील दी कि एक अधिकारी को छूट देने से भविष्य में ऐसे कई मामलों में समान मांगें उठ सकती हैं। वहीं, याचिकाकर्ता की ओर से बताया गया कि पूर्व में भी कुछ महिला अधिकारियों को विशेष परिस्थितियों में राहत दी जा चुकी है।
2023 बैच की आईपीएस अधिकारी उर्वशी सेंगर
मध्य प्रदेश कैडर की 2023 बैच की आईपीएस अधिकारी उर्वशी सेंगर ने इस मामले में याचिका दायर की है। उन्होंने नवंबर 2023 में प्रशिक्षण का पहला चरण पूरा किया था। अप्रैल 2025 में दूसरे चरण के दौरान गर्भवती होने पर उन्हें प्रशिक्षण स्थगित कर अगले बैच के साथ इसे पूरा करने का निर्देश दिया गया।
प्रशिक्षण में शामिल होने की अनुमति मांगी
प्रसव के बाद सितंबर 2025 में सेंगर ने मेडिकल फिटनेस प्रमाणपत्र के आधार पर प्रशिक्षण में शामिल होने की अनुमति मांगी, लेकिन सरदार वल्लभभाई पटेल राष्ट्रीय पुलिस अकादमी ने 1993 के नियम का हवाला देते हुए उनकी मांग अस्वीकार कर दी। इसके बाद उन्होंने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) का रुख किया, जहां से उन्हें अंतरिम राहत मिली।
हालांकि, अकादमी ने इस आदेश को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी और हाईकोर्ट ने CAT के आदेश पर रोक लगाते हुए कहा कि संबंधित नियम महिला अधिकारी और उसके शिशु के हितों को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं। अब सुप्रीम कोर्ट इस मामले की विस्तृत सुनवाई कर रहा है, जिसका फैसला भविष्य में महिला अधिकारियों के सेवा अधिकारों और प्रशिक्षण नीतियों पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है।

National Desk
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