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विचार: ‘कम से कम 80 लाख नौकरियां हर साल’ — AI युग में भारत की असली चुनौती, पी. चिदंबरम ने उठाए भविष्य के सबसे कठिन सवाल

deltin55 3 hour(s) ago views 46

कृत्रिम मेधा (एआइ) का दौर शुरू हो चुका है। यह सच है कि एआइ मानव क्षमताओं और उत्पादकता को कई गुना बढ़ा देगा। भारत के पास मानव संसाधनों की विशाल और लगातार बढ़ती संपदा है (कम से कम 2050 तक)। हालांकि, इसकी गुणवत्ता विकसित देशों के मानव संसाधनों से काफी अलग है। एक विकसित देश में व्यावहारिक रूप से हर कोई स्कूली शिक्षा प्राप्त करता है और विद्यार्थियों की आबादी का एक बड़ा हिस्सा कालेज तक की शिक्षा ग्रहण करता है। वहां जीवन भर सीखने और नए कौशल हासिल करने का अवसर होता है। भारत में जनसांख्यिकीय लाभांश के साथ इसका बोझ भी आता है।




देश में प्राथमिक स्तर पर स्कूली नामांकन बहुत अधिक है, लेकिन उच्च प्राथमिक, माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक स्तरों पर नामांकन में हर स्तर पर गिरावट देखी जा रही है। उच्च शिक्षा में सकल नामांकन अनुपात (जीईआर) 45-50 फीसद के बीच है। कालेज में नामांकित अधिकांश छात्र स्नातक की डिग्री प्राप्त करते हैं, जो उन्हें ‘कुशल’ या ‘रोजगार योग्य’ नहीं बनाती है- यही मुख्य कारण है कि युवा वर्ग के लिए उपयुक्त नौकरी खोजना एक कठिन कार्य है।







मैंने एंथ्रोपिक के सीईओ डारियो अमोदेई के कापीराइट वाले 38 पन्नों के निबंध ‘द एडोलसेंस आफ टेक्नोलाजी’ का सारांश पढ़ा है। आर्थिक व्यवधान पर वे कहते हैं कि कृत्रिम मेधा ‘अभूतपूर्व गति से और व्यापक व्यावसायिक श्रेणियों में श्रम बाजारों को बाधित कर सकती है, जिससे निकट भविष्य में नौकरियों का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा (वाइट कालर जाब) विस्थापित हो सकता है।’ यह डरावना है। भारत में एक अन्य अध्ययन में पाया गया कि कृत्रिम मेधा जाति को पहचानती है। यदि मनुष्य ने इसे जातिगत पूर्वाग्रह सिखाया है, तो यह और भी भयावह है।



प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह कहना सही है कि एआइ भविष्य और समृद्धि के द्वार खोलेगा। मगर नौकरियों के नुकसान का भी डर है। टिकट जारी करने और चेक करने वाले, बस और ट्रेन कंडक्टर, रेल सिग्नलकर्मी, यातायात पुलिस अधिकारी, स्टेनोग्राफर और टाइपिस्ट, टूरिस्ट गाइड, अनुवादक, लैब तकनीकी कर्मी, बैंक कर्मी और निजी शिक्षक जैसी नौकरियां खत्म हो सकती हैं। माइक्रोसाफ्ट के सीईओ ने कहा है कि कुछ महत्त्वपूर्ण नौकरियों में कई काम स्वचालित हो जाएंगे। कंपनी ने वर्ष 2025 में हजारों नौकरियां खत्म कर दीं।






टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज ने 2025 में घोषणा की कि पुनर्गठन प्रक्रिया के तहत वह बारह हजार से अधिक कर्मचारियों को नौकरी से निकाल देगी। विनोद खोसला का कहना है कि एआइ सूचना प्रौद्योगिकी सेवाओं को खत्म कर सकता है और बीपीओ कंपनियां अगले पांच वर्षों में लगभग गायब हो सकती हैं।



भारत में सबसे बड़ी समस्या रोजगार की कमी है। वर्तमान में ‘आधिकारिक’ बेरोजगारी दर 5.1 फीसद है, लेकिन हम जानते हैं कि यह इससे कहीं अधिक है। युवा बेरोजगारी दर 15 फीसद है। लगभग 55 फीसद ‘रोजगारशुदा’ लोग स्वरोजगार या दिहाड़ी मजदूर हैं। समृद्ध क्षेत्रों में कृषि कार्य पहले से ही मशीनीकृत हैं। ग्रामीण परिवार बेरोजगारी को यह बहाना बनाकर छिपाते हैं कि उनका बेटा या बेटी ‘स्वरोजगार’ में है। यदि शहरी क्षेत्रों में भी श्रमिक वर्ग के लिए रोजगार कम हो जाएं तथा सूचना प्रौद्योगिकी और उसके उत्पादों एवं सेवाओं जैसे ‘कुशल’ क्षेत्रों में शिक्षित युवाओं को रोजगार न मिले, तो स्थिति विस्फोटक हो जाएगी।




वैश्विक स्तर पर अपरिहार्य चुनौतियों से निपटने के लिए क्या तैयारी है? मेरी समझ से भारत समेत पूरी दुनिया अभी तक समाधानों के साथ तैयार नहीं हैं। मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) ने उन्नत अर्थव्यवस्थाओं (जहां जनसंख्या कम हो रही है, वहां एआइ लाभकारी हो सकता है) और विकासशील देशों (जहां एआइ राज्य की क्षमता के लिए एक कठिन परीक्षा साबित होगा) पर एआइ के प्रभाव में अंतर को रेखांकित किया है। स्वाभाविक रूप से समाधान भी अलग-अलग होंगे। उनका समाधान यह है कि ‘निरंतर क्रियान्वयन से भारत पहला ऐसा बड़ा समाज बन सकता है… जो तकनीक को व्यापक रोजगार क्षमता से जोड़ सके।’ काश, समाधान इतना सरल होता।







प्रौद्योगिकी को लगातार अपनाने के शुरुआती परिणाम नौकरियों में कमी के रूप में सामने आए हैं, कम से कम भारतीय कारखानों में यह स्थिति देखी जा रही है। मगर जैसा कि इकोनोमिस्ट कहता है, ‘आविष्कार और प्रसार’ के बीच समय अंतराल होता है, और इस दौरान प्रौद्योगिकी को अपनाने से होने वाले प्रभाव को समाहित करने के लिए कठोर कदम उठाए जा सकते हैं।



उदाहरण के लिए, बड़ी संख्या में नौकरी चाहने वालों और रोजगार के व्यापक अवसरों की जरूरत के मद्देनजर भारत को तैयार रहना होगा:








एआइ को अपनाने और इसके परिणामस्वरूप रोजगार खत्म करने वालों से यह अपेक्षा करना कि वे इसी समान संख्या में रोजगार सृजित करेंगे। हमें जेमी डिमन (सीईओ, जेपी मार्गन चेस) से सहमत होने और ‘छंटनी’ पर प्रतिबंध लगाने की आवश्यकता नहीं है। निगमित सामाजिक उत्तरदायित्व ने व्यवसायों में सामाजिक उत्तरदायित्व का एक स्तर स्थापित किया है; जिसमें रोजगार सृजन की जिम्मेदारी को भी शामिल किया जाना चाहिए।










रोजगार के बिना या कम रोजगार वाली दुनिया एक कष्टकारी भविष्य की ओर अग्रसर होगी। ‘काम’ ही मनुष्य की पहचान है। भोजन की तलाश के अलावा कोई भी अन्य प्राणी स्वेच्छा से काम नहीं करता। यदि कृत्रिम मेधा हमारा सारा काम कर दे और सभी के लिए समृद्धि लाए, तो मनुष्य क्या करेगा? आने वाले कुछ वर्षों में कृत्रिम मेधा का प्रभाव स्पष्ट रूप से सामने आएगा, तब तक इस प्रश्न पर विचार करने का समय है।









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