नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु में गायों और बछड़ों के वध पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने संबंधी मद्रास हाई कोर्ट के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है। शीर्ष अदालत ने राज्य सरकार की विशेष अनुमति याचिका पर सुनवाई करते हुए मामले में नोटिस जारी किया और कहा कि हाई कोर्ट के आदेश के कुछ हिस्सों पर पुनर्विचार की आवश्यकता है।
राज्य सरकार की दलीलों को मिली प्राथमिक राहत
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने सुनवाई के दौरान पाया कि पूरे राज्य में बिना किसी अपवाद के प्रतिबंध लगाने वाला निर्देश प्रथम दृष्टया मौजूदा कानूनों के अनुरूप नहीं दिखता। राज्य सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने पक्ष रखा।
तमिलनाडु सरकार ने अदालत को बताया कि राज्य का पशु संरक्षण अधिनियम, 1958 कुछ विशेष परिस्थितियों में सक्षम प्राधिकारी के प्रमाणपत्र के आधार पर वृद्ध या अनुपयोगी पशुओं के वध की अनुमति देता है। इसके अलावा अन्य कानून वध की प्रक्रिया और स्थान को नियंत्रित करते हैं, लेकिन पूर्ण प्रतिबंध का प्रावधान नहीं करते।
हाई कोर्ट ने बकरीद से पहले दिया था आदेश
मद्रास हाई कोर्ट ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए बकरीद की पूर्व संध्या पर राज्यभर में किसी भी दिन गाय और बछड़े के वध पर रोक लगाने का निर्देश दिया था। याचिका में मुख्य रूप से यह मांग की गई थी कि पशु वध केवल निर्धारित स्थानों पर ही हो, लेकिन अदालत ने व्यापक आदेश जारी कर दिया।
अपने फैसले में हाई कोर्ट ने दुग्ध उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की सुरक्षा से जुड़े सरकारी आदेशों तथा पूर्व न्यायिक निर्णयों का भी उल्लेख किया था।
अंतिम फैसला अभी शेष
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल यह केवल अंतरिम राहत है और मामले की विस्तृत सुनवाई बाद में की जाएगी। अब राज्य सरकार और अन्य पक्षों की दलीलों पर विचार के बाद अंतिम निर्णय लिया जाएगा।
इस घटनाक्रम ने राज्य में पशु संरक्षण कानूनों, धार्मिक परंपराओं और न्यायिक अधिकार क्षेत्र से जुड़े मुद्दों पर नई बहस को जन्म दे दिया है।

National Desk
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