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Darbhanga News : नागार्जुन और शारदा सिन्हा मिथिला की अनमोल धरोहर

deltin33 2025-11-6 00:37:11 views 936
  

नागार्जुन की प्रतिमा पर माल्यार्पण करते कुलपति व अतिथि। जागरण  



जागरण संवाददाा, दरभंगा । नागार्जुन और स्वर कोकिला शारदा सिन्हा दोनों ही मिथिला की अनमोल धरोहर हैं। अपने बेबाक सृजन से बाबा यात्री-नागार्जुन ने जहां ज्ञान की धरती मिथिला को वैश्विक स्तर पर एक नई पहचान दी।

वहीं शारदा सिन्हा ने अपने सारस्वत गायन से मिथिला की लोक गायकी को विश्व के नक्शे पर स्थान दिलाने में अहम भूमिका निभाई। उक्त बातें बुधवार को बाबा यात्री नागार्जुन एवं शारदा सिन्हा की पुण्यतिथि पर विद्यापति सेवा संस्थान के तत्वावधान में आयोजित श्रद्धांजलि सभा में श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. संजय कुमार चौधरी ने कही। विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

उन्होंने नागार्जुन के नाम पर स्थापित चेयर की चर्चा करते हुए घोषणा की कि शीघ्र ही पद्मश्री, पद्मभूषण एवं पद्म विभूषण जैसे विशिष्ट सम्मान से सम्मानित मिथिला की बेटी और विश्वविद्यालय की प्रतिभाशाली शिक्षिका शारदा सिन्हा के नाम पर भी चेयर स्थापित की जाएगी।

अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि मिथिला की माटी की ये दोनों ही विभूति भारत रत्न के वाजिब हकदार हैं। भारत सरकार को उन्हें यह सम्मान प्रदान किए जाने पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।

विद्यापति सेवा संस्थान के महासचिव डा. बैद्यनाथ चौधरी बैजू ने अपने संबोधन में जन कवि के रूप में विश्व विख्यात बाबा नागार्जुन एवं शारदा सिन्हा के कृतित्व एवं व्यक्तित्व की विस्तार से चर्चा करते हुए बाबा नागार्जुन को पद्म पुरस्कारों से अद्यतन वंचित रखे जाने पर निराशा जताते हुए सृजन एवं गायन क्षेत्र में अपनी प्रतिभा से विश्व स्तर पर भारत का नाम ऊंचा करने वाले मिथिला के इन दोनों अनमोल रत्न को भारत रत्न से सम्मानित किए जाने की मांग को वाजिब ठहराया।

मौके पर मैथिली अकादमी के पूर्व अध्यक्ष पं कमला कांत झा ने कहा कि मैथिली एवं हिन्दी के साथ-साथ कई अन्य भाषा-साहित्य पर अच्छी पकड़ रखने वाले यात्री-नागार्जुन वास्तव में जनता की व्यापक राजनीतिक आकांक्षा से जुड़े विलक्षण कवि थे।

चेतना समिति के अध्यक्ष विवेकानंद झा ने कहा कि जन जन के कवि यात्री का विभिन्न भाषाओं पर न सिर्फ गजब का एकाधिकार था बल्कि, उनकी रचनाओं में देसी बोली के ठेठ शब्दों से लेकर संस्कृतनिष्ठ शास्त्रीय पदावली तक उनकी भाषा के अनेक स्तर थे।

यही कारण रहा कि मैथिली के अलावा हिन्दी, बंगला और संस्कृत में आम जन की आकांक्षाओं के पात्रों को केन्द्र में रखकर उन्होंने बहुत कुछ अलग से लिखकर साहित्य की अभूतपूर्व श्रीवृद्धि की।

कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालय के पूर्व कुलानुशासक डा. श्रीपति त्रिपाठी ने बाबा नागार्जुन को श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए कहा कि यात्री-नागार्जुन ने आमजन के मुक्ति संघर्षों में न सिर्फ रचनात्मक हिस्सेदारी दी, बल्कि स्वयं भी जन संघर्षों में आजीवन सक्रिय रहते हुए प्रगतिशील धारा के कवि एवं कथाकार के रूप में ख्यात हुए।

साहित्यकार मणिकांत झा ने बाबा नागार्जुन एवं शारदा सिन्हा को श्रद्धांजलि अर्पित करते कहा कि लोक शक्ति के उपासक बाबा नागार्जुन मूलतः विपक्ष के कवि थे। जो वर्चस्ववादी सत्ता के विरुद्ध प्रतिरोध की संस्कृति को आजीवन समृद्ध करते रहे।

मौके पर संस्थान के मीडिया संयोजक प्रवीण कुमार झा, विनोद कुमार झा, परमानंद झा, प्रो चंद्रशेखर झा बूढाभाई, डा गणेश कांत झा, डा. उदय कांत मिश्र, प्रो. विजय कांत झा, कुदन चौधरी, आशीष चौधरी, पुरूषोत्तम वत्स, मणिभूषण राजू भी मौजूद थे।
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