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भोपाल त्रासदी: तीसरी पीढ़ी के DNA में भी जहर, 3 गुना बढ़ीं विकृतियां; वैज्ञानिकों ने क्या बताया?

cy520520 2025-12-2 22:09:08 views 604
  

भोपाल गैस त्रासदी: तीसरी पीढ़ी तक DNA में जहर का असर।

जागरण नेटवर्क, भोपाल। 2 और 3 दिसंबर, 1984 की दरमियानी वह भयावह रात आज भी भोपाल को डराती है, जब यूनियन कार्बाइड (यूसी) फैक्ट्री से मिथाइल आइसोसाइनेट (एमआईसी-मिक) गैस रिसकर शहर की हवा में घुल गई थी। इस जहरीली गैस ने हजारों लोगों की जान तो तुरंत ले ली, लेकिन इसका दंश अब तीसरी पीढ़ी के रक्त व जीन तक पहुंच चुका है।   औद्योगिक दुर्घटना के 41 साल बाद भी यह जहर बच्चों में शारीरिक विकृतियां, कैंसर, कमजोर दिमाग और विकास में देरी का कारण बन रहा है। वैज्ञानिक अध्ययनों में स्पष्ट प्रमाण मिले हैं कि एमआईसी गैस जीनो टॉक्सिक है, यानी यह सीधे डीएनए और क्रोमोसोम (गुणसूत्र) पर हमला करती है। वर्ष 1986 में हुए पहले अध्ययन में ही गैस पीड़ितों के क्रोमोसोम में गंभीर क्षति मिली थी।   नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर रिसर्च इन एनवायर्नमेंटल हेल्थ की रिपोर्ट बताती है कि प्रभावित परिवारों में बच्चों में जन्मजात विकृतियां सामान्य आबादी की तुलना में तीन गुना अधिक हैं। पीड़ित परिवारों में गर्भपात की दर ऊंची और शिशु मृत्यु दर भी सामान्य से कई गुना ज्यादा दर्ज की गई है। पीड़ितों के बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास भी बेहद धीमा है। जहां सामान्य बच्चे नौ से 12 माह की उम्र में चलने लगते हैं, वहीं गैस प्रभावित परिवारों के बच्चे डेढ़ साल बाद ही चल पाते हैं।   यूनियन कार्बाइड सैन डिएगो के वर्ष 2023 में हुए अध्ययन ने भी बताया गया है कि गर्भ में मिक के संपर्क में आए बच्चों में जीवन भर कैंसर का खतरा, विकलांगता और सीखने की क्षमता में कमी बनी रहती है। इससे हुई क्षति इतनी बड़ी है कि तीसरी पीढ़ी तक जीन की अस्थिरता कम नहीं हुई है।   
कचरा हटा पर दंश अभी भी बाकी   हमीदिया अस्पताल के पूर्व फोरेंसिक विशेषज्ञ डॉ. डी.के. सत्पथी बताते हैं कि यूनियन कार्बाइड परिसर से जहरीला कचरा तो हटा दिया गया है, लेकिन पीड़ित परिवार आज भी आनुवंशिक बीमारियों से घिरे हुए हैं। अधिकतर को 12–15 हजार रुपये का मामूली मुआवजा मिला। स्वास्थ्य सुविधाएं भी बदहाल हैं। सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 1991 में प्रभावित बच्चों के लिए मेडिकल इंश्योरेंस अनिवार्य किया था, लेकिन उसका लाभ सीमित परिवारों तक ही पहुंचा।   
वर्ष 2019 से अनुसंधान भी ठप   डॉ. सत्पथी का कहना है कि गैस राहत अस्पताल में काम करने वाले कई स्वास्थ्यकर्मियों को यह जानकारी ही नहीं है कि कौन सी गैस रिसी थी। इलाज को लेकर स्टाफ का प्रशिक्षण अधूरा है। उस समय साइनाइड जहर शरीर से निकालने के लिए जरूरी सोडियम थायोसल्फेट इंजेक्शन सभी पीड़ितों को नहीं दिया जा सका, वरना स्थिति बदल सकती थी। वर्ष 2019 के बाद से गैस पीड़ितों की अगली पीढ़ी पर अनुसंधान भी लगभग ठप है। विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें
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