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भारतीयों के खानपान पर CEEW ने किया गहन अध्ययन, रिपोर्ट- अनाज से मिल रहे प्रोटीन की गुणवत्ता पर उठे सवाल

deltin33 2025-12-11 01:08:18 views 614
  

प्रतीकात्मक तस्वीर।



संजीव गुप्ता, नई दिल्ली। भारतीयों के खाने में प्रोटीन की मात्रा का लगभग आधा हिस्सा अब चावल, गेहूं, सूजी और मैदा जैसे अनाजों से आता है। यह जानकारी काउंसिल आन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वाटर (सीईईडब्ल्यू) के बुधवार को जारी नए अध्ययन से सामने आई है। इस अध्ध्यन में नेशनल सैंपल सर्वे आफिस के घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण 2023-24 के आंकड़ों के आधार पर खानपान के रुझानों का विश्लेषण किया गया है। विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें
32 प्रतिशत की मात्रा से बहुत अधिक

इस अध्ययन में पाया गया है कि इस प्रोटीन का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा अनाजों से आता है, जिनमें कम गुणवत्ता वाला अमीनो एसिड होता है और वे आसानी से पचते नहीं हैं। प्रोटीन में अनाजों की यह हिस्सेदारी नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूट्रिशन (एनआईएन) की ओर से सुझाई गई 32 प्रतिशत की मात्रा से बहुत अधिक है।
स्रोत भोजन से बाहर जा रहे

दालें, डेयरी उत्पाद और अंडे/मछली/मांस जैसे उच्च गुणवत्ता वाले प्रोटीन के स्रोत भोजन से बाहर जा रहे हैं। सीईईडब्ल्यू अध्ययन में यह भी पाया है कि भोजन में सब्जी, फल और दाल जैसे प्रमुख खाद्य समूहों का सेवन कम है जबकि खाना पकाने के तेल, नमक और चीनी की अधिकता है।
घर पर 1.5 गुना अधिक प्रोटीन का सेवन

सीईईडब्ल्यू के विश्लेषण से पता चलता है कि भारत की सबसे अमीर 10 प्रतिशत आबादी सबसे गरीब आबादी की तुलना में अपने घर पर 1.5 गुना अधिक प्रोटीन का सेवन करती है, और पशु-आधारित प्रोटीन के स्रोतों तक उसकी पहुंच भी अधिक है।

अभी भी भारत का खान-पान अनाज और खाना पकाने के तेलों की तरफ बहुत अधिक झुका हुआ है और ये दोनों ही पोषण संबंधित प्रमुख असंतुलन में भूमिका निभाते हैं।
खपत लगभग 40 प्रतिशत गिरी

लगभग तीन-चौथाई कार्बोहाइड्रेट अनाज से आता है, और प्रत्यक्ष अनाज का सेवन अनुशंसित दैनिक भत्ते से 1.5 गुना अधिक है, जिसे निम्न-आय वाले 10 प्रतिशत हिस्से में सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिए रियायती चावल और गेहूं की व्यापक उपलब्धता से और बल मिलता है।

मोटे अनाज जैसे ज्वार, बाजरा और रागी के घरेलू उपभोग में सबसे ज्यादा गिरावट आई है। बीते एक दशक में प्रति व्यक्ति इसकी खपत लगभग 40 प्रतिशत गिरी है। इसके चलते भारतीय मुश्किल से मोटे अनाज के लिए सुझाए गए स्तर का 15 प्रतिशत हिस्सा ही पूरा कर पाते हैं।
सुझाए गए स्तर से 1.5 गुना अधिक वसा

इसी के साथ-साथ, पिछले एक दशक में सुझाए गए स्तर से 1.5 गुना अधिक वसा और तेल का सेवन करने वाले परिवारों का अनुपात दोगुने से भी अधिक हो गया है। इतना ही नहीं, उच्च आय वाले परिवारों में वसा का सेवन निम्न आय वर्ग की तुलना में लगभग दोगुना पहुंच गया है।

सीईईडब्ल्यू की रिसर्च एनालिस्ट सुहानी गुप्ता कहती हैं, मोटे अनाज और दालें बेहतर पोषण होने के साथ-साथ पर्यावरण के लिए फायदेमंद हैं, लेकिन इन्हें प्रमुख खाद्य कार्यक्रमों, जैसे कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) में कम इस्तेमाल किए जाते हैं, कम उपलब्ध कराए जाते हैं, जिनमें चावल और गेहूं की अधिकता बनी हुई है।
पैकेज्ड प्रोसेस्ड फूड की व्यवस्था

वहीं, हमारे अध्ययन से पता चलता है कि उच्च आय वाले परिवार सबसे गरीब परिवारों की तुलना में लगभग दोगुना वसा का सेवन करते हैं, जो कुपोषण के बढ़ते हुए दोहरे बोझ का संकेत देता है।

इसे दूर करने के लिए अलग-अलग उपाय अपनाने की जरूरत है, जैसे विविधतापूर्ण, पोषक तत्वों से भरपूर खाद्य पदार्थों तक पहुंच और मांग को मजबूत करना, विशेष रूप से कम आय समूहों के लिए, जबकि अमीर समूहों के लिए अतिरिक्त खपत को घटाना और पैकेज्ड प्रोसेस्ड फूड की व्यवस्था को नए सिरे से तैयार करना।

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