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PM किसान सम्मान निधि: बिहार-झारखंड कई किसानों को नहीं मिल पाया लाभ, सामने आई चौंकाने वाली वजह

deltin33 2025-12-13 13:06:58 views 1067
  

बिहार के किसान। फोटो AI



परिमल सिंह, भागलपुर। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना के प्रभाव का आकलन करने के लिए केंद्र सरकार द्वारा कराए जा रहे राष्ट्रीय सर्वेक्षण के तहत बिहार–झारखंड क्षेत्र की रिपोर्ट तैयार की गई है। इसके लिए तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय के अधीन कृषि आर्थिक अनुसंधान केंद्र ने बिहार के चार जिलों और झारखंड के चार जिलों के 400 किसानों पर विस्तृत अध्ययन किया है। जिसमें पता चला कि ई-केवाईसी, पोर्टल अपडेट व मैसेज नहीं पढ़ पाने से बिहार-झारखंड के किसानो की बड़ी आबादी पीएम सम्मान निधि योजना से वंचित रह रहे हैं। विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

इसकी रिपोर्ट दिल्ली विश्वविद्यालय के एग्रो इकोनॉमिक रिसर्च सेंटर और इंस्टीच्यूट आफ इकोनामिक्स ग्रांट, नई दिल्ली भेज दी गई है। रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि ऐसे किसानों को डिजिटल साक्षरता का ज्ञान दिया जाना जरूरी है, ताकि ये भी भविष्य में योजना का लाभ उठा सकें।

सर्वे में ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल प्रोसेस को लेकर बड़ी दिक्कतें पेश आने का पता चला है। कई लाभुक किसान ई-केवाईसी, पोर्टल अपडेट या मोबाइल पर आने वाले मैसेज पढ़ नहीं पाते, जिनके कारण उनकी किस्तें रुक जाती हैं या उनका पंजीकरण अधूरा रह जाता है।
कृषि आर्थिक अनुसंधान केंद्र ने दिया सुझाव

इसे देखते कृषि आर्थिक अनुसंधान केंद्र ने रिपोर्ट में किसानों के लिए डिजिटल फाइनेंशियल साक्षरता अभियान चलाने का सुझाव दिया है। योजना से जुड़े मैसेजों में वायस मैसेज की सुविधा जोड़ने की अनुशंसा की गई है।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि झारखंड में अब भी 1932 के आधार पर तैयार पुराने जमीन के कागजात प्रचलित हैं। डिजिटल रिकार्ड अपलोड न कर पाने के कारण कई किसान योजना से बाहर रह जाते हैं। केंद्र ने भूमि रिकार्ड को शत-प्रतिशत कंप्यूटरीकृत करने की भी सिफारिश की है।

कृषि आर्थिक अनुसंधान केंद्र बिहार–झारखंड के डॉ. रंजन सिन्हा ने बताया कि तैयार रिपोर्ट में योजना को प्रभावी बनाने के लिए कई अहम सुझाव दिए गए हैं। इसमें किसानों को समय पर प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि की राशि देने की अनुशंसा की गई है। कई बार किसानों को राशि समय पर नहीं मिल पाती, जिससे उन्हें परेशानी होती है।

किसानों के बीच डिजिटल फाइनेंशियल साक्षरता अभियान चलाने की भी जरूरत बताई गई है। सर्वे में यह बात भी सामने आई कि योजना के भविष्य को लेकर किसानों में असमंजस और भय का माहौल है। इसलिए सरकार से अनुरोध किया गया है कि योजना कब तक चलेगी, इसकी स्पष्ट जानकारी किसानों को दी जाए।

इसके साथ जो किसान अब तक योजना का लाभ नहीं ले पा रहे हैं, उन्हें जोड़ने की पहल करने का सुझाव भी दिया गया है। सर्वे के दौरान किसानों ने खेती में बढ़ती लागत के कारण योजना की राशि बढ़ाने की मांग भी की थी। रिपोर्ट में योजना की नियमित निगरानी और मूल्यांकन जारी रखने की आवश्यकता बताई गई है।
बिहार–झारखंड समेत देश के 19 राज्यों में किया गया सर्वेक्षण

देश के 19 राज्यों में यह सर्वेक्षण किया गया है। बिहार के शेखपुरा, पूर्णिया, बांका और सारण तथा झारखंड के गोड्डा, बोकारो, जामताड़ा और रांची में इसका संचालन हुआ। सर्वे का कार्य एक साल तक चलेगा। इसका नेतृत्व केंद्र निदेशक डा. सुदामा कुमारी यादव ने किया, जबकि अध्ययन के लीडर डा. रंजन कुमार सिन्हा थे। उनके निर्देशन में योजना का मूल्यांकन किया गया।
81.25 प्रतिशत किसानों ने माना, डायरेक्ट बैंक ट्रांसफर से मिली सफलता

अध्ययन के लीडर डॉ. रंजन कुमार सिन्हा ने बताया कि सर्वे के दौरान बिहार–झारखंड के 81.25 प्रतिशत किसानों ने माना कि योजना की सबसे बड़ी सफलता यह है कि राशि सीधे लाभुक के बैंक खाते में आने से बिचौलिया संस्कृति लगभग समाप्त हो गई है।

किसानों ने बताया कि 6000 रुपये की वार्षिक सहायता से बीज–खाद खरीदने, छोटे ऋण चुकाने और तात्कालिक जरूरतों को पूरा करने में काफी मदद मिली है। किसानों का आग्रह है कि बढ़ती लागत को देखते हुए सहायता राशि बढ़ाई जानी चाहिए।
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