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सिनेमा की वो क्लासिक, जिसने 50 साल पहले सिखाई प्रेम की नई परिभाषा...आज की रोमांटिक फिल्मों पर पड़ती है भारी!

LHC0088 6 day(s) ago views 183
  

बासु चटर्जी की छोटी सी बात को 50 साल हुए पूरे। फोटो क्रेडिट- इंस्टाग्राम



जागरण न्यूज नेटवर्क, मुंबई। 20वीं शताब्दी का आठवां दशक। बासु चटर्जी की तीन फिल्में एक के बाद एक आईं। ‘रजनीगंधा’ 13 सितंबर, 1974 को आई। ‘छोटी-सी बात’ 9 जनवरी, 1975 को आई और 30 जनवरी 1976 को आई ‘चितचोर’। तीनों में हीरो थे अमोल पालेकर।

अमोल पालेकर पेंटर थे। बैंक ऑफ इंडिया में काम करते थे। चित्रा से उनकी दोस्ती हुई। उन्हें रिहर्सल के लिए छोड़ने जाते। सत्यदेव दुबे ने उनमें संभावनाएं देख उन्हें ‘शांतता कोर्ट चालू आहे’ में काम दे दिया। उन्हीं दिनों बासु चटर्जी ने अमोल पालेकर को एक फिल्म का ऑफर दिया- ये थी ‘पिया का घर’, लेकिन बाद में एक मुद्दे की वजह से उन्हें हटा दिया गया।
कैसे छोटी सी बात में कास्ट हुए अमोल पालेकर?

इसके बावजूद बासु चटर्जी और अमोल पालेकर के रिश्ते खराब नहीं हुए। उन्होंने आगे चलकर पहले ‘रजनीगंधा’ में अमोल से काम करवाया और फिर ‘छोटी-सी बात’ भी ऑफर की। ‘छोटी-सी बात’ बनने की कहानी बड़ी दिलचस्प है। बलदेव राज चोपड़ा उन दिनों ‘जमीर’ बना रहे थे। उन्होंने ‘रजनीगंधा’ देखकर बासु चटर्जी से कहा, ऐसी ही कोई एक क्यूट फिल्म मेरे लिए बनाओ।
इस फिल्म से प्रेरित है छोटी सी बात

बासु चटर्जी ने एक रोमांटिक कॉमेडी चुनी। उन्हीं कलाकारों को लेकर यानी अमोल पालेकर और विद्या सिन्हा। प्रेरणा मिली वर्ष 1960 में आई राबर्ट हैमर की ब्रिटिश फिल्म ‘स्कूल फार स्काउंड्रेल्स’ से। बासु दा का अपना अंदाज था फिल्में बनाने का। फिल्म टाइपिंग से शुरू होती है और शुरुआत में जो कृतज्ञता ज्ञापन है- उसमें समोवर रेस्त्रां का भी आभार जताया गया है। ये रेस्त्रां ‘रजनीगंधा’ में भी दिखाया गया था।

  
कमेंट्री ने कहानी में निभाई अहम भूमिका

आपको याद होगा चिकन अलापूज वाला वो दृश्य। इस फिल्म की कमेंट्री कमलेश्वर की आवाज में थी और प्रसिद्ध व्यंग्यकार शरद जोशी ने फिल्म के अतिरिक्त संवाद लिखे थे। जैक्सन तोलाराम प्राइवेट कंपनी का दफ्तर फिल्म का केंद्र है। एक-एक करके सभी पात्रों का परिचय कमलेश्वर अपनी कमेंट्री के जरिये करवाते हैं। कमेंट्री के जरिये दर्शकों को पता चलता है कि प्रभा (विद्या सिन्हा) से अरुण प्रदीप (अमोल पालेकर) को प्यार है, पर वो इजहार नहीं कर पाता, संकोची है।
डायलॉग्स भी फिल्म की रहे जान

फिल्म में बार-बार एक बस स्टॉप आता है- जिसमें ‘जमीर’ का बड़ा-सा पोस्टर नजर आता है। ‘छोटी-सी बात’ सही मायनों में एक क्यूट फिल्म है। मिर्जा गालिब ने कहा था, ‘मुहब्बत में नहीं है फर्क जीने और मरने का/ उसी को देखकर जीते हैं जिस काफिर पे दम निकले’। बेचारे अरुण की हालत यही है।
अशोक कुमार की अहम भूमिका

प्रभा को उसके जज्बात का एहसास है पर वो इंतजार में है और फिर बीच में आ जाता है नागेश शास्त्री (असरानी)। उसके पास स्कूटर है। वो बेबाक है। अरुण हर मामले में नागेश से गच्चा खा रहा है। ऐसे में उसके पास एक ही रास्ता बचता है। बड़ी-बड़ी मूंछों वाले कर्नल जूलियस नागेंद्रनाथ विल्फ्रेड सिंह (अशोक कुमार) की शरण में जाना-जो प्यार करने वालों की मदद करने वाले एक्सपर्ट हैं।
फिल्म में हैं शानदार वन लाइनर

अशोक कुमार ने गजब भूमिका निभाई है। वो कहते हैं- ‘जब से ये दुनिया बनी है, मानव समाज दो हिस्सों में बंट गया है। जीतने वाले और हारने वाले। ऊपर वाले और नीचे वाले। जिंदगी के क्रिकेट में ड्रा नहीं होता। जीत उसी की होती है जो ऊपर है’। बस...इसी तरह कर्नल साहब अरुण का आत्मविश्वास बढ़ाते चले जाते हैं। गजब के वन-लाइनर आए हैं उनके हिस्से में और ये बात इस फिल्म को सर्वकालिक और प्रासंगिक बनाती है। कहना गलत न होगा कि कर्नल साहब के जगाए गए भरोसे के बाद आखिरकार अरुण अपने ‘प्रेम-अभियान’ में कामयाब भी होता है।

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छोटी सी बात के गाने भी निकले सदाबहार

‘रजनीगंधा’ की तरह ‘छोटी-सी बात’ के गीत योगेश के हैं और संगीत सलिल चौधरी का। ‘जानेमन जानेमन’ गाने की ट्यून सलिल दा ने गैर-फिल्मी बांग्ला गीत ‘प्रजापति’ के लिए तैयार की थी। ये येसुदास का गाया पहला हिंदी गीत बना। इस गाने का एक अंश धर्मेंद्र और हेमा मालिनी पर फिल्माया गया है। फिल्म में दो और गाने हैं। ‘ना जाने क्यों होता है ये जिंदगी के साथ’ और ‘ये दिन क्या आए लगे फूल हंसने’। ‘ना जाने क्यूं’ भी असल में एक गैर फिल्मी बांग्ला गाने ‘पागोल हवा’ की ट्यून है।
दिल छू लेने वाला है फिल्म का क्लाइमेक्स

सलिल दा ने इस फिल्म के लिए एक और गाना बनाया था- ‘तेरी गलियों में हम आए’ पर इसका फिल्म में इस्तेमाल नहीं हो सका। हालांकि क्लाइमेक्स में जब अरुण और प्रभा मिलते हैं, तो बैकग्राउंड में इस गाने की धुन बजती है और यहीं फिल्म खत्म हो जाती है। ‘छोटी-सी बात’ एक आम जीवन की सहज कथा है। 50 साल पहले प्रदर्शित ये फिल्म न कभी धूमिल पड़ी है और ना धूमिल पड़ेगी। फौरन देख डालिए।

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