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भूमिहीन किसान से कृषि गुरु तक: हरेराम महतो की खेती बनी सैकड़ों किसानों की पाठशाला

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हरेराम महतो की खेती आज सैकड़ों किसानों की प्रेरणा



संवाद सूत्र, शाहपुर (भोजपुर)। कहते हैं कि मेहनत, लगन और सही दिशा मिल जाए तो हालात चाहे जैसे भी हों, सफलता कदम चूमती है। शाहपुर प्रखंड के भूमिहीन किसान हरेराम महतो की कहानी इसी कहावत को साकार करती है। कभी सीमित संसाधनों के बीच खेती शुरू करने वाले हरेराम आज न सिर्फ हर साल लाखों की आमदनी कर रहे हैं, बल्कि उनकी खेती सैकड़ों किसानों के लिए प्रेरणा और प्रशिक्षण का केंद्र बन चुकी है। उनकी पहचान अब एक किसान से बढ़कर एक चलता-फिरता कृषि प्रशिक्षण केंद्र के रूप में हो चुकी है।

पिछले दो दशकों से हरेराम महतो परंपरागत खेती के साथ-साथ आधुनिक तकनीकों के जरिए सब्जियों की बहुस्तरीय खेती कर रहे हैं। कड़ाके की ठंड हो या प्रचंड गर्मी, वे रोज पौ फटते ही खेतों में जुट जाते हैं।

खेतों में निरंतर सोहाई-कोडाई, नर्सरी की देखभाल और फसलों की निगरानी उनकी दिनचर्या का हिस्सा है। उनके साथ पूरा परिवार इस मेहनत में सहभागी रहता है।

हरेराम महतो शाहपुर मठिया क्षेत्र में करीब तीन एकड़ जमीन पट्टे पर लेकर खेती करते हैं, जिसके लिए वे हर साल लगभग एक लाख रुपये मालगुजारी देते हैं।

इसके बावजूद उनकी आमदनी लगातार बढ़ रही है। उनके खेत में फूलगोभी, पत्तागोभी, ब्रोकली, टमाटर, बैंगन, मिर्च और प्याज की उन्नत किस्मों की नर्सरी हर सीजन में तैयार होती है।

इन नर्सरियों की मांग दूर-दराज के इलाकों से रहती है। किसान सुबह से शाम तक उनके खेत पहुंचते हैं, कोई पौधे खरीदने, तो कोई खेती के गुर सीखने।

हरेराम सिर्फ नर्सरी बेचकर ही नहीं, बल्कि किसानों को यह भी सिखाते हैं कि बेहतर उत्पादन के लिए नर्सरी कैसे तैयार की जाए, पौधों को रोग से कैसे बचाया जाए और कम लागत में अधिक लाभ कैसे लिया जाए।

आत्मा के उपनिदेशक राणा राजीव रंजन के अनुसार, कम पढ़े-लिखे होने के बावजूद हरेराम का अनुभव और फसलों की समझ उन्हें एक बेहतरीन किसान बनाती है।

वहीं शाहपुर प्रखंड किसान श्री सम्मान से सम्मानित किसान उमेश चंद्र का कहना है कि हरेराम की खेती की पद्धति अन्य किसानों से बिल्कुल अलग और अनुकरणीय है।

हरेराम महतो बताते हैं कि सब्जियों की उन्नत किस्म के बीज से तैयार नर्सरी उनकी आय का मुख्य आधार है। सीजन के दौरान वे बैंगन, टमाटर, हरी मिर्च, प्याज और विभिन्न प्रकार की गोभी की नर्सरी तैयार करते हैं, जिससे उन्हें हर साल करीब पांच से सात लाख रुपये की आमदनी हो जाती है।

अब उनके बेटे श्याम सुंदर महतो और नारायण शाहपुर में कृषि ग्रीन सेंटर के नाम से बीज की दुकान भी चला रहे हैं, जिससे परिवार की आय और मजबूत हुई है।

आज हरेराम महतो का खेत सिर्फ खेती का स्थान नहीं, बल्कि सीखने की पाठशाला बन चुका है। उनकी मेहनत और अनुभव यह साबित करते हैं कि अगर इच्छाशक्ति मजबूत हो, तो खेती भी सम्मान, पहचान और समृद्धि का रास्ता बन सकती है।
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