ट्रंप का तानाशाही वाला रवैया। (फाइल फोटो)
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। दुनिया को लोकतंत्र, नियम और मानवाधिकार का पाठ पढ़ाने वाला अमेरिका आज उसी आइने के सामने खड़ा है, जिसमें सत्ता का घमंड, हथियारों की दहाड़ और सैन्य ताकत का नशा ही सबसे बड़ा कानून बन जाता है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने अंतरराष्ट्रीय नीतियों को जिस बेशर्मी और अकड़ के साथ ठुकराया है, उसने यह साफ कर दिया है कि उनके लिए न कोई वैश्विक मर्यादा मायने रखती है, न कोई नियम, न कोई जवाबदेही।
न्यूयॉर्क टाइम्स को दिए साक्षात्कार में ट्रंप का लहजा किसी लोकतांत्रिक राष्ट्रपति का नहीं, बल्कि उस शासक का था, जो अपनी ताकत के घमंड में पूरी दुनिया को अपने नीचे समझने लगा है।
कानून नहीं, अहंकार की हुकूमत
जब ट्रंप से पूछा गया कि क्या उनकी वैश्विक ताकत की कोई सीमा है, तो उन्होंने बिना किसी संकोच के यह जता दिया कि न कोई अंतरराष्ट्रीय नियम उन्हें बांधता है और न ही कोई संधि। उनके मुताबिक उन्हें रोकने वाली बस एक ही चीज है वो है उनकी अपनी सोच।
यह बयान आत्मसंयम नहीं, बल्कि उस खतरनाक मानसिकता का प्रदर्शन है जिसमें सत्ता खुद को इश्वर समझने लगती है और कानून को अपने जूते की नोक पर रख देती है। ट्रंप ने यह भी साफ कर दिया कि अंतरराष्ट्रीय नीतियां कब लागू होंगी और कब नहीं, इसका फैसला नियम नहीं, बल्कि उनका मूड करेगा।
चीन कोई सैन्य कदम उठाने की हिम्मत नहीं करेगा
चीन और ताइवान के बीच बढ़ते तनाव पर ट्रंप का बयान कूटनीति नहीं, बल्कि आत्ममुग्ध अहंकार की चरम अवस्था दिखाई देता है। ट्रंप ने दावा किया कि उनके राष्ट्रपति रहते चीन कोई सैन्य कदम उठाने की हिम्मत नहीं करेगा। यह बयान वैश्विक सुरक्षा को संस्थागत संतुलन पर नहीं, बल्कि एक व्यक्ति के भ्रमित आत्मविश्वास पर टिका हुआ दिखाता है। मानो पूरी दुनिया की शांति उनके व्यक्तित्व की दया पर निर्भर हो।
सत्ता की भूख, कब्जे की भाषा
नाटो की रक्षा और ग्रीनलैंड को हासिल करने के सवाल पर ट्रंप का असली चेहरा और साफ हो गया। उनके लिए कूटनीति, समझौते और साझेदारी कोई मायने नहीं रखते। असल ताकत \“मालिकाने\“ में है। ट्रंप के शब्दों में स्वामित्व वह शक्ति देता है, जो किसी संधि से नहीं मिलती। यह सोच लोकतंत्र की नहीं, बल्कि उस मानसिकता की झलक है जो जमीन, ताकत और प्रभाव को सिर्फ कब्जे की चीज मानती है।
यूरोप को धमकी, आत्मश्लाघा की राजनीति
यूरोप को चेतावनी देते हुए ट्रंप ने दावा किया कि नाटो पर ज्यादा खर्च करने के लिए अमेरिका ने ही उन्हें मजबूर किया। वे यहीं नहीं रुके उन्होंने यह भी कहा कि अगर वे राष्ट्रपति न होते, तो रूस अब तक पूरे यूक्रेन पर कब्जा कर चुका होता। इन बयानों में सहयोग नहीं, बल्कि आत्मप्रशंसा और श्रेष्ठता का वह जहर झलकता है, जिसमें अमेरिका नहीं, बल्कि ट्रंप खुद को दुनिया का एकमात्र रक्षक घोषित कर देते हैं।
ग्रीनलैंड पर दबाव, साझेदारी नहीं दादागिरी
इसी बीच अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने ग्रीनलैंड को लेकर यूरोप को सख्त चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि यह क्षेत्र सिर्फ अमेरिका नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की मिसाइल सुरक्षा के लिए अहम है और अगर यूरोप ने जिम्मेदारी नहीं ली, तो अमेरिका को कोई कदम उठाना पड़ेगा। यह भाषा सहयोग की नहीं, बल्कि दादागिरी, दबाव और ताकत के खुले प्रदर्शन की है।
डोनल्ड ट्रंप के ये बयान किसी नीति बहस का हिस्सा नहीं, बल्कि उस खतरनाक सोच की खुली घोषणा हैं जिसमें सत्ता खुद को कानून से ऊपर, नियमों से परे और दुनिया से बड़ा मानने लगती है।
अंतरराष्ट्रीय मर्यादाएं उनके लिए बोझ हैं, कूटनीति बाधा है और संतुलन कमजोरी। सैन्य ताकत, कब्जे की भूख और व्यक्तिगत अहंकार ही उनके फैसलों की नींव बन चुके हैं और यही वह रास्ता है जहां सबसे पहले लोकतंत्र कुचला जाता है और उसके बाद वैश्विक शांति।
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