इसमें प्रतीकात्मक तस्वीर लगाई गई है।
विजय कुमार गिरि, रक्सौल। Indo-Nepal open border crime :भारत-नेपाल की खुली सीमा से सटे सीमावर्ती जिलों में मानव तस्करी का संगठित नेटवर्क तेजी से पांव पसार रहा है। पूर्वी चंपारण जिले के 137 किलोमीटर लंबे भारत-नेपाल बॉर्डर पर सक्रिय गिरोह इंटरनेट मीडिया के माध्यम से युवकों-युवतियों और नाबालिग बच्चों को प्रेम, नौकरी, मॉडलिंग और ग्लैमरस जीवन का झांसा देकर सीमा पार ले जा रहे हैं।
आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को पहले छोटी-छोटी आर्थिक मदद देकर विश्वास में लिया जाता है, फिर सुनियोजित तरीके से बच्चियों और युवतियों को जाल में फंसाया जाता है।
जिले के रक्सौल अनुमंडल क्षेत्र में बीते एक वर्ष के दौरान कई मामलों का खुलासा हुआ है। जांच एजेंसियों के अनुसार, गिरोह के तार नेपाल के अलावा बिहार और उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती जिलों तक फैले हैं।
करीब एक वर्ष पूर्व हुई जांच में नेपाल के संजीत यादव, बेतिया के समीर आलम और कुशीनगर के सेराज खान सहित कई संदिग्ध नाम सामने आए थे।
‘स्लीपर सेल’ और कोड वर्ड से चलता है नेटवर्क
जांच एजेंसियों के अनुसार, तस्कर स्थानीय स्तर पर ‘स्लीपर सेल’ तैयार करते हैं, जो स्कूल-कॉलेजों और सोशल मीडिया के जरिए लड़कियों से संपर्क साधते हैं। पहले दोस्ती, फिर प्रेम और बड़े सपनों का लालच देकर उन्हें अपने प्रभाव में लिया जाता है।
सूत्रों का कहना है कि बड़े शहरों में बैठी महिलाओं को ‘मामी’, ‘मौसी’, ‘दीदी’ और ‘बुआ’ जैसे कोड वर्ड के माध्यम से ‘ऑर्डर’ भेजे जाते हैं। दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद और लुधियाना तक फैले इस नेटवर्क में सीमा पार कराने के बाद लड़कियों को स्टेशन या बस स्टैंड तक पहुंचाया जाता है, जहां से दूसरा एजेंट उन्हें महानगरों में ले जाता है। तस्करी की शिकार युवतियों का इस्तेमाल देह व्यापार और अवैध अंग व्यापार जैसे जघन्य अपराधों में किए जाने की आशंका जताई जाती है।
दो वर्षों में 500 से अधिक युवतियों को कराया गया मुक्त
मानव तस्करी के खिलाफ कार्यरत स्वयंसेवी संस्था ‘प्रयास’ के जिला समन्वयक के अनुसार, सशस्त्र सीमा बल (47वीं बटालियन), सिविल विंग, रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ), जीआरपी, रक्सौल थाना, ‘माइति नेपाल’ सहित करीब एक दर्जन संस्थाओं के आपसी समन्वय से पिछले दो वर्षों में पूर्वी एवं पश्चिमी चंपारण क्षेत्र से 500 से अधिक युवतियों को मुक्त कराया जा चुका है।
सीमा सुरक्षा बल की मानव तस्करी रोधी इकाई के इंस्पेक्टर विकास कुमार ने बताया कि सीमा पर विशेष निगरानी रखी जा रही है और समय-समय पर संयुक्त अभियान चलाए जाते हैं।
वहीं रक्सौल डीएसपी मनीष आनंद ने कहा कि पुलिस अब तक 100 से अधिक लड़कियों का रेस्क्यू कर चुकी है। उन्होंने स्वीकार किया कि कई मामलों में परिवार सामाजिक लोक-लाज के कारण शिकायत दर्ज नहीं कराते, जिससे तस्करों को फायदा मिलता है।
समाज की जागरूकता भी उतनी ही जरूरी
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल पुलिस कार्रवाई से इस अपराध पर पूरी तरह अंकुश लगाना संभव नहीं है। परिवारों को बेटियों की ऑनलाइन गतिविधियों पर सतर्क निगरानी रखनी होगी और किसी भी संदिग्ध संपर्क की सूचना तत्काल प्रशासन को देनी होगी।
भारत-नेपाल की खुली सीमा दोनों देशों की सांस्कृतिक और आर्थिक साझेदारी का प्रतीक है, लेकिन इसका दुरुपयोग करने वाले गिरोहों पर सख्त कार्रवाई समय की मांग बन चुकी है। पूर्वी चंपारण सहित सीमावर्ती जिलों में जागरूकता, सख्ती और सामूहिक प्रयास से ही इस संगठित अपराध की जड़ों पर प्रहार संभव है।  |