पटना हाईकोर्ट का आदेश। फाइल फोटो
विधि संवाददाता, पटना। पटना हाई कोर्ट ने पुलिसिया मनमानी और नाबालिग की अवैध गिरफ्तारी को लेकर बेहद कड़ा रुख अपनाते हुए राज्य सरकार को 5 लाख रुपये का मुआवजा पीड़ित को देने का आदेश दिया है।
न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि एक नाबालिग छात्र को बिना वैधानिक प्रक्रिया के गिरफ्तार कर जेल भेजना न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का गंभीर हनन है।
न्यायाधीश राजीव रंजन प्रसाद एवं न्यायाधीश रितेश कुमार की खंडपीठ ने कहा कि जिस अभियुक्त को पहले ही चार्जशीट में आरोपमुक्त किया जा चुका था, उसकी बाद में बिना किसी नए साक्ष्य के गिरफ्तारी पूरी तरह अवैध है।
अदालत ने पाया कि जांच अधिकारी ने केवल डीआईजी के पर्यवेक्षण नोट के आधार पर कार्रवाई की, जबकि मजिस्ट्रेट से पुनः जांच की अनुमति लेना अनिवार्य था।
मुकदमेबाजी का खर्च भी देना होगा
अदालत ने यह भी गंभीर टिप्पणी की है कि गिरफ्तारी के समय अभियुक्त की आयु की जांच नहीं की गई और किशोर न्याय अधिनियम, 2015 के प्रावधानों की खुली अवहेलना हुई। बाद में किशोर न्याय बोर्ड द्वारा अभियुक्त को घटना के समय लगभग 15 वर्ष का नाबालिग घोषित किया गया।
इन तथ्यों के आधार पर हाई कोर्ट ने नाबालिग को तत्काल रिहा करने, 5 लाख रुपये मुआवजा तथा 15 हजार रुपये मुकदमेबाजी खर्च देने का आदेश दिया।
साथ ही, बिहार के पुलिस महानिदेशक को निर्देश दिया गया कि पूरे मामले की प्रशासनिक जांच कर दोषी अधिकारियों से मुआवजा राशि की वसूली जाए। न्यायालय ने कहा कि कानून के शासन में किसी भी स्तर पर अधिकारों का दुरुपयोग स्वीकार्य नहीं है। |
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