एक ओर जहां रांची में सर्दी का सितम जारी है तो दूसरी ओर न्यूनतम तापमान में उतार चढ़ाव ने भी आमजनों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।
- जब मैं छोटा था तो 1955 के दौरान रांची का तापमान 2.5 औसतन रहता था : नीतीश
- यही नहीं
कुमार गौरव,रांची। एक ओर जहां राजधानी रांची में सर्दी का सितम जारी है तो दूसरी ओर न्यूनतम तापमान में उतार चढ़ाव ने भी आमजनों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।
पिछले एक पखवाड़े में मैकलुस्कीगंज और कांके के तापमान में माइनस 1.5 डिग्री से लेकर 6 डिग्री सेल्सियस तक उतार चढ़ाव देखा गया। यह पिछले वर्ष की तुलना में चार डिग्री तक कम है।
ऐसे में अनुमान लगाया जा सकता है कि सक्रिय मानसून और ला-नीना के असर ने किस तरह पूरे राज्य में ठंड का प्रकोप बढ़ाया है।
विशेषज्ञों की माने तो उत्तरप्रदेश से लेकर झारखंड तक रांची की ऊंचाई 1800 से 2000 फीट तक सबसे अधिक है और जब भी शिमला या इससे सटे क्षेत्रों यानी उत्तर पश्चिमी क्षेत्रों में हिमपात होता है तो इसका सीधा असर रांची में देखने को मिलता है।
यही नहीं किसी भी ओर से हवा का संचरण होता है तो इसका असर दक्षिणी छोटानागपुर के पठार पर देखने को मिलता है।
मौसम विज्ञान केंद्र रांची के वरीय विज्ञानी अभिषेक आनंद कहते हैं कि बंगाल की खाड़ी की गतिविधियों के कारण और पश्चिमी विक्षोभ के कारण जब बादल संघनन की प्रक्रिया तेजी से होती है तब रांची के मौसम में त्वरित परिवर्तन आता है। न्यूनतम तापमान बढ़ने लगता है।
वहीं, उत्तर पश्चिमी क्षेत्रों से जब ठंडी हवा बहने लगती है और आसमान साफ रहता है तो न्यूनतम तापमान में गिरावट होने लगती है।
रांची बंगाल, ओडिशा या फिर उत्तरप्रदेश के समतल क्षेत्र को मिला लें तो रांची और आसपास के क्षेत्रों की ऊंचाई सबसे अधिक है। लिहाजा, पर्यावरण का सबसे पहला असर रांची में ही देखने को मिलता है।
वेस्टर्न डिस्टर्बेंस ने बढ़ाई ठंड
बंगाल की खाड़ी में पांच बार से अधिक बने लो प्रेशर जोन के साथ साथ समय से पूर्व ला-नीना की सक्रियता ने नमीयुक्त हवा तैयार करने में अहम रोल निभाया।
इस हवा का संचरण बंगाल की खाड़ी से झारखंड की ओर होने से इस वर्ष ठंड का असर बढ़ा है। यही कारण है कि अबकी बार न्यूनतम तापमान में पिछले 20 वर्षों के दरम्यान 4 से 5 डिग्री सेल्सियस की गिरावट दर्ज की गई है।
मैक्लुस्कीगंज का तो माइनस में तापमान पहुंच चुका है। यह उस मिथक को तोड़ने के लिए पर्याप्त है कि रांची का मौसम प्रदूषण के कारण बदल चुका है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि बेशक प्रदूषण का स्तर बढ़ा है लेकिन इस वर्ष की ठंड से पूर्व सक्रिय मानसून ने रांची के पुराने दिनों की याद ताजा कर दी है।
इसका असर आगामी दिनों भी देखने को मिलेगा। न्यूनतम तापमान में दिख रहे इस अंतर पर विशेषज्ञों का कहना है कि रांची की भौगोलिक स्थिति ही इस उतार चढ़ाव का मूल कारण है।
रांची बंगाल की खाड़ी से नजदीक है तो रांची से उत्तरप्रदेश जाने के क्रम में रांची से रेणुकोट तक पहाड़ी क्षेत्र है। इसके आगे समतल भूमि है। इस समतल भूमि के आगे शिमला जैसा ठंडा क्षेत्र है।उत्तरप्रदेश से लेकर झारखंड तक रांची की ऊंचाई सबसे अधिक है और जब भी शिमला या इससे सटे क्षेत्रों यानी उत्तर पश्चिमी क्षेत्रों में हिमपात होता है तो इसका सीधा असर रांची में देखने को मिलता है। यही स्थिति तब उत्पन्न होती है जब बंगाल की खाड़ी या ओडिशा के समुद्री तट पर कोई गतिविधि होती है तो इसका असर रांची या फिर इसके आसपास के जिलों में देखने को मिलती है।
-प्रो. बीआर झा, पूर्व विभागाध्यक्ष जियोलाजी विभाग, रांची यूनिवर्सिटी।
शहर में हरियाली सिमट रही है और कांक्रीट जंगल बढ़ रहे हैं। ठंड हो या गर्मी का मौसम दोनों में समताप चाहिए तो हरियाली बनाकर रखनी होगी। जब मैं छोटा था तो 1955 के दौरान रांची का तापमान 2.5 औसतन रहता था। 70 और 80 के दशक में यहां का न्यूनतम तापमान कम से कम 15 दिनों तक समान रहता था। पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण कोहरे या धुंध का असर कम रहता है, हालांकि प्रदूषण स्तर बढ़ने के कारण कोहरे का असर अब छोटानागपुर में भी देखने को मिल रहा है।
-नीतीश प्रियदर्शी, पर्यावरणविद्, रांची। |
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