छोटे प्रयास से बड़ी पहचान तक का सफर
डिजिटल डेस्क, पटना। बिहार का पारंपरिक सुपर फूड मखाना अब सिर्फ तालाबों और स्थानीय हाट-बाजारों तक सीमित नहीं रह गया है। देश-विदेश में बढ़ती मांग के बीच यह अब रोजगार, उद्यमिता और निर्यात का मजबूत माध्यम बनता जा रहा है। इस बदलाव की कहानी कटिहार के युवा उद्यमी गुलफराज से जुड़ी है, जिन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘वोकल फॉर लोकल’ और ‘स्टार्टअप इंडिया’ अभियान तथा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के विकसित बिहार के विजन से प्रेरणा लेकर मखाना उद्योग को नई पहचान दिलाई है।
छोटे प्रयास से बड़ी पहचान तक का सफर
वर्ष 2019 में बेहद छोटे स्तर से शुरू हुआ गुलफराज का प्रयास आज ‘मोदी मखाना ब्रांड’ के रूप में राष्ट्रीय पहचान बना चुका है। गुलफराज बताते हैं कि उनकी सोच की बुनियाद यही रही कि स्थानीय उत्पाद को वैश्विक मंच तक पहुंचाया जाए और किसानों की आय को स्थायी रूप से बढ़ाया जाए। इसी उद्देश्य से उन्होंने मखाना की पारंपरिक खेती को प्रोसेसिंग और मार्केटिंग से जोड़कर एक संगठित उद्योग का रूप दिया।
आधुनिक तकनीक से मखाना प्रोसेसिंग
आज नेशनल मखाना उद्योग का प्लांट 7000 वर्ग फीट से अधिक क्षेत्र में फैला है। यहां मखाना की क्लीनिंग, ग्रेडिंग, हैंडपैकिंग और ऑटोमेटिक पैकेजिंग अत्याधुनिक मशीनों के जरिए की जाती है। आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल से मखाने की गुणवत्ता को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाया जा रहा है। इसका सीधा लाभ यह हुआ कि उत्पाद की विश्वसनीयता बढ़ी और किसानों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य मिलने लगा।
किसानों से सीधी खरीद, बिचौलियों की भूमिका खत्म
गुलफराज का कहना है कि उनका उद्देश्य केवल मुनाफा कमाना नहीं, बल्कि किसानों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना भी है। इसी सोच के तहत मखाना सीधे किसानों से खरीदा जाता है, जिससे बिचौलियों की भूमिका समाप्त हो जाती है। इससे किसानों को उनकी मेहनत का सही दाम मिलता है और उनकी आय में स्थिरता आती है। साथ ही इस उद्योग से सैकड़ों लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार भी मिल रहा है।
युवाओं के लिए मखाना उद्योग में अवसर
गुलफराज मानते हैं कि मखाना उद्योग में अपार संभावनाएं हैं। वे युवाओं से इस क्षेत्र में आगे आने की अपील करते हैं। उनका कहना है कि मखाना आधारित स्टार्टअप शुरू करने वाले युवा उद्यान कार्यालय, उद्योग विभाग या नेशनल मखाना उद्योग से संपर्क कर मार्गदर्शन प्राप्त कर सकते हैं। उनका सपना है कि मखाना सिर्फ खेती तक सीमित न रहे, बल्कि प्रोसेसिंग, पैकेजिंग और निर्यात के जरिए बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन का माध्यम बने।
सरकारी अनुदान से आई मखाना क्रांति
किसानों की आय बढ़ाने और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए राज्य सरकार भी लगातार प्रयासरत है। कृषि विभाग द्वारा मखाना की खेती को बढ़ावा देने के लिए अनुदान दिया जा रहा है। नए किसान 15 जनवरी तक बिहार कृषि ऐप या उद्यान निदेशालय की वेबसाइट के माध्यम से ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं। मखाना क्षेत्र विस्तार (खेत प्रणाली) के लिए डीबीटी पोर्टल पर पंजीकृत किसान आवेदन के पात्र हैं। इस योजना के तहत निर्धारित इकाई लागत 0.97 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर है, जिसमें बीज, इनपुट और हार्वेस्टिंग तक का खर्च शामिल है।
यह योजना राज्य के 16 जिलों, कटिहार, पूर्णिया, दरभंगा, मधुबनी, किशनगंज, सुपौल, अररिया, मधेपुरा, सहरसा, खगड़िया, समस्तीपुर, भागलपुर, सीतामढ़ी, पूर्वी चंपारण, पश्चिम चंपारण और मुजफ्फरपुर में लागू की जा रही है। इससे मखाना उत्पादन के साथ-साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलने की उम्मीद है।
देश से विदेश तक बढ़ती मांग
मखाने की पौष्टिकता और स्वास्थ्य लाभों के कारण इसकी मांग देश ही नहीं, विदेशी बाजारों में भी तेजी से बढ़ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रोसेसिंग और ब्रांडिंग को इसी तरह बढ़ावा मिलता रहा, तो आने वाले वर्षों में बिहार मखाना उत्पादन और निर्यात का बड़ा केंद्र बन सकता है।
परंपरा से उद्योग तक की मिसाल
कटिहार के उद्यमी गुलफराज का मानना है कि यदि सरकारी सोच, स्थानीय संसाधन और युवा उद्यमिता एक साथ आएं, तो पारंपरिक खेती भी आधुनिक उद्योग का रूप ले सकती है। उनकी सफलता कहानी मखाना उद्योग के साथ-साथ बिहार की बदलती तस्वीर की भी मिसाल बनती जा रही है। |