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झारखंड में खुले में मटन बिक्री की होगी कार्रवाई, बिना लाइसेंस वाले दुकानदारों को मिला अल्टीमेटम

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खुले में मटन बिक्री की होगी कार्रवाई



संवाद सहयोगी, मेदिनीनगर (पलामू)। झारखंड में खुले में मटन की बिक्री और बिना मानक पशु वध पर अब सख्त कार्रवाई की जाएगी। स्वास्थ्य, चिकित्सा शिक्षा एवं परिवार कल्याण विभाग ने इस संबंध में राज्य के सभी सिविल सर्जनों को स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं।  

विभागीय उप सचिव सीमा कुमारी उदयपुरिया द्वारा जारी आदेश पत्र में खाद्य सुरक्षा से जुड़े नियमों का कड़ाई से अनुपालन सुनिश्चित कराने को कहा गया है। यह निर्देश झारखंड उच्च न्यायालय द्वारा श्यामानंद पांडेय बनाम झारखंड राज्य व अन्य मामले में पारित आदेश के आलोक में जारी किया गया है।  

इसके तहत राज्य के सभी खाद्य सुरक्षा पदाधिकारियों को स्थानीय नगर निकायों के साथ समन्वय स्थापित करते हुए नियमों का सख्ती से पालन कराने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। विभाग ने यह भी स्पष्ट किया है कि किसी भी स्तर पर कानून व नियमों की अनदेखी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
खाद्य सुरक्षा पदाधिकारियों को कार्रवाई के निर्देश

मटन विक्रेता अब केवल उन्हीं शर्तों पर व्यवसाय कर सकेंगे, जो खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006 तथा खाद्य सुरक्षा एवं मानक नियम, 2011 के अंतर्गत पंजीकरण के बाद अनुमन्य हैं।
बिना पंजीकरण के मटन की बिक्री पूरी तरह प्रतिबंधित

किसी भी अनधिकृत व्यक्ति को मटन बेचने की अनुमति नहीं दी जाएगी। मटन बिक्री से पूर्व यह सुनिश्चित करना अनिवार्य होगा कि पशु वध पशु क्रूरता निवारण अधिनियम (वधशाला नियम), 2001 के अनुरूप हुआ हो। विशेष रूप से खाद्य सुरक्षा नियम 2011 के शेड्यूल-4 (भाग-4) का अक्षरशः एवं भावनात्मक रूप से अनुपालन अनिवार्य बताया गया है। नियमों के उल्लंघन की स्थिति में संबंधित व्यक्तियों एवं अधिकारियों को गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।
जिले में कहीं भी संचालित नहीं है वधशाला

जिले व नगर निगम क्षेत्र में दो दर्जन से अधिक मटन की दुकानें संचालित हैं। अधिकांश दुकानदार अपनी दुकानों में ही पशु वध कर मटन की बिक्री करते हैं, जिससे आसपास का वातावरण अत्यधिक दूषित हो रहा है। शहरी क्षेत्रों के रिहायशी इलाकों और बाजारों में खुलेआम प्रशासन की नजरों के सामने बकरे का वध किया जा रहा है।  

गौरतलब है कि वर्षों पूर्व नगर निगम क्षेत्र में मेदिनीराय मेडिकल कॉलेज अस्पताल के समीप वधशाला का निर्माण कराया गया था, लेकिन किसी भी मटन विक्रेता ने वहां जाकर वध नहीं किया। उपयोग के अभाव में यह वधशाला अब आवारा पशुओं का ठिकाना बन चुकी है। लाखों रुपये की लागत से बनी यह वधशाला वर्तमान में सरकारी धन की बर्बादी का उदाहरण बनकर रह गई है।
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