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ईरान में बदलते हालात पर किंतूर के सैय्यदबाड़ा में सभी चिंतित, खुमैनी वंशज कर रहे सलामती की दुआ

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जागरण संवाददाता, बाराबंकी। ईरान पर आए संकट से बाराबंकी के किंतूर गांव में रहने वाले खुमैनी वंश के वंशज भी परेशान हैं। ईरान की सत्ता की विरासत में खासा संबंध यहां के लोग मानते हैं।

गांव में सैय्यदबाड़ा में रहने वाले परिवार टेलीविजन और इंटरनेट के माध्यम से वहां के हालात पर चिंतित हो रहे हैं। सभी परिवार ईरान की सलामती को लेकर दुआ करने की बात करते हैं। यहां खुमैनी वंशज आदिल काजमी से जागरण ने वहां के हालात पर बात की।

आदिल बताते हैं कि किंतूर गांव में कभी लगभग 550 घर खुमैन खानदान के थे। अब महज पांच-सात घर बचे हैं। हम सभी ईरान में हो रहे घटनाक्रम को देख रहे हैं।

वहां के लोगों के लिए दुआ ही कर सकते हैं, लेकिन सभी एक बात वह कहने से खुद को नहीं रोक पाते कि राष्ट्रपति ट्रंप का यह रवैया पूरे विश्व के लिए ठीक नहीं है। ऐसा नहीं होना चाहिए। वह ज्यादा बात करने के बजाए बस यही कहते हैं कि सभी सलामत रहें, यही दुआ है।

खुमैनी वंश के बारे में काफी दिलचस्पी से बताते हैं, कि सभी घरों को एक नाम दिया गया था, जिसे सैय्यदबाड़े के नाम से लोग जानते। आज भी इस खानदान का नाम इलाके में ही नहीं, अवध क्षेत्र में बड़े ही अदब से लिया जाता है। पूर्वजों की याद में ईरान से यहां के हर दिल में गहरी चाहत है। अमेरिका का हस्तक्षेप गैरवाजिब होने के साथ नापाक है।

बताया कि ईरान में वर्ष 1979 में हुई इस्लामिक क्रांति के नायक रुहोल्लाह अयातुल्लाह खुमैनी के दादा सैय्यद अहमद मूसवी यहां से जियारत करने इराक व ईरान गए थे। ईरान के खुमैन शहर में बस गए।

ईरान के वर्तमान सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई को ईरानी क्रांति के अगुवा रुहोल्लाह अयातुल्लाह खुमैनी का अनुयायी बताया जा रहा है। ईरान में अस्थिरता और प्रदर्शन के बीच जहां पूरी दुनिया की निगाहें टिकी हैं, वहीं किंतूर गांव के लोगों की भी वहां के पल-पल के घटनाक्रम पर कुछ व्याकुल और भावुक होते हुए टकटकी लगाए हैं।
ईरान से यहां आए थे बुजुर्ग

काजमी कहते हैं, कि ईरान के नौशापुर शहर से अलाउद्दीन आला बुजुर्ग भारत आए थे। उनकी पीढ़ियां बाराबंकी के किंतूर व महोबा जिले के चरखारी स्थान पर बसीं थी। वर्ष 1830 में अहमद मूसवी हिंदी अवध के नवाबों के साथ यहां से जियारत करने कर्बला इराक गए थे।

फिर वहीं से ईरान के खुमैन शहर में बसने के बाद हिंदुस्तान से लगाव होने से वह अपने नाम के आगे उपनाम हिंदवी लगाकर अपने वतन से जुड़े रहे।

इनके पोते रुहोल्लाह अयातुल्लाह खुमैनी ने वहां के तत्कालीन शासक शाह पहलवी के खिलाफ बगावत का बिगुल बजा दिया और ईरानी क्रांति का नेतृत्व किया। परिणामस्वरूप 1979 में शाह पहलवी का शासन समाप्त हो गया और इस्लामिक गणराज्य की स्थापना हुई।
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