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शराबबंदी का असर: IIT Kanpur की स्टडी में खुलासा, बिहार में सुधरे पारिवारिक हालात

Chikheang 1 hour(s) ago views 896
  



जागरण संवाददाता, कानपुर। बिहार में 10 वर्ष पहले की गई शराबबंदी के फायदे दिखने लगे हैं। आइआइटी के एक शोध के अनुसार लोग शराब की जगह खान-पान पर ज्यादा खर्च कर रहे हैं। यानी पौष्टिक खाद्य स्रोतों से कैलोरी, प्रोटीन और हेल्दी फैट का सेवन बढ़ा है। साथ ही प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों (प्रोसेस्ड फूड) के इस्तेमाल में कमी आई है। सबसे बड़ी बात यह है कि सामाजिक बदलाव देखने को मिल रहे हैं और घरेलू कलह कम हुई है।

बिहार में नीतीश कुमार की सरकार ने एक अप्रैल 2016 को शराबबंदी का आदेश लागू किया था। आइआइटी के आर्थिक विज्ञान विभाग के विनायक कृष्णात्री के अनुसार, इस प्रतिबंध से न सिर्फ घरेलू संसाधन बचे, बल्कि सकारात्मक व्यवहार में भी बदलाव आया है। शराब का सेवन घटने से वैवाहिक कलह कम हुई, घरेलू स्थिरता में सुधार हुआ और पौष्टिक भोजन पर खर्च को ज्यादा प्राथमिकता दी गई।

अध्ययन से पता चला कि शराबबंदी से घरेलू संसाधन बचे, जिन्हें बाद में अस्वास्थ्यकर विकल्पों के बजाय स्वस्थ भोजन की खपत की ओर मोड़ दिया गया। शहरी क्षेत्रों में ज्यादा फायदे देखे गए, जहां प्रतिबंध का प्रवर्तन अपेक्षाकृत अधिक प्रभावी है। नीति-संबंधी निष्कर्ष यह है कि एक ऐसे राज्य में प्रोटीन के सेवन में वृद्धि हुई है जहां पारंपरिक रूप से आहार में अनाज का प्रभुत्व है। सस्ते, अस्वास्थ्यकर फैट से हटकर बेहतर गुणवत्ता वाले खाना पकाने के तेलों की ओर बदलाव हुआ, जिससे समग्र आहार गुणवत्ता में सुधार हुआ। दालों, डेयरी उत्पादों और नट्स से बने तेल और अन्य खाद्य स्रोतों से कैलोरी, प्रोटीन और फैट का सेवन काफी बढ़ गया है। पैकेटबंद सामान की खपत में कमी आई, जो अक्सर शराब के साथ खाए जाते हैं।

आर्थिक विज्ञान विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर सुकुमार वेल्लाक्कल ने बताया कि बिहार में शराबबंदी का मुख्य उद्देश्य घरेलू हिंसा और शराब से संबंधित सामाजिक नुकसान को कम करना था। अध्ययन से यह भी पता चलता है कि इससे अनजाने में पोषण और स्वास्थ्य लाभ भी हुए। खर्च को शराब से खाने की चीजों पर शिफ्ट करके डाइट की गुणवत्ता में काफी सुधार हुआ।
शोध में बिहार की तुलना यूपी, झारखंड और बंगाल से

आइआइटी का शोध पत्र एग्रीकल्चरल इकोनामिक्स जर्नल में प्रकाशित हुआ है। शोध करने वाली टीम ने नेशनल सैंपल सर्वे आफिस (एनएसएसओ) द्वारा किए गए राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिनिधि उपभोक्ता व्यय सर्वेक्षण के दो राउंड (2011-12 और 2022-23) के घरेलू स्तर के डाटा के आधार पर विश्लेषण किया। व्यापक समय के रुझान और क्षेत्रीय आर्थिक परिवर्तनों को ध्यान में रखने के लिए शोधकर्ताओं ने पड़ोसी राज्यों उत्तर प्रदेश, झारखंड और बंगाल से बिहार की तुलना की। निष्कर्षों की वैधता सुनिश्चित करने के लिए कई सांख्यिकीय मिलान तकनीकों का उपयोग किया।
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