21 जनवरी को रुपये ने रिकॉर्ड निचला स्तर लगाया।
नई दिल्ली। डॉलर के मुकाबले रुपये की गिरावट को थामने के लिए आरबीआइ ने नवंबर में विदेशी मुद्रा बाजार में 9.7 अरब डालर बेचे हैं। आरबीआई ने अपने मासिक बुलेटिन में कहा कि उसने नवंबर के दौरान 14.35 अरब डालर खरीदे और 24.06 अरब डालर बेचे। अक्टूबर में सेंट्रल बैंक ने बाजार में 11.88 अरब डालर बेचे थे। 21 नवंबर को भारतीय रुपया अपने उस समय के सबसे निचले स्तर 89.49 पर था, जो अमेरिका के साथ चल रहे व्यापार में रुकावट और लगातार विदेशी फंड की निकासी के चलते दबाव में था।
अकेले नवंबर में रुपये में 0.8% की गिरावट दर्ज की गई। बुधवार को रुपया 91.7425 के रिकार्ड निचले स्तर पर पहुँच गया, जो दो महीने में एक दिन की सबसे बड़ी गिरावट थी। ग्लोबल मार्केट में “रिस्क-ऑफ\“\“ और लोकल स्टॉक से लगातार निकासी से साउथ एशियन करेंसी को नुकसान हुआ।
रुपये में क्यों हावी है गिरावट?
मेटल इंपोर्टर्स की ओर से डॉलर की भारी डिमांड के चलते रुपये में कमजोर आ रही है। वहीं, फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर (FPI) के भारत से पैसा निकालने को भी रुपये में गिरावट का एक बड़ा कारण माना जा रहा है।
अमेरिकी सरकारी बॉन्ड पर ज़्यादा यील्ड रुपये के लिए एक और बड़ा दबाव का कारण है। जैसे-जैसे अमेरिकी बॉन्ड पर यील्ड बढ़ती है, ग्लोबल इन्वेस्टर अपने फंड को इन ज़्यादा सुरक्षित, ज़्यादा यील्ड वाले एसेट्स की ओर करते हैं। अमेरिका की ओर कैपिटल का यह फ्लो डॉलर को मज़बूत करता है, जबकि साथ ही रुपये जैसी उभरती हुई मार्केट की करेंसी को कमज़ोर करता है।
रुपये में गिरावट से क्या नुकसान?
बता दें कि भारतीय रुपये में गिरावट से आम आदमी की जिंदगी पर काफी असर होता है। क्योंकि, रुपये में कमजोरी से विदेशों से आयात होने वाले सामानों की लागत बढ़ती है, और इससे महंगाई बढ़ जाती है। इसके अलावा, विदेशी शिक्षा महंगी हो जाती है।
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दरअसल, ग्लोबल मार्केट्स में तेल समेत अन्य सामान को खरीदने के लिए डॉलर में पेमेंट होता है, और डॉलर के मुकाबले रुपये के कमजोर होने से खरीद लागत बढ़ जाती है और यह महंगाई के बढ़ने का कारण बनती है।
(सेंट्रल डेस्क के इनपुट के साथ) |