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सिस्टम की फाइलें बनाम एक पिता के आंसू; क्या SIT जांच दिला पाएगी युवराज को इंसाफ या फिर ठंडे बस्ते में चला जाएगा मामला?

Chikheang 1 hour(s) ago views 712
  

SIT तलाशेगी उन \“लापरवाह\“ अफसरों के नाम, जो हादसे के वक्त सो रहे थे। फोटो- एआई जनरेटेड।  



दीप्ति मिश्रा, नई दिल्‍ली। \“पापा.. मेरी कार नाले में गिर गई है, प्लीज मुझे बचा लो.. मैं मरना नहीं चाहता\“, यह सुनते ही पिता बेटे को बचाने भागे। न ठंड का डर और न जेब में पैसे। सोसायटी के गेट पर स्कूटी बंद हो गई। पिता ने सामने खड़ी कैब के ड्राइवर से हाथ जोड़कर मदद की गुहार लगाई। उस रात इंजीनियर युवराज मेहता के पिता राजकुमार मेहता के लिए वक्त सा ज्यादा कीमती कुछ नहीं था। गाड़ी दौड़ी, लेकिन हड़बड़ी में वह आगे निकल गए।

जब नाला खत्म होने आया तो बेटे को कॉल लगाया- किधर है तुम्हारी कार? कहां हो तुम? बेटे ने लोकेशन बताई तो पिता बोले- घबराना मत मैं आ रहा हूं।
पिता ने डायल 112 पर दी थी सूचना

बेटे को हम्‍मत देने वाले पिता को खुद कुछ समझ नहीं आया तो डायल 112 पर कॉल लगा दिया। कोई 20 से 25 मिनट के बाद पुलिस पहुंची। फिर फायर बिग्रेड को बुलाया गया। कड़ाके की ठंड और बर्फ-से पानी में जब पुलिस और फायर बिग्रेड भी मददगार नहीं बन पाई तो एनडीआरएफ की टीम को सूचना दी दी। जब तक एनडीआरएफ की टीम मौके पर पहुंची। कार डूब चुकी थी, लेकिन किनारे खड़े पिता की उम्मीद अभी बाकी थी।

एनडीआरएफ की टीम पानी में उतरने की तैयारी कर ही रही थी, तब तक ऑर्डर डिलीवर कर लौटा डिलीवरी बॉय युवराज की मदद के लिए बिना किसी सुरक्षा उपकरण के ही पानी में कूद गया। दूसरी ओर किनारे खड़े अधिकारी और शोरगुल सुनकर जमा हुई भीड़ वीडियो बनाने में जुटी थी।

  

करीब आधे-घंटे तक हाथ पैर मारे, लेकिन इंतजार, भ्रम और सिस्‍टम की लापरवाही के बीच एक जिंदगी दम तोड़ गई। न पिता की उम्मीद बची, न युवराज मेहता की सांसें।  फिर एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की टीम पानी में उतरी कुछ देर की मशक्‍कत के बाद इंजीनियर युवराज मेहता के शव को बाहर निकाल लिया।

  
सरकारी सिस्‍टम इमरजेंसी से निपटने को कितना तैयार, यह है जवाब!

यह हादसा सिर्फ एक कार के पानी में गिरने की कहानी नहीं है। यह चूक उस सिस्टम का आईना है, जहां इमरजेंसी से निपटने की तैयारी सिर्फ फाइलों में होती है औ इंसानी जान की कीमत हादसे के बाद तय होती है। गौर करने वाली बात यह है कि जब 16 जनवरी की रात इंजीनियर मदद के लिए तड़प रहा था, तब सिस्टम नदारद था। कर्मचारी तमाशबीन बने  हुए थे और अफसर सो रहे थे।

अफसरों की तत्‍परता चार दिन बाद मुख्‍यमंत्री के संज्ञान लेने पर नजर आई। तब कार्रवाई हुई, बयान आए और जिम्मेदारी तय करने की बातें शुरू हुईं। सवाल है कि क्या जान की कीमत कार्रवाई से पहले नहीं होती?



ग्रेटर नोएडा के सेक्‍टर 150 में टाटा यूरेका पार्क सोसाइटी निवासी राजकुमार मेहता के बेटे इंजीनियर युवराज मेहता के साथ 16 जनवरी की रात क्‍या हुआ और सिस्‍टम का रवैया कैसा रहा, यह कहानी आपने ऊपर पढ़ ली। आमजन के मन में उठने वाले सवाल भी आपने पढ़ लिए। अब  हादसा कैसे हुआ, क्‍यों हुआ और किसकी जिम्‍मेदारी बनती है? आगे पढ़ें...
युवराज मेहता कौन थे?

युवराज मेहता टाटा यूरेका पार्क सोसाइटी निवासी राजकुमार मेहता के पुत्र थे। कोरोना महामारी में मां को खो चुके युवराज पिता के साथ रहते थे। ग्रेटर नोएडा स्थिति एक यूनिवर्सिटी से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। इसके बाद गुरुग्राम की एक कंपीन में जॉब करते थे। हफ्ते में दो दिन ऑफिस जाते थे और तीन दिन घर से ही काम करते थे। हादसे की रात भी वह ऑफिस से घर लौट रहे थे। घर से महज 500 मीटर की दूरी पर यह हादसा हुआ।
युवराज के साथ हादसा कैसे हुआ?

16 जनवरी की देर रात इंजीनियर युवराज मेहता अपने दफ्तर का काम निपटाकर टाटा यूरेका पार्क सोसाइटी स्थित अपने घर लौट रहे थे। घना कोहरा था, दृश्यता बेहद कम थी। सड़क पर न तो चेतावनी बोर्ड थे, न बैरिकेडिंग और न ही कोई स्पष्ट संकेत कि आगे खतरा है। कार सीधे पानी से भरे गड्ढे में जा गिरी। सूचना मिले के बावजूद इमरजेंसी रिस्पांस सिस्टम तुरंत एक्टिव नहीं हुआ, प्रशासन समय से मदद पहुंचाने में नाकाम रहा और युवराज मेहता की डूबकर मौत हो गई।

  
युवराज के पिता ने किसे जिम्‍मेदार ठहराया?

युवराज के पिता बोले-


मेरा बेटा बचने के लिए संघर्ष कर रहा था। बार-बार चिल्‍ला रहा था- \“पापा बचाओ\“। \“हेल्‍प...हेल्‍प\“ भी चिल्‍ला रहा था ताकि जो बाकी लोग देख रहे हैं, वो मदद कर दें। वहां जो भीड़ थी, वो तमाशबीन थी। कुछ लोग वीडियो बना रहे थे।  मेरे बच्‍चे की जान खामे खा चली गई, उसे कोई उचित संसाधन नहीं मिला। उसने दो घंटा संघर्ष किया जान बचाने के लिए खुद से थोड़ा सा सपोर्ट मिलता तो बच सकता था। कोई गोताखोर या तैराक जाता और रस्‍सी के सपोर्ट से आता तो मेरे बच्‍चे की जान बच सकती थी। जो अधिकारी मौके पर पहुंचे, उनमें से किसी को तैरना नहीं आता था। उनके पास न नाव थी और न रस्‍सी।

डिलीवरी बॉय ने क्‍या आरोप लगाए?

डिलीवरी बॉय मुनेंद्र ने आरोप लगाए-

फायर बिग्रेड वाले मौके पर मौजूद थे, उनके पास सारे सुरक्षा उपकरण थे, लेकिन उन्होंने मदद नहीं की। पुलिस ने मुझे थाने बुलाया। 4 घंटे इंतजार कराया। फिर पार्क में ले जाकर मुझसे स्क्रिप्‍टेड वीडियो रिकॉर्ड कराया।  जब मेरे मुंह से पुलिस अधिकारियों के कहे मुताबिक शब्द नहीं निकले तो फिर से वीडियो बनवाया। तीन वीडियो बनाने के बाद पुलिस को अपने मन मुताबिक वीडियो मिल सका।

पुलिस ने मेरे परिवार से कहा कि अपने लड़के को कुछ दिन के लिए गायब कर दो। केस समाप्त होने के बाद तुम लोगों को यहीं रहना है। मुझे इस बात का डर है कि मैंने सिस्टम की लापरवाही और बिल्डरों के खिलाफ आवाज उठाई है, भविष्य में इसका खामियाजा मेरे परिवार को भुगतना पड़ सकता है।


पिता के पास नहीं रहा सहारा

युवराज मेहता के घर ही नहीं, सोसाइटी में भी खामोशी पसरी है। युवराज के पड़ोसी डीपी सिंह बताते हैं, राजकुमार अभी किस हाल में है, यह शब्‍दों में बयां करना बेहद मुश्किल है। युवराज की मौत के अगले दिन राजकुमार से मिला तो लगा जैसे एक ही दिन में बहुत थके, कमजोर और बूढ़े-से नजर आने लगे। यह सिर्फ एक मौत नहीं है, उनका तो परिवार ही टूट गया। बेटे के जाने से एकदम अकेले हो गए हैं।

  

राजकुमार मेहता के एक बेटी भी है, लेकिन बेटी विदेश में रहती है, उसके वीजा में कुछ समस्‍या आ गई। इस कारण बेटी न इकलौते भाई के अंतिम संस्‍कार में शामिल हो पाई और न इस दुख की घड़ी में अपने पिता के गले लगकर रो पाई। उनके फ्लैट ही नहीं, हमारी सोसायटी में भी  खामोशी पसरी है।

यह भी पढ़ें- Noida Engineer Death: \“मुझे तैरना आता तो कूदकर बचाता बेटे की जान\“, बेबस पिता को कचोट रहा लाडले को ना बचा पाने का गम
यह हादसा क्यों हुआ?

यह एक मल्टी-लेयर सिस्टम फेलियर का मामला है...
चूक-1: सड़क सुरक्षा में लापरवाही

  • जहां युवराज की कार गिरी, 30 फुट गहरा निर्माणाधीन बेसमेंट था।
  • खतरनाक हिस्सों पर न बैरिकेडिंग, न चेतावनी बोर्ड थे।
  • कोई फ्लोरोसेंट/रिफ्लेक्टिव साइन भी नहीं थे।
  • रात और कोहरे को ध्यान में रखकर प्लानिंग नहीं की।
  • न स्‍ट्रीट लाइट, वह जगह पूरी तरह \“डेथ ट्रैप\“ बनी हुई थी


चूक नंबर-2: बिल्डर की गंभीर लापरवाही


  • निर्माण स्थल सुरक्षा मानकों के बिना छोड़ा गया
  • पानी निकासी की कोई व्यवस्था नहीं
  • साइट को सील या सुरक्षित नहीं किया गया
  • इसी आधार पर बिल्डर की गिरफ्तारी हुई

चूक नंबर-3: प्रशासनिक सुस्ती.. और कागजी तैयारी

  • हादसे के वक्त त्वरित निर्णय नहीं।
  • रेस्क्यू में देरी से पहुंची, जिससे जान बचने की संभावना गई।
  • रेस्‍क्‍यू टीमों जिम्मेदारी तय करने और समन्वय में देरी हुई।
  • मौके पर वरिष्ठ अधिकारियों की गैर-मौजूदगी।
  • शुरुआती घंटों में हाई-पावर क्रेन,अंडरवॉटर कैमरा और प्रोफेशनल ड्राइवर्स समय पर नहीं लगाए गए।
  • प्रशासन की इमरजेंसी के लिए  तैयारी नहीं,  177 पेज की SOPs मौजूद लेकिन जमीन पर लागू नहीं।
  • रिस्पॉन्स टाइम तय लेकिन फॉलो नहीं हुआ।  


मामले में अब तक क्या-क्या हुआ?


  • नोएडा प्रशासन ने घटनास्‍थल के पास बैरीकेटिंग कराई।
  • मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ ने घटना पर संज्ञान लिया।
  • विशेष जांच टीम गठित की गई है, जिसकी रिपोर्ट मुख्यमंत्री को पेश करने का निर्देश है।   
  • नोएडा अथॉरिटी के CEO एम. लोकेश को उनके पद से हटा दिया गया है।
  • नोएडा प्राधिकरण के ट्रैफिक सेल के अवर अभियंता को बर्खास्त किया गया है।
  • अपराधी बिल्डर अभय कुमार को गिरफ्तार किया गया है।
  • पुलिस ने बिल्डरों और जिम्मेदारों पर FIR दर्ज की है।
  • हादसे के करीब 92 घंटे बाद युवराज की कार गड्ढे से निकाली गई।  
  
क्या बोले जिम्मेदार?
सीएम योगी ने हादसे पर संज्ञान लिया-

घटना के तीन बाद यानी 19 जनवरी को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने युवराज मेहता की मौत को गंभीरता से लेते हुए तीन सदस्यीय SIT (विशेष जांच टीम) गठित कर दी है। सीएम योगी ने टीम को पांच दिनों में विस्तृत रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया है। उन्होंने कहा कि मामले की शीघ्र और निष्पक्ष जांच सुनिश्चित की जाएगी।



गौतमबुद्ध नगर के सांसद डॉ. महेश शर्मा ने घटनास्‍थल का दौरा भी किया और युवराज के पिता से भी मिले।

सांसद महेश शर्मा ने कहा-  


दो माह पहले मैंने इस बाबत एक पत्र लिखा था, लेकिन दुर्भाग्य से उस पर संज्ञान में नहीं लिया गया, लेकिन योगी के राज में दोषियों को बख्‍शा नहीं जाएगा।


  
एसआईटी क्‍या जांच कर रही है?

दरअसल, एसआईटी दो घंटे की देरी का जवाब तलाश रही है...

  • आखिर युवराज को दो घंटे तक मदद क्‍यों नहीं मिली?
  • क्‍या मौके पर मौजूद संसाधन नाकाफी थे?
  • क्‍या एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी थी?
  • क्या किसी ने जिम्मेदारी लेने से बचने की कोशिश की?
  • हादसे से 15 दिन पहले ट्रक भी गड्ढे में गिरा था, तब बैरीकेटिंग क्‍यों नहीं गई?



एसआईटी इन सभी मुद्दो पर गहराई से जांच कर रही है।

  
युवराज मौत मामले में क्या होना चाहिए?

  • बिल्डर और नोएडा अथॉरिटी के जिम्मेदार अफसर दोनों पर चार्जशीट दायर हो।
  • एसआईटी की जांच रिपोर्ट पब्लिक डोमेन में साझा की जाए।
  • मामले को फास्ट-ट्रैक कोर्ट में ले जाया जाए।
  • SOP तोड़ने वालों की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (ACR) में एंट्री हो



इसके साथ ही भविष्य में बिना सेफ्टी सर्टिफिकेट कोई साइट खुली न रहे, यह सुनिश्चित किया जाए। ताकि अगला युवराज न हो किसी हादसे का शिकार न हो।  

  
निर्माण स्थलों के लिए क्‍या किया जाए?

सभी निर्माण स्थलों पर बैरिकेडिंग, रिफ्लेक्टर, चेतावनी बोर्ड, रात में लाइटिंग,मानसून/कोहरे से पहले सेफ्टी ऑडिट अनिवार्य किया जाए।
लापरवाही या हीलाहवाली होने पर क्या किया जाए?

  • भारी जुर्माना लगाया जाए
  • लाइसेंस कैंसिलेशन किया जाए


यह भी पढ़ें- नोएडा इंजीनियर मौत मामले की जांच के लिए पहुंची SIT, आरोपी बिल्डर गिरफ्तार; 96 घंटे बाद निकाली गई कार
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