सिंधी भाषा में अध्ययन करती महिलाएं। सौ. संस्था
गजाधर द्विवेदी, गोरखपुर। सिंधी समाज ने अपनी जड़ों से जुड़ने के लिए मातृभाषा संरक्षण को जनआंदोलन का रूप दे दिया है। इस अभियान की सबसे मजबूत कड़ी बनी हैं समाज की माताएं-बहनें, जिन्होंने घर-घर जाकर बच्चों में सिंधी भाषा के संस्कार रोपने का नवाचार शुरू किया है। नई पीढ़ी न केवल सिंधी बोली और भाषा से परिचित हो रही है, इसकी विधिवत पढ़ाई कर सर्टिफिकेट, डिप्लोमा और एडवांस डिप्लोमा जैसे कोर्स कर रही है।
पुस्तकों और कक्षाओं से आगे बढ़कर संवाद, व्यवहार और स्नेह के माध्यम से मातृभाषा को जीवित रखने का अभियान पूरे समाज के लिए प्रेरणा बन रहा है। वर्ष 2019-20 से अब तक इन पाठ्यक्रमों में 217 लोगों ने शिक्षा ग्रहण की, जिसमें 179 महिलाएं हैं। उनका मानना है कि मातृभाषा के प्रति मातृ शक्ति जागरूक हो गईं तो संरक्षण आसान होगा।
भारत-पाकिस्तान विभाजन की त्रासदी में भारत आए सिंधी समाज के सामने उस दौर में सबसे बड़ी चुनौती रोटी और रोजगार थी। विस्थापन का दर्द, अनजाना भविष्य और नई जमीन पर पैर जमाने की जिद्दोजहद में भाषा, साहित्य और संस्कृति जैसे सरोकार पीछे छूटते चले गए।
समय के साथ पीढ़ियां बदलीं, संघर्ष की तपिश में समाज ने आर्थिक रूप से खुद को सशक्त किया, लेकिन इस यात्रा में जड़ों से कटने का अहसास भीतर ही भीतर गहराता गया। जब सब कुछ मिल गया, तब यह समझ आया कि अपनी पहचान, अपनी बोली और अपनी परंपराओं को खो देना बड़ा नुकसान है।
इसी एहसास ने सिंधी समाज में नई चेतना को जन्म दिया है। समाज की महिलाओं ने सिंधी भाषा, साहित्य और संस्कृति को फिर से जीवित करने का संकल्प लिया। राष्ट्रीय सिंधी भाषा विकास परिषद दिल्ली के सहयोग से संचालित पाठ्यक्रमों से जुड़कर महिलाओं ने खुद को भाषाई रूप से समृद्ध करने का प्रयास शुरू किया।
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सर्टिफिकेट, डिप्लोमा और एडवांस डिप्लोमा पाठ्यक्रमों के लिए नाम लिखवाया। पूज्य माता साहिब आश्रम जटाशंकर में दोपहर 12 से तीन बजे तक चलने वाली कक्षाओं में व्याकरण और लिपि सीखने के बाद वे हर सप्ताह अपने घरों से निकलकर सिंधी परिवारों तक पहुंचती हैं, बच्चों से सिंधी में बात करती हैं, उनसे सरल सवाल पूछती हैं और सही उत्तर मिलने पर स्नेह से उन्हें पुरस्कृत करती हैं।
बच्चे जब हिचक छोड़कर अपनी मातृभाषा में उत्तर देते हैं, तो मानो वर्षों से सोई हुई भाषा फिर से मुस्कुरा उठी हो। परीक्षाएं हालमार्क वर्ल्ड स्कूल में कराई जाती है।
मातृभाषा मां की तरह होती है, जो संस्कार, पहचान और जीवन को दिशा देती है। यदि भाषा सुरक्षित रहेगी, तो संस्कृति और परंपराएं स्वतः जीवित रहेंगी। राष्ट्रीय सिंधी भाषा विकास परिषद की यह पहल केवल भाषा के संरक्षण का प्रयास नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से दोबारा जुड़ने की यात्रा है। -
-सरिता इसरानी, शिक्षक |