search
 Forgot password?
 Register now
search

उत्तर भारत में सांप्रदायिक द्वेष भड़काने के ...

deltin55 2025-10-8 13:25:34 views 1023


  • राम पुनियानी  
यह 'आई लव मोहम्मद' वाला पुराना प्रकरण मुसलमानों को डराने-धमकाने और हाशिए पर धकेलने की स्थिति को और बदतर बना रहा है। अपने पैगम्बर के प्रति इस तरह के स्नेह का प्रदर्शन लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति के दायरे में आता है। जैसा कि पाकिस्तान में कुछ तालिबानी तत्व दावा करते हैं कि भारत के साथ हर टकराव गज़वा है..., यहां हमारे प्रधानमंत्री मामले को उसी दिशा में ले जा रहे हैं।   
सांप्रदायिक हिंसा भारतीय राजनीति का अभिशाप रही है। यह एक सदी से भी ज़्यादा पुरानी है। इस घटना के ज़्यादातर विद्वानों के अनुसार, यह हिंसा आमतौर पर सुनियोजित होती है। इस हिंसा के बाद सांप्रदायिक धु्रवीकरण का उदय होता है। विद्वानों का यह भी मानना है कि 'दंगे जातीय धु्रवीकरण पैदा करते हैं जिससे कांग्रेस की कीमत पर जातीय-धार्मिक दलों को फ़ायदा होता है'। उनका मानना है कि जहां हिंदू-मुस्लिम दंगे कांग्रेस के लिए चुनावी तौर पर महंगे होते हैं, वहीं ये दंगे वास्तव में 'कांग्रेस जैसी बहुजातीय पार्टियों की कीमत पर जातीय-धार्मिक दलों' को मज़बूत करते हैं। इस अवलोकन के अनुसार, हिंसा भड़काने और उसका चुनावी फ़ायदा उठाने के लिए ज़्यादा से ज़्यादा बहाने गढ़े जा रहे हैं।  




इस लंबी सूची में नए बहाने जुड़ते जा रहे हैं, जैसे मस्जिद के सामने तेज़ संगीत बजाना, मंदिरों में गोमांस फेंकना और अफ़वाहें फैलाना, जो नफ़रत फैलाने की मुख्य प्रवृत्ति रही है। इसके अलावा, मुस्लिम राजाओं का दानवीकरण, उनके द्वारा मंदिरों का विध्वंस, तलवार के बल पर इस्लाम का प्रसार, उनके बड़े परिवारों के कारण इस देश में हिंदुओं के अल्पसंख्यक होने का ख़तरा, ये सब नफ़रत फैलाने के तरीक़ों में जुड़ गए हैं। पिछले कुछ दशकों में गाय, गोमांस भक्षण, लव जिहाद, और कई अन्य जिहाद भी जुड़े हैं, जिनमें सबसे प्रमुख हैं कोरोना जिहाद, ज़मीन जिहाद और सबसे नया 'पेपर लीक जिहाद'।  




यह सब याद आता है, क्योंकि इस समय देश में 'आई लव मोहम्मद' जैसे एक मामूली नारे के इर्द-गिर्द हिंसा का माहौल है। इसकी शुरुआत कानपुर से हुई, जब मिलादुन्नबी के मौके पर पैगंबर मोहम्मद के जन्मदिन के जश्न में निकले जुलूस में कुछ लोगों के 'आई लव मोहम्मद' के बैनर पर इस आधार पर आपत्ति जताई कि इससे इस धार्मिक त्योहार में एक नई परंपरा जुड़ रही है। पुलिस के एक हिस्से ने इस तर्क को स्वीकार कर लिया और ऐसे पोस्टर लगाने वालों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज की। यह उन मानदंडों का पूर्णत: उल्लंघन है जिनके अनुसार इस पैगम्बर के प्रति सम्मान व्यक्त करने वाला एक शांतिपूर्ण जुलूस किसी भी मानदंड का उल्लंघन नहीं है। इसके बाद उत्तर प्रदेश के कई जिलों में हिंसा फैल गई।  




कानपुर की घटना पहली घटना थी और उत्तर प्रदेश के बरेली, बाराबंकी और मऊ जिलों में, उत्तराखंड के उधम सिंह नगर जिले के काशीपुर में और कई अन्य जगहों पर भी इसकी पुनरावृत्ति हुई।  
इसके बाद पोस्टर फाड़े गए और हिंसा हुई और माहौल बिगड़ गया। एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स (एपीसीआर) के दस्तावेज़ों के अनुसार, 'आई लव मोहम्मद' से जुड़ी 21एफ़आईआर दर्ज की गईं, जिनमें 1324 लोग प्रभावित हुए और 38गिरफ़्तारियां हुईं। बरेली में कुछ दिनों के लिए इंटरनेट बंद कर दिया गया और एक स्थानीय मुस्लिम नेता मौलाना तौकीर रज़ा खान को एक हफ़्ते के लिए नज़रबंद कर दिया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि मुसलमानों को बेतरतीब ढंग से परेशान किया जा रहा है। उन्होंने कानपुर की घटना पर एक ज्ञापन सौंपने का आह्वान किया था। इसमें वे ख़ुद शामिल नहीं हुए और हंगामा मचा दिया। इस गैरज़िम्मेदाराना हरकत के कारण कई मुसलमानों को गिरफ़्तार कर लिया गया।  




इस पूरे घटनाक्रम ने मुसलमानों के ख़िलाफ़ अंतर्निहित नफ़रत को भी उजागर किया। जैसा कि अक्सर होता है, शीर्ष सांप्रदायिक नेता बेतुके बयान देते हैं जिससे सांप्रदायिक तत्व अपने नफ़रत भरे अभियान को तेज़ कर देते हैं और हिंसा को जन्म देते हैं। श्री मोदी बार-बार ऐसा करते रहे हैं, ज़्यादातर चुनावों के समय। इस बार उनके अभियान 'घुसपैठिए' शब्द को सामने ला रहे हैं। यह परिघटना बिहार और खासकर असम में मुसलमानों के लिए अभिशाप बन गया है। बिहार के बाद, जहां 47 लाख से ज़्यादा मतदाता मताधिकार से वंचित हैं, पूरे देश में लागू किए जाने वाले ख़तरनाक मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुरनरीक्षण (एसआईआर) के औचित्य में से एक यही है।  

इस बार, उत्तर प्रदेश, जहां सबसे ज़्यादा घटनाएं हुई हैं, के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ऐसे बयान दिए जो राज्य के एक मुख्यमंत्री को शोभा नहीं देते। उन्होंने कहा कि वे 'गज़वा-ए-हिंद' का नारा लगाने का सपना देखने वालों को 'जहन्नुम के टिकट' देंगे। यह गज़वा-ए-हिंद यहां कहां से आ गया? भारतीय मुसलमानों का एक वर्ग, गज़वा नहीं, बल्कि 'आई लव मोहम्मद' का नारा लगाता रहा है... यह गज़वा का नारा तालिबानी किस्म के लोगों द्वारा इस्तेमाल किया गया है और हिंदू दक्षिणपंथी पूरे मुस्लिम समुदाय पर इसके लिए आरोप लगा रहे हैं। इसलिए, कुरान में गज़वा-ए-हिंद का कोई स्थान नहीं है। एक संदिग्ध हदीस में यह शब्द आता है, लेकिन यहां हिंद का मतलब बसरा है, भारत नहीं। पाकिस्तान में कई ऐसे कट्टरपंथी हैं जो दावा करते हैं कि हर युद्ध भारत के खिलाफ गज़वा है...।  

योगी ने आगे कहा कि 'आई लव मोहम्मद' के पोस्टर अराजकता फैलाने के लिए लगाये जा रहे हैं। उन्होंने हिंदुओं से हिंदू विरोधी और राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों से सावधान रहने को कहा... (इंडियन एक्सप्रेस, मुंबई संस्करण, 29 सितंबर, पृष्ठ 6) यह भारत के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ द्वेष पैदा करने का सबसे बुरा उदाहरण है। यह नारा अराजकता कैसे पैदा कर सकता है? यह नारा राष्ट्र-विरोधी कैसे है, यह समझ से परे है। उनके बयान लोकतांत्रिक मानदंडों का उल्लंघन करते हैं, जो हमें शांतिपूर्ण तरीके से अपनी भावनाओं को व्यक्त करने का अधिकार देते हैं।  

यह 'आई लव मोहम्मद' वाला पुराना प्रकरण मुसलमानों को डराने-धमकाने और हाशिए पर धकेलने की स्थिति को और बदतर बना रहा है। अपने पैगम्बर के प्रति इस तरह के स्नेह का प्रदर्शन लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति के दायरे में आता है। जैसा कि पाकिस्तान में कुछ तालिबानी तत्व दावा करते हैं कि भारत के साथ हर टकराव गज़वा है..., यहां हमारे प्रधानमंत्री मामले को उसी दिशा में ले जा रहे हैं। क्रिकेट में पाकिस्तान पर जीत के बाद, उन्होंने कहा कि यह ऑपरेशन सिंदूर का ही विस्तार था।  

ऐसी स्थिति में मुस्लिम समुदाय क्या प्रतिक्रिया देता है? तेज़ संगीत बजाते डीजे वाले रामनवमी के जुलूस और कुछ उपद्रवियों द्वारा मस्जिदों पर जबरन भगवा झंडा फहराने के विपरीत, मुसलमानों द्वारा इस तरह के शांतिपूर्ण जुलूस निकालना बिल्कुल सामान्य है! हमारे कुछ हिंदू त्योहारों को हथियार बनाया जा रहा है! इरफ़ान इंजीनियर और नेहा दाभाड़े की किताब 'हिंदू त्योहारों का हथियारीकरण' में ज़मीनी स्तर पर की गई जांच से पता चलता है कि ख़ास तौर पर रामनवमी के जुलूस का इस्तेमाल मस्जिदों और मुस्लिम बहुल इलाकों के आसपास उपद्रव मचाने के लिए किया जा रहा है। इसके विपरीत मुस्लिम त्योहारों को बदनाम किया जा रहा है। 'आई लव मोहम्मद' वाला मिलादुन्नबी इसका दर्दनाक उदाहरण है।  

मुस्लिम त्योहारों पर इस तरह की नफ़रत भरी प्रतिक्रियाएं, जैसा कि हाल ही में देखा गया है, दिलों के विभाजन, समुदाय के ध्रुवीकरण और भारतीय संविधान के अभिन्न अंग, हमारे भाईचारे के मूल्यों को कमज़ोर करने का काम करती हैं। इसके अलावा, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारा दिए जा रहे बयान संवैधानिक नैतिकता के बिल्कुल विपरीत हैं। ऐसी परिस्थिति में मुस्लिम समुदाय को यथार्थवादी होना चाहिए और हिंदू सांप्रदायिक तत्वों को उन पर हमला करने या उन्हें और बदनाम करने का कोई बहाना नहीं देना चाहिए।






Deshbandhu



politicsUttar PradeshBJP leader









Next Story
like (0)
deltin55administrator

Post a reply

loginto write comments
deltin55

He hasn't introduced himself yet.

410K

Threads

12

Posts

1310K

Credits

administrator

Credits
132715

Get jili slot free 100 online Gambling and more profitable chanced casino at www.deltin51.com