अपने ही गणतंत्र को नकारता रहा सिनेमा
विनोद अनुपम, मुंबई। हिंदी सिनेमा से यह उम्मीद कोई ज्यादा तो नहीं कही जा सकती कि जब 26 जनवरी, 1950 को भारतीय संविधान लागू कर भारत में गणतंत्र की स्थापना की जा रही थी, तो हिंदी सिनेमा में कहीं न कहीं उसकी गूंज सुनाई देनी चाहिए थी। जब 1951 के अक्टूबर से 1952 की फरवरी तक तमाम असुविधाओं के बीच 68 चरणों में देश में पहले संसदीय चुनाव संपन्न हो रहे थे, तो कहीं न कहीं सिनेमा के पर्दे पर चुनावों के प्रति एक सम्मान तो दिखना चाहिए था, लंबी परतंत्रता के बाद अपनी सरकार चुनते लोगों के उत्साह तो पर्दे पर चमकने चाहिए थे, लेकिन हिंदी सिनेमा के इतिहास पर नजर डालें तो सिर्फ निराशा मिलती है।
1950 में वी. शांताराम, ए. आर. कारदार, सोहराब मोदी, रमेश सैगल जैसे फिल्मकारों की उपस्थिति के बावजूद एक भी ऐसी फिल्म नहीं दिखती, जिसमें गणतंत्र की झलक दिखती हो। अशोक कुमार ने तो ‘समाधि’ और ‘संग्राम’ जैसे एक्शन थ्रिलर में सफलता का रास्ता ढूंढ लिया था। सिनेमा को धिक्कारते हुए प्रेमचंद गलत नहीं लौटे थे, किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को देश की वर्तमान राजनीति के प्रति सिनेमा की यह निरपेक्षता चिंतित कर सकती है। आश्चर्य नहीं कि देश जब अपने पहले आम चुनाव में उलझा हुआ था, सिनेमा ‘आन’, ‘बैजू बावरा’ और ‘दाग’ जैसी फिल्मों की सफलता के साथ सुकून की सांसें भर रहा था।
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नकारात्मक ही रही सिनेमा की नजर
हालांकि हिंदी सिनेमा के राजनीतिक विमर्श की क्षमता 1946 में गोर्की की कहानी पर आधारित ‘नीचा नगर’ के साथ ही दुनियाभर में सराही जाने लगी था, मगर पहले आम चुनाव तक सिनेमा ने जैसे चुप्पी साध रखी। लेकिन पहली निर्वाचित सरकार गठित होने के बाद जब देश सुकून में था, सिनेमा की जैसे राजनीतिक चेतना जागृत हो उठी और ‘दो बीघा जमीन’(1953) जैसी फिल्मों के साथ स्वाधीनता, संविधान और संसद जैसी तमाम उपलब्धियां, जिन पर देश गर्व कर रहा था, उसे निरर्थक साबित करने की कोशिशों में जुट गई। जो ‘जागते रहो’ (1956), ‘मदर इंडिया’(1957) जैसी फिल्मों के साथ आज तक जारी है।
गणतंत्र पर क्यों नहीं बनीं फिल्में?
सवाल यह नहीं कि स्वतंत्रता के पहले दशक में जब देश आकार लेने की कोशिश कर रहा था, बलिदानों से हासिल इस तरह गणतंत्र की व्यवस्था पर सवाल उठाती फिल्मों का बनना गलत था, गलत यह लगता है कि सिर्फ नकारात्मक ही क्यों? ‘दो बीघा जमीन’ से लेकर आज ‘जवान’, ‘रेड’ और ‘सिकंदर’ तक क्या कोई एक भी हिंदी फिल्म याद की जा सकती है, जिसमें आम चुनावों के अधिकारों को गौरवान्वित किया गया हो। क्या कोई एक भी फिल्म याद की जा सकती है, जिसमें हमारे निर्वाचित प्रतिनिधि हमारे हित में काम कर रहे हों, ईमानदार हों, कर्मठ हों, देश के लिए समर्पित हों? थोड़ा आश्चर्य कि सरदार पटेल, राम मनोहर लोहिया, जवाहर लाल नेहरू वहीं राज्यों में श्री बाबू से लेकर कामराज तक तमाम जनप्रतिनिधियों को देखते हुए भी सिनेमा कोई ईमानदार अनुकरणीय राजनीतिक चरित्र गढने के लिए तैयार नहीं हो सका। वी. शांताराम ‘डा. कोटनीस की अमर कहानी’ जैसी फिल्म बना रहे थे, मोहन कुमार विश्व शांति पर केंद्रित ‘अमन’ बना रहे थे, जाहिर है हिंदी फिल्मकारों की राजनीतिक चेतना पर सवाल नहीं, सवाल यह कि आखिर भारतीय गणतंत्र, विषय के रुप में उन्हें आकर्षित क्यों नहीं कर पा रहा था?
वास्तव में इसका कारण भारतीय बौद्धिकता पर स्वतंत्रता के बाद बढ़ते वामपंथी प्रभाव में देखा जा सकता है। उस दौर के भारतीय सिनेमा के इतिहास पर नजर डालें तो तमाम सक्रिय नाम या तो कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े दिखते हैं या फिर समर्थक। महबूब खान प्रोडक्शन के तो लोगो में ही हसिया-हथौड़ा था। जाहिर है, जो सिनेमा कभी ब्रिटिश सेंसर के बावजूद स्वतंत्रता के लिए आवाज उठा रहा था, उसे स्वतंत्रता निरर्थक लगने लगी। स्वतंत्रता के बाद जिस तरह सरकार की शह पर भारतीय सिनेमा बाजार पर सोवियत हस्तक्षेप को बढ़ावा दिया गया, यह स्वाभाविक भी था। ‘सिर पर लाल टोपी’ रखकर कोई भारतीय गणतंत्र की सराहना तो नहीं कर सकता था। आज गणतंत्र के 75 साल पूरे होने के बाद भी भारतीय सिनेमा उस बौद्धिक आतंक से उबरते नहीं दिखती। यह अवश्य है कि ‘सरदार’ जैसे कुछ बायोपिक भी अब बनने लगे हैं, लेकिन यदि फिक्शन की बात करें तो अभी भी ‘रंग दे बसंती’ से लेकर ‘पुष्पा’ तक, जनप्रतिनिधि को भ्रष्ट और संवैधानिक व्यवस्था को नकारा साबित करने की होड़ सी दिखती है। हर नायक अकेले न्याय भी करता दिखता और सजा देता भी। सिनेमा यह कैसी संवैधानिक व्यवस्था को गौरवान्वित करता है, जिसमें सारे फैसले ताकत और बंदूक की नोक पर लिए जाते दिखते हैं!
सामने आया एक और रूप
वास्तव में मानें या न मानें, सिनेमा एक वैचारिक षड्यंत्र में पूरी तरह लिप्त दिखता है, जिसका उद्देश्य भारत के संवैधानिक ढांचे को कमजोर करना है। कम्युनिस्ट पार्टियां जिसकी इच्छा दिलों में संजोए जवान होती रहीं। इस षड्यंत्र का सिनेमा से वीभत्स रूप अब वेब सीरीज में दिखने लगा है, क्योंकि इसकी तो बुनियाद ही स्वच्छंदता पर टिकी है। हाल ही में आई ‘महारानी 4’ में सीधे तौर पर देश के प्रधानमंत्री को भी निशाने पर लिए जाने से संकोच नहीं किया जाता। गौर से देखें तो भले ही झलक किसी और प्रधानमंत्री की मिलती हो, लेकिन प्रधानमंत्री के लिए उसी भाषा का प्रयोग जो आज का विपक्ष कर रहा है, स्पष्ट कर देता है कि वास्तव में निशाने पर कौन हैं। सिनेमा यह समझने के लिए तैयार ही नहीं कि प्रधानमंत्री एक कोई व्यक्ति नहीं होता, वह देश का प्रतिनिधि होता है, उसे देश ने अपने संवैधानिक अधिकार से चुनकर वहां बिठाया होता है। जब हम उन्हें गलत कह रहे होते हैं तो कहीं न कहीं पूरी व्यवस्था को ही गलत कह रहे होते हैं।
आखिर संवैधानिक व्यवस्था के प्रति इस हद तक अविश्वास को क्या समझा जाए? संविधान लागू होने के 75 वर्ष बाद भी सिनेमा जैसे लोकप्रिय और संप्रेष्य कला माध्यम में भी यदि हम अपने संवैधानिक व्यवस्था के प्रति प्रतिष्ठा नहीं जगा सके, तो इसे चेतावनी के रूप में स्वीकार करना चाहिए कि आखिर चूक कहां हुई!
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