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Himachal Statehood Day: हिमाचल प्रदेश ने 56 वर्ष में क्या पाया और क्या हैं चुनौतियां, क्यों उभर रहे नए खतरे?

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हिमाचल प्रदेश को पूर्ण राज्य बने 56 वर्ष हो गए हैं।  



जागरण टीम, शिमला। मैं हिमाचल हूं... और आज मैं खुद से हिसाब मांग रहा हूं। 25 जनवरी को अपना 56वां पूर्ण राज्यत्व दिवस मनाते हुए क्या मैं केवल जश्न मनाऊं या अपनी सच्चाइयों से भी आंख मिलाऊं? मेरे पास देश की एक चौथाई जलविद्युत क्षमता है, मजबूत बागवानी अर्थव्यवस्था है।

उभरता उद्योग है और सामाजिक विकास के पैमानों पर मैं अग्रणी राज्यों में शामिल हूं। लेकिन, एक सच यह भी है कि मेरा कर्ज एक लाख करोड़ रुपये के पार जा चुका है। प्राकृतिक आपदाएं मेरी आर्थिकी को झकझोर रही हैं, बेरोजगारी और नशा मेरी युवा पीढ़ी के लिए चुनौती हैं और जलवायु परिवर्तन की टेढ़ी नजर मेरी खेती-बागवानी पर है।

मैं हरित राज्य बनने का सपना देख रहा हूं, ग्रीन हाइड्रोजन और ई-मोबिलिटी की राह पकड़ रहा हूं, मगर क्या मेरे फैसलों को मेरे इरादों का साथ मिलेगा? आज उत्सव का दिन है...साथ ही आत्ममंथन का भी...मैं आने वाली पीढ़ियों को और सुरक्षित, समृद्ध और टिकाऊ राज्य के रूप में मिलूं..।  
शक्ति: जिस पर हिमाचल को गर्व

अपार जल संसाधन

हिमाचल में अपार जल संसाधन है। प्रदेश में सतलुज, ब्यास, रावी, चिनाब और यमुना नदियां बहती है। कुल 24 हजार मेगावाट बिजली उत्पादन में से 1,290 मेगावाट का दोहन हो रहा है। यह भारत की कुल जलविद्युत क्षमता का लगभग 25 प्रतिशत है। हिमाचल हरियाणा व दिल्ली सहित अन्य राज्यों को भी पानी की आपूर्ति को पूरा कर रहा है। हिमाचल ने 31 मार्च 2026 तक हरित राज्य बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया है। ई-बसों, सौर ऊर्जा व ग्रीन हाइड्रोजन पर भी जोर दिया जा रहा है। गर्म पानी से भी बिजली उत्पादन की संभावनाओं को राज्य में तलाशा जा रहा है।  
सुदृढ़ बागवानी अर्थव्यवस्था सेब का योगदान

सेब राज्य के साथ हिमाचल अब फल राज्य बनने की ओर अग्रसर है, जिसमें 1050 करोड़ रुपये की एचपी-शिवा योजना का अहम योगदान होगा। नागपुर से संतरा, लखनऊ से अमरूद व इजरायल व स्पेन से उन्नत किस्मों के फलदार पौधे उगाए जा रहे हैं। मार्च 2026 तक 3500 हेक्टेयर क्षेत्र को इस योजना के अधीन लाया जाएगा। बागवानों की आय को तीन से पांच वर्षों में तीन से चार गुणा तक बढ़ाने का लक्ष्य है। आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में राज्य की अर्थ व्यवस्था में प्राथमिक क्षेत्र के योगदान में निरंतर वृद्धि हुई है।  
पर्यटन और सांस्कृतिक विरासत

हिमाचल के सकल राज्य घरेलू उत्पाद में पर्यटन उद्योग का योगदान करीब 7.78 प्रतिशत है। यह आतिथ्य, परिवहन, हस्तशिल्प और अन्य संबंद्ध उद्योगों से जुड़ी गतिविधियों से प्रेरित है। अनछुए पर्यटन स्थलों तक पर्यटक पहुंच सके इसके लिए सरकार लगातार प्रयास कर रही है। धर्मशाला में 4.3 किमी लंबी जिपलाइन को मंजूरी दी जा चुकी है। शिमला में विश्व का दूसरा सबसे बड़ा 13.79 किमी लंबा रोपवे बनने जा रहा है। कांगड़ा के बनखंडी में अंतरराष्ट्रीय स्तर का चिड़ियाघर बनाया जा रहा है। फोरलेन के किनारे फाइव स्टार होटल बनाए जा रहे हैं।
उच्च सामाजिक विकास सूचकांक

पहाड़ी राज्य हिमाचल ने सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी) सूचकांक में लंबी छलांग लगाई है। देश के शीर्ष पांच राज्यों में शामिल हुआ है। 2023-2024 के मूल्यांकन में हिमाचल का मानव विकास सूचकांक औसत 0.78 है, जो राष्ट्रीय औसत 0.63 से अधिक है। औसत आयु बढ़कर 72 वर्ष हो गई है। गरीबी दर गिरकर सात प्रतिशत रह गई। अन्य राज्यों की तुलना में हिमाचल ने नौ लक्ष्यों में राष्ट्रीय औसत से बेहतर प्रदर्शन किया है।
उभरता औद्योगिक और फार्मा हब

सोलन जिले का औद्योगिक क्षेत्र बद्दी एशिया के सबसे बड़े फार्मा हब के रूप में पहचान बना रहा है। यह क्षेत्र हिमाचल के लोगों के साथ देशभर के लोगों को रोजगार दे रहा है। मेडिकल डिवाइस पार्क व बल्क ड्रग पार्क बनाने का कार्य चल रहा है। यह देश में दवा व उपकरणों की जरूरतों को पूरा करेंगे। अर्थ एवं सांख्यिकी विभाग के अनुसार प्रदेश में औद्योगिक क्षेत्र का जीवीए 86695 करोड़ को भी पार कर चुका है। वित्तीय वर्ष 2024-25 की रिपोर्ट के अनुसार औद्योगिक क्षेत्र (खनन और उत्खनन सहित) का योगदान 40 प्रतिशत है।  
कमजोरियां...जिनसे पाना होगा पार

अत्यधिक कर्ज और वित्तीय संकट

राज्य का कुल कर्ज एक लाख करोड़ के आंकड़े को पार कर चुका है। कुल बजट में प्रति 100 रुपये में से वेतन पर 25, पेंशन पर 20, ब्याज अदायगी पर 12, ऋण अदायगी पर 10 व स्वायत संस्थानों की ग्रांट पर नौ रुपये खर्च हो रहे हैं। 24 रुपये पूंजीगत व अन्य विकास कार्यों पर व्यय हो रहे हैं। यही वजह है कि ऋण का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है। इस वित्तीय वर्ष में 7200 करोड़ रुपये की सीमा तय की थी, जिसे हिमाचल ले चुका है। राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंध (एफआरबीएम) रिपोर्ट के अनुसार राज्य में वेतन व पेंशन का खर्चा लगातार बढ़ रहा है।  
प्राकृतिक आपदा से भी दबाव

पिछले तीन सालों में प्राकृतिक आपदाओं से भी हिमाचल की आर्थिकी दबाव में है। प्राकृतिक आपदाओं से सरकारी कोष पर बोझ बढ़ता जा रहा है तो जीएसटी दरों में बदलाव व उत्पादन शुल्क प्राप्तियों में भी कमी से अर्थव्यवस्था पर बोझ बढ़ा है। इस कारण हिमाचल को 46,000 करोड़ (राज्य के सकल घरेलू उत्पाद का सालाना लगभग चार प्रतिशत) का नुकसान हुआ है। राजकोषीय घाटा बजट अनुमानों में प्रस्तावित 10337.97 करोड़ के मुकाबले बढ़कर 12114 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है।  
बुनियादी ढांचे का अभाव

हिमाचल विकास की राह पर आगे बढ़ रहा है, लेकिन दूसरी तरफ बुनियादी सुविधाओं का अभाव इसके आड़े आ रहा है। प्रदेश में औद्योगिक निवेश की राह में रेल व हवाई सेवाओं की कमी है। इसके अलावा कनेक्टिविटी भी एक बड़ा कारण है।  
बेरोजगारी और नशे की बढ़ती समस्या

पिछले तीन सालों में बेरोजगारी की दर में 1.4 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। वर्ष 2021-22 में यह दर चार प्रतिशत थी जो 2023-24 तक 5.4 हो गई। हिमाचल के रोजगार कार्यालयों में 6.75  लाख से अधिक आवेदक पंजीकृत है। विभाग का कहना है कि यह आवश्यक नहीं कि सभी पंजीकृत युवा बेरोजगार हों।  हिमाचल में फैलता नशे का जंजाल बड़ी चुनौती बन गया है। खासकर सिंथैटिक ड्रग (चिट्टा) ने युवा पीढी को जकड़ लिया है। प्रदेश की 634 पंचायतें ऐसी है, जिसमें सबसे अधिक युवा नशे में फंसे हैं। इसे रेड जोन में अंकित किया है। सरकार ने नशे पर प्रहार के लिए अभियान तेज कर दिया है।
वायु परिवर्तन का कृषि और बागवानी पर प्रभाव

हिमाचल में पांच हजार करोड़ रुपये की सेब आर्थिक व कृषि बागवानी पर जलवायु परिवर्तन का सीधा असर पड़ रहा है। वर्ष 2010 में सेब की पेटियों का उत्पादन 4.10 करोड़ था जो अब 2.20 से 3.20 करोड़ पहुंच गया है। इस वर्ष तीन महीने के सूखे के बाद 23 जनवरी को हिमपात ने उम्मीदें बढ़ाई हैं, लेकिन आने वाले महीनों में बागवानों के लिए जलवायु परिवर्तन कम चुनौतियां नहीं होगी। पौधों में लगने वाली बीमारियों के अलावा मार्च व अप्रैल में होने वाली हिमपात व ओलावृष्टि सबसे बड़ी चुनौती है। कृषि क्षेत्र सिकुड़ रहा है।  
अवसर : जिनमें है संभावनाओं का अनंत आकाश  

ग्रीन हाइड्रोजन और हरित ऊर्जा राज्य

सोलन जिला के नालागढ़ में ग्रीन हाइड्रोजन का पहला प्लांट 9.04 करोड़ की लागत से बनेगा। ग्रीन हाइड्रोजन से बसें चलाने की योजना बना रही है। ई-वाहन के लिए हिमाचल में ग्रीन कोरिडोर बनाए गए हैं। अब जगह जगह ई-चार्जिंग स्टेशन स्थापित किए जा रहे हैं, ताकि लोग इसको ही प्राथमिकता दें। हर सरकारी विभाग में ई-चार्जिंग अनिवार्य किया है। पंचायत, स्कूल, स्वास्थ्य संस्थानों में सौर ऊर्जा संयत्र लगाए जा रहे हैं ताकि ये खुद इस्तेमाल के लिए बिजली पैदा कर सकें।  
आधुनिक खेती और खाद्य प्रसंस्करण

हिमाचल देश के लिए प्राकृतिक खेती में मिसाल के रूप में सामने आया है। देश का पहला राज्य है, जिसने प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने को प्राकृतिक रूप से उगाई गेंहू 60, मक्की 40, हल्दी 90 रुपए प्रतिकिलो की दर से खरीदना शुरू किया है। इन उत्पादों से प्राकृतिक दलिया, मसाले और अन्य फलों से प्रसंस्करण तैयार किए जा रहे हैं। सरकार की इन उत्पादों के विदेशों में बेचने की योजना है। इसके लिए कई देशों के साथ संपर्क साधा गया है।  
वेलनेस और चिकित्सा पर्यटन

हिमाचल में चिकित्सा पर्यटन को बढ़ावा दिया जा रहा है। आयुष विभाग हिमाचल में केरल की तर्ज पर वेलनेस सेंटर बनाने जा रहा है, जिसमें पंचकर्मा पद्धति से उपचार की सुविधा मिलेगी। स्वास्थ्य केंद्रों के अलावा होटलों में यह सुविधा उपलब्ध होगी। इससे चिकित्सा पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा।  
आइटी और डिजिटल हब

हिमाचल सरकार ने सरकारी विभागों में पेपरलेस वर्क को बढ़ावा दिया है। आनलाइन सुविधाओं को बढ़ाया जा रहा है। राजस्व विभाग को भी डिजिटाइज किया जा रहा है। पुलिस विभाग में अब मैनुअल डाक नहीं भेजी जाती। हिमाचल में आइटी पार्क स्थापित किए जा रहे हैं। शिमला, कांगड़ा व सोलन जिला में ये पार्क बनने प्रस्तावित है।  
धार्मिक व साहसिक पर्यटन का विविधीकरण

हिमाचल में धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा दिया जा रहा है। कांगड़ा को पर्यटन राजधानी घोषित किया है। यहां पर मंदिरों को धार्मिक सर्किट से जोड़ने की योजना है। इसके साथ चंबा, ऊना, मंडी में भी कार्य किया जा रहा है। साहसिक पर्यटन के लिए सरकार प्रयास शुरू कर चुकी है। जिपलाइन व पैरा ग्लाइडिंग को बढ़ावा दिया जा रहा है। शिमला में भी पैराग्लाइडिंग शुरू की है। जल क्रीड़ाओं को प्रोत्साहित किया जा रहा है। बीते रोज ही केरल में उपमुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री ने इसको लेकर सहमति पत्र भी साइन किया है।  

यह भी पढ़ें: CM सुक्खू की बड़ी घोषणा, पेंशनरों व कर्मचारियों को 31 जनवरी से पहले मिलेंगे एरियर और ग्रेच्युटी; परागपुर में बैठेगा SDM


खतरे: जिनसे निपटना अनिवार्य  

विनाशकारी प्राकृतिक आपदाएं

वर्ष 2023 में बरसात के दौरान हिमाचल में 54 बादल फटने की घटनाएं हुईं। करीब 473 लोगों की मौत हुई। पिछले तीन सालों में प्राकृतिक आपदाओं में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। 2024 में बरसात के दौरान 8,000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है, जबकि 2025 में बरसात के दौरान आई आपदा के कारण 5,000 करोड़ का नुकसान आंका गया है। इन आपदाओं से हिमाचल अभी तक उभर नहीं पाया है। पहाड़ों का भरभराना, नदियों का राह भूलना प्रदेशहित में नहीं।  
ग्लेशियरों का पिघलना

जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियर लगातार पिघलते जा रहे हैं। इससे पानी की कमी हो रही है। नदियों का जलस्तर घट रहा है। बरसात के दौरान एक ही दिन में बहुत अधिक वर्षा हो रही है, जबकि औसतन वर्षा में कमी देखी जा रही है। सर्दियों में कम हिमपात व बेमौसमी वर्षा व ओलावृष्टि सीधा असर डाल रही है। इसका सबसे ज्यादा असर प्रदेश की नदियों के घटते जल स्तर व उनमें कम होता विद्युत उत्पादन पर पड़ रहा है। हिमाचल के औसतन तापमान में एक डिग्री सेल्सीयस की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जिसके कारण ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं।  
आर्थिक दिवालियापन का जोखिम

हिमाचल की आर्थिक स्थिति खराब है। मुफ्त की रेवड़ियां आर्थिक हानि की और ले जा रही है। बिजली, पानी या चुनाव के समय अन्य निश्शुल्क घोषणाओं सहित कई योजनाओं पर अनुदान हिमाचल को कर्जदार बनाता आया है। यदि इस पर नकेल न कसी गई तो वह दिन दूर नहीं जब हम आर्थिक दिवालिएपन पर आ जाएंगे। राजनीतिक दल कोई हो, सत्ता पाने के लिए लोक लुभावने व मुफ्त के वादे बंद करने होंगे।  
नशे का बढ़ता जाल खासतौर पर चिट्टा

हिमाचल में नशे का जाल बढ़ता जा रहा है। हिमाचल में मुख्य रूप में चिट्टा वर्ष 2016 से बढ़ना शुरू हुआ। आज हालात यह है कि प्रदेश की 80 प्रतिशत जेलें चिट्टा पीड़ित युवाओं से भरी हैं। प्रदेश सरकार को इसके लिए जन आंदोलन खड़ा करने के साथ-साथ पंचायत स्तर पर मैपिंग और जागरूकता कार्यक्रम शुरू करने पड़े। युवा पीढी इसमें धंसती जा रही है इसका असर आर्थिकी पर भी पड़ रहा है। विकास पर खर्च होने वाली राशि को इन अभियानों पर खर्च करना पड़ रहा है।  
कृषि और बागवानी का पतन

युवा पारंपरिक व्यवसाय को छोड़कर नौकरी की ओर भाग रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों की ओर पलायन बढ़ता जा रहा है। इसका सीधा असर कृषि व बागवानी पर पड़ रहा है। कई ऐसे गांव हैं, जहां खेत उजड़ गए हैं। बुजुर्गों के लगाए बागीचे नष्ट हो रहे हैं। जलवायु परिवर्तन भी इसका कारण है। सूखे से उत्पादन घट रहा है। सरकार को चाहिए कि न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाया जाए व सिंचाई सुविधाएं किसानों और बागवानों को दी जाए। प्रदेश में 70 प्रतिशत क्षेत्र अब भी असिंचित है। यह कृषि व बागवानी को प्रभावित कर रहा है।
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