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कोलकाता में जन्मे, दिल्ली के दिल में बसे ‘टली साहब’, दूसरे विदेशी पत्रकारों से क्यों अलग थी उनकी पहचान?

cy520520 2026-1-26 14:26:58 views 1260
  

मार्क टली और निजामुद्दीन वेस्ट स्थित उनका आवास। फाइल फोटो सौजन्य- जागरण



जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। बीबीसी के पूर्व भारत ब्यूरो प्रमुख और दिग्गज पत्रकार सर मार्क टली का 90 वर्ष की आयु में निधन हो गया है। वह दिल्ली में निजामुद्दीन वेस्ट में रहते थे।

देश की नब्ज पहचानने वाले टली को \“बीबीसी की भारतीय आवाज\“ के रूप में जाना जाता था। वह पिछले कुछ दिनों से बीमार चल रहे थे और उनका उपचार साकेत स्थित मैक्स में चल रहा था। टली के निधन को उनके सहयोगी मधुकर उपाध्याय ने पत्रकारिता जगत की अपूर्णीय क्षति बताया है।

मार्क टली का जन्म वर्ष 1935 में कलकत्ता (अब कोलकाता) में हुआ था। उन्होंने ब्रिटेन के कैम्ब्रिज से इतिहास और धर्मशास्त्र की पढ़ाई की थी। वे दिल्ली के विदेशी पत्रकार जगत में उन गिने-चुने लोगों में से थे जो धाराप्रवाह हिंदी बोलते थे, जिस कारण लोग उन्हें प्यार से \“टली साहब\“ बुलाते थे।

उन्होंने अपने दशकों लंबे करियर में दक्षिण एशिया की कई युग-परिवर्तनीय घटनाओं को कवर किया, जिसमें वर्ष 1984 का आपरेशन ब्लू स्टार, भोपाल गैस त्रासदी, भारत-पाक युद्ध और राजीव गांधी की हत्या जैसी बड़ी घटनाएं प्रमुख थी।

यह भी पढ़ें- मशहूर पत्रकार मार्क टली का 90 वर्ष की आयु में निधन, पत्रकारिता के एक युग का अंत

इसी तरह, वह 1992 में विवादस्पद ढांचे के ढहाए जाने के दौरान भी मौजूद थे। भीड़ के हमले के बीच उन्हें एक कमरे में बंद कर दिया गया था, जहां से स्थानीय अधिकारियों ने उन्हें बचाया।

आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी ने उन्हें 24 घंटे के नोटिस पर भारत से निकाल दिया था, लेकिन आपातकाल हटते ही वे वापस लौट आए।
पद्म श्री और पद्म भूषण से सम्मानित

भारत सरकार ने उन्हें पद्म श्री और पद्म भूषण से सम्मानित किया। वर्ष 2002 में ब्रिटेन ने उन्हें पत्रकारिता के लिए \“\“सर\“\“ की उपाधि (नाइटहुड) दी। हालांकि, वह ब्रिटिश नागरिक थे, लेकिन बाद में उन्होंने \“\“ओवरसीज सिटीजन आफ इंडिया\“\“ (ओसीआइ) का दर्जा हासिल किया। उन्होंने हमेशा कहा कि वे उन दो देशों के नागरिक हैं जहां वे खुद को सबसे करीब पाते हैं।

लंबे समय तक उनके सहयोगी रहे मधुकर उपाध्याय ने उनके निधन पर दुख जताते हुए कहा कि वह पत्रकारिता के ऐसे शिक्षक थे, जिन्हें देखकर ही पत्रकारिता सीखी जा सकती थी। उन्होंने अपने साथियों को कभी भी यह नहीं बताया कि यह करना है, यह नहीं करना है।
कई चर्चित किताबें लिखीं

उन्होंने पत्रकारिता के उच्च मापदंडों को स्थापित किया। एक बार उनसे कहा कि कैसे लोग सैकड़ों पन्नों की किताबें लिख लेते हैं। वह खबरों के 200 शब्द लिखने के बाद ही सोचने लग जाते हैं। वह मूलत: रेडियो पत्रकार थे।

लेकिन अपने आपको बदला और नो फूल स्टाप इन इंडिया जैसे कई ऐतिहासिक व चर्चित किताबें लिखी। उनके करीबी लोगों ने बताया कि अंतिम संस्कार सोमवार को होगा।

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