सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को भारतीय सेना की जज एडवोकेट जनरल (JAG) शाखा में पुरुष और महिला अधिकारियों के लिए 2:1 अनुपात में आरक्षण देने की नीति को रद्द कर दिया।
JAG सेना की कानूनी विंग है, जहां अधिकारी कानूनी सलाह, कोर्ट-मार्शल मामलों और सैनिकों और उनके परिवारों की कानूनी जरूरतों को देखते हैं।
दो महिला उम्मीदवारों की याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा कि यह नीति मनमानी है और संविधान के तहत सभी को मिले समानता के अधिकार का उल्लंघन करती है। SC ने कहा,
दरअसल, दो महिला उम्मीदवार मेरिट लिस्ट में 4वें और 5वें नंबर पर थीं, लेकिन महिलाओं के लिए केवल 3 सीटें होने के कारण उन्हें मौका नहीं मिला। जबकि उनसे कम अंक वाले पुरुष उम्मीदवार चुने गए।
वहीं, कोर्ट ने एक याचिकाकर्ता को तुरंत सेवा में शामिल करने का आदेश दिया गया, जबकि दूसरी को राहत नहीं मिली क्योंकि उसने याचिका के दौरान ही नौसेना जॉइन कर ली थी।
JAG में कुल 9 पदों में भर्ती होनी थी, इसमें 2:1 अनुपात में आरक्षण के आधार पर 6 पुरुषों और 3 महिलाओं का चयन किया गया। इस पर जस्टिस मनमोहन और जस्टिस दीपांकर दत्ता की बेंच ने कहा कि पिछले सालों में महिलाओं को कम मौके मिलने की भरपाई के लिए कम से कम 50% सीटें महिलाओं को दी जाएं, लेकिन अगर महिलाएं पुरुषों से ज्यादा मेरिट में हैं तो उन्हें 50% तक ही सीमित करना भी गलत होगा।

दिल्ली हाईकोर्ट ने 6 अगस्त को महिलाओं को CDS (कम्बाइंड डिफेंस सर्विसेज) परीक्षा के जरिए भारतीय सैन्य अकादमी (IMA), नौसेना अकादमी (INA) और वायुसेना अकादमी (AFA) में शामिल न करने को लेकर केंद्र सरकार से जवाब मांगा था।
हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश देवेन्द्र कुमार उपाध्याय की बेंच ने बुधवार को कहा,
याचिका वकील कुश कालरा ने दायर की थी। उन्होंने याचिका में कहा कि 28 मई 2025 को UPSC ने CDS-II परीक्षा का विज्ञापन निकाला, जिसमें महिलाओं को सिर्फ OTA (ऑफिसर्स ट्रेनिंग अकादमी, चेन्नई) में आवेदन की अनुमति दी गई है, जबकि बाकी तीन अकादमियों में सिर्फ पुरुषों को ही शामिल किया गया है। पूरी खबर पढ़ें...
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