
भारत का स्वास्थ्य बीमा क्षेत्र तेज़ तरक्क़ी रहा है. भारतीय बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण (IRDAI) की नई (2024-25) वार्षिक रिपोर्ट इसको लेकर कुछ उपयोगी जानकारी देती है. रिपोर्ट के मुताबिक, स्वास्थ्य अब गैर-जीवन बीमा (सामान्य बीमा) में सबसे बड़ा सेगमेंट बन गया है, जिसकी 2024-25 में सकल प्रत्यक्ष प्रीमियम में हिस्सेदारी 41.42 प्रतिशत की रही है. साल 2024-25 में सामान्य और स्वास्थ्य बीमा कंपनियों ने कुल 1,17,505 करोड़ रुपये स्वास्थ्य बीमा प्रीमियम से कमाए, जो पिछले वर्ष की तुलना में 9.19 प्रतिशत ज़्यादा है. यह आंकड़ा 2014-15 में काफ़ी कम (20,096 करोड़ रुपये) था. भारत की स्वास्थ्य बीमा कंपनियों ने 2024-25 में 58.20 करोड़ लोगों को कवर देते हुए 2.65 करोड़ पॉलिसी जारी की, जो 2014-15 की तुलना में दोगुना ज़्यादा है. (देखें चित्र-1)
भारत के बाज़ार में स्वास्थ्य बीमा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से हाल ही में कई नीतिगत उपाय भी किए गए हैं. पॉलिसी की पहुंच को बढ़ाने के उद्देश्य से, सितंबर 2025 में निजी स्वास्थ्य बीमा प्रीमियम पर GST की दर शून्य कर दी गई है. माना जा रहा है कि इससे आम लोग स्वास्थ्य बीमा लेने के लिए प्रोत्साहित होंगे, जो अभी कुल कारोबार का केवल 10.3 प्रतिशत है. (देखें चित्र-2). इसको लेकर विधायी उपाय भी इसी उम्मीद से किए जा रहे हैं, जैसे संसद ने दिसंबर 2025 में ‘सबका बीमा, सबकी रक्षा’ बीमा कानून संशोधन पारित किया, जिसमें बीमा क्षेत्र में 100 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति दी गई है. सुधार के ऐसे उपाय भी किए गए हैं, ताकि 2047 तक सभी को बीमा कवरेज मिल सके. सरकार ने उपभोक्ता-केंद्रित पोर्टल ‘बीमा सुगम’ भी शुरू किया है, जिसे अधिक एकीकृत, डिजिटल और उपभोक्ता-हितैषी बीमा बाज़ार बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है.


Source: Compiled by the author from IRDA (2026)
हालांकि, मोनिका हलन ने दिसंबर 2024 में लिखा था कि बाज़ार के हिसाब से स्वास्थ्य बीमा का दायरा बढ़ने के बावजूद पॉलिसीधारकों का अनुभव संतोषजनक नहीं है. उन्होंने कहा था कि प्रायः सबसे कठिन पल वही होता है, जब बीमा अनुबंध काम के साबित नहीं होते. उनके मुताबिक, सरकारी क्षेत्र की बीमा कंपनियां निजी कंपनियों की तुलना में दावों के निपटान में अधिक उपभोक्ता-हितैषी हैं, जबकि कुछ निजी स्वास्थ्य बीमा कंपनियां इस मामले में बहुत खराब हैं. इस आलेख में स्वास्थ्य बीमा उद्योग में उपभोक्ताओं के अनुभवों को समझने का प्रयास किया गया है, जिसके लिए IRDAI की नई रिपोर्ट के एक ख़ास मानक- इनकर्ड क्लेम्स रेशियो (ICR) को ध्यान में रखा गया है.

Source: Compiled by the author from IRDA (2026)
ICR एक तय समय में अर्जित प्रीमियम के मुक़ाबले भुगतान किए गए दावों का अनुपात है, जो बताता है कि प्रीमियम से होने वाली कमाई का कितना हिस्सा बीमा कंपनी दावों पर ख़र्च करती है. 2024-25 में सामान्य और स्वास्थ्य बीमा कंपनियों का स्वास्थ्य बीमा व्यवसाय में ICR 86.98 प्रतिशत था. हालांकि, यह आंकड़ा तब तक ही भरोसेमंद लगता है, जब तक कोई यह नहीं देखता कि बीमा कंपनियों और उनके व्यवसाय में यह भार कितना बेतरतीब बंटा हुआ है. जब अलग-अलग व्यवसाय-श्रेणियों की तुलना की जाती है, तो व्यक्तिगत स्वास्थ्य बीमा क्षेत्र में ICR सबसे कम दिखता है (देखें चित्र-3). इसमें परिवारों को प्रीमियम का बोझ सबसे ज़्यादा महसूस होता है, जो प्रीमियम और दावों के बीच सबसे ज़्यादा अंतर दिखाता है.

Source: Compiled by the author from IRDA (2026)
बीमा कंपनियों के हालिया ICR की तुलना करने पर ऐसा लगता है कि हलन की बातें आज भी सही हैं (देखें चित्र-4). सरकारी क्षेत्र की बीमा कंपनियों ने स्वास्थ्य बीमा कारोबार में 100.59 प्रतिशत ICR बताया है, जबकि निजी क्षेत्र की सामान्य बीमा कंपनियों ने 87.59 प्रतिशत. इतना ही नहीं, सिर्फ़ स्वास्थ्य बीमा करने वाली कंपनियों ने काफ़ी कम 68.73 प्रतिशत ICR बताया है, जिसका मतलब है कि कमाए गए प्रीमियम और भुगतान किए गए दावे के बीच बड़ा अंतर है. हो सकता है कि सरकारी क्षेत्र की कंपनियों का ICR अस्थिर हो, लेकिन श्रेणियों के बीच यह अंतर पूर्व की उस चिंता को सही साबित करता है कि इस कारोबार के कुछ खिलाड़ी जान-बूझकर ऐसा व्यवहार कर सकते हैं, जो ग्राहकों के लिए नुकसानदायक हो, ख़ासकर तब, जब साथ-साथ प्रीमियम भी बढ़ता रहे.

Source: Compiled by the author from IRDA (2026)
स्वास्थ्य संबंधी दावे को प्रायः पूरी तरह नकारा नहीं जाता है, फिर भी ख़रीद के समय सुरक्षा का जो वादा किया जाता है, वह इलाज के समय काफ़ी हद तक कम हो जाता है. यदि इस क्षेत्र को लगातार आगे बढ़ना है, तो उसे लोगों का भरोसा फिर से जीतना होगा और उनको सोच-समझकर ख़रीदारी का फ़ैसला लेने के लिए जागरूक करना होगा. सरकार द्वारा हाल ही में उठाए गए कदम से इस काम को आसान बनाने में मदद मिल सकती है, बशर्ते इसमें उपभोक्ता-शिक्षा को भी शामिल किया जाए. IRDAI की 2024-25 की सालाना रिपोर्ट में इंश्योरेंस इफॉर्मेशन ब्यूरो (IIB) को वास्तविक समय में आंकड़े देने का एक मंच बताया गया है. यह बीमा कंपनियों के बीच वास्तविक समय में आंकड़ों के लेन-देन का एक प्रमुख माध्यम बनकर उभरा है, जो आने वाले दिनों का पूर्वानुमान लगाने और धोखाधड़ी को कम करने में मदद करता है.
स्वास्थ्य बीमा उद्योग के विभिन्न पहलुओं को लेकर IIB लंबे समय से लोगों को बहुमूल्य विश्लेषण उपलब्ध कराता रहा है. हालांकि, समय के साथ उसकी यह भूमिका कमज़ोर हो गई है और उसकी वेबसाइट पर सबसे ताज़ा विश्लेषणात्मक रिपोर्ट 2019-20 की उपलब्ध है. ‘पब्लिकेशन’ नाम से जो लिंक है, उसमें ‘क्रिटिकल इलनेस रिपोर्ट 2023-25’ के नाम से एक प्रकाशन ज़रूर है, पर वह भी पुरानी रिपोर्ट है. बीमा कंपनियों द्वारा बिक्री और प्रदर्शन से जुड़े आंकड़ों को गलत तरीके से दिखाने जैसी जटिल चुनौतियां आज स्वास्थ्य बीमा बाज़ार के सामने हैं, इसलिए उपभोक्ताओं को समय पर और महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध कराना ज़रूरी है.
‘बीमा सुगम’ के इस दौर में निजी स्वास्थ्य बीमा उत्पादों पर उपभोक्ताओं का भरोसा फिर से बनाने के लिए, इसे लोगों को जागरूक करने वाला एक महत्वाकांक्षी वेबसाइट बनाया जाना चाहिए. IIB शायद ऐसा कर सकता है. इसे समय-समय पर और मानकीकृत रिपोर्ट प्रकाशित करनी चाहिए, जिनमें उत्पाद वर्ग के अनुसार ICR; सामाजिक-आर्थिक, आयु और भौगोलिक श्रेणियों के आधार पर अस्पताल में भर्ती होने की दर; शिकायतें दूर करने की समय-सीमा और उसके परिणामों की जानकारी दी जानी चाहिए. स्वास्थ्य बीमा देने वाली कंपनियों का लेखा-जोखा उपलब्ध रहने से, उपभोक्ता केवल विज्ञापनों पर निर्भर रहने के बजाय कंपनियों के असल ट्रैक रिकॉर्ड को देख सकेंगे और फिर, उचित फ़ैसला ले सकेंगे.
|