झारखंड में हाथियों का अटैक। फाइल फोटो
जागरण संवाददाता, हजारीबाग। झारखंड में हाथियों के उत्पात की घटनाओं को लेकर लोगों में काफी आक्रोश है। इस वर्ष की शुरुआत से अब तक पिछले डेढ़ महीने में झारखंड के अलग-अलग इलाकों में हाथी 35 से अधिक लोगों की जान ले चुके हैं।
इनमें पश्चिमी सिंहभूम में एक ही हाथी ने 22 लोगों को मार डाला था। इसके अलावा राज्य के अलग-अलग हिस्से से हर चौथे पांचवें दिन किसी न किसी के हाथी के हमले में मारे जाने की खबरें आ रही हैं।
पिछले पांच वर्षों में झारखंड में हाथियों के हमलों में 1400 से अधिक मौतें हो चुकी हैं। हाथियों के हमले से राज्य के पूर्वी व पश्चिमी सिंहभूम, हजारीबाग, रामगढ़, पलामू और चतरा जैसे जिले सबसे अधिक प्रभावित हैं।
सरकार विफल
इतनी खतरनाक स्थिति के बाद भी झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार हाथियों को नियंत्रित करने में विफल साबित हो रही है। वन विभाग लाठी-डंडे, मशाल और पटाखे के भरोसे ही हाथियों को भगाने या उनके खुद जंगल की ओर चले जाने का इंतजार करने तक सीमित है।
वन विभाग के पास ट्रैक्यूलाइजर गन से लेकर अन्य उपकरणों की भारी कमी है। प्रशिक्षित विशेषज्ञ तो हैं ही नहीं। किसी तरह अगर हाथी को ट्रैक्यूलाइज कर बेहोश कर भी दिया जाए, तो राज्य के वन विभाग के पास ऐसे बड़े वाहन नहीं हैं, जिससे हाथियों को एक जगह से दूसरे जगह पर ले जाया जाए।
सांसद ने उठाई स्थायी समाधान की मांग
हाल ही में हाथियों ने हजारीबाग के गोंदवार गांव में 7 लोगों को कुचल डाला। इस पर हजारीबाग सांसद मनीष जयसवाल ने कहा कि मुआवजा और आश्वासन रास्ता नहीं है। महीने भर में इस तरह के कई घटनाएं हो चुकी है। मानव और हाथियों में टकराव को रोकने के लिए सरकार को कदम उठाने की जरूरत है। उनके कॉरिडोर को रोजाना अवरुद्ध किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि अवैध माइनिंग के कारण हाथियों का आश्रय बर्बाद होने के कारण इनका रुख आबादी वाले क्षेत्र में रोजाना हो जा रहा है। हाथियों के साथ तो वार्ता नहीं की जा सकती। विभाग को ही आवश्यक कदम उठाने की जरूरत है। वन विभाग इस पर आवश्यक कदम उठावें, जिससे झुंड आबादी वाले क्षेत्र में न आ सके।
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