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झारखंड HC म्यूजियम: जहां मिलेंगे आजादी की कानूनी लड़ाई के सबूत, राजेंद्र बाबू की एंट्री और फांसी की कलम मौजूद

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झारखंड हाईकोर्ट म्यूजियम। फोटो जागरण



मनोज सिंह, रांची। झारखंड हाई कोर्ट का नया परिसर केवल आधुनिक वास्तुकला का नमूना ही नहीं है, बल्कि यह राज्य की समृद्ध और गौरवशाली न्यायिक विरासत का संरक्षक भी बन गया है। रांची के धुर्वा स्थित नए परिसर में एक ऐसी म्यूजियम गैलरी तैयार की गई है, जो झारखंड की न्यायिक व्यवस्था के 100 साल पुराने इतिहास का गवाह है।

यहां न्याय जगत से जुड़े लोगों के लिए केवल एक संग्रह नहीं, बल्कि एक लीगल टाइम मशीन है, जो हमें उस दौर में ले जाती है जब फैसले कागज पर स्याही और भावनाओं के संगम से लिखे जाते थे।

इस पहल का मुख्य उद्देश्य वर्तमान पीढ़ी के वकीलों और न्यायिक कर्मचारियों को यह समझाना है कि न्याय की प्रक्रिया किन संघर्षों और परंपराओं से गुजरकर आज के डिजिटल युग तक पहुंची है।

यहां रखी हर वस्तु कानूनी मर्यादा और ऐतिहासिक गरिमा का प्रतीक है। यह म्यूजियम झारखंड और अविभाजित बिहार के न्यायिक सफर की दास्तां बयां करता है।

यहां ऐसी दुर्लभ चीजें रखी गई हैं, जिन्हें देखकर आप महसूस करेंगे कि आज से करीब सौ साल पहले न्याय की कुर्सी पर बैठना और वकालत करना कितना चुनौतीपूर्ण और मर्यादित रहा होगा।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद की वह ऐतिहासिक एंट्री

इस गैलरी का सबसे प्रमुख आकर्षण हजारीबाग स्थित जयप्रकाश नारायण सेंट्रल जेल का वह पुराना एंट्री रजिस्टर है। इसमें देश के प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेंद्र प्रसाद की जेल में इंट्री की जानकारी मौजूद है।

स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जब सेनानियों को जेल भेजा जाता था, तो उनके रिकॉर्ड किस तरह बारीकी से रखे जाते थे, यह रजिस्टर उसका जीवंत प्रमाण है। यह केवल एक प्रशासनिक दस्तावेज नहीं, बल्कि आजादी की लड़ाई और न्यायपालिका के बीच के संबंधों की एक महत्वपूर्ण कड़ी है।
जब कलम से लिखा जाता था न्याय

आज के दौर में जहां फैसले कंप्यूटर पर टाइप होते हैं, वहीं इस गैलरी में 1941 के दौर के वह जजमेंट रखे गए हैं जो पूरी तरह हस्तलिखित हैं। उस समय के जजों की सुंदर लिखावट और भाषा की स्पष्टता देखते ही बनती है। सुना होगा कि फांसी की सजा सुनाने के बाद जज अपनी कलम की निब तोड़ देते थे।

इस गैलरी में उस दौर की कलमों को भी प्रदर्शित किया गया है। यह इस बात का प्रतीक था कि जिस कलम से किसी का जीवन समाप्त करने का आदेश दिया गया, उसका दोबारा उपयोग नहीं होना चाहिए।

कांच की अलमारियों में सहेजकर रखे गए पुराने जमाने के भारी-भरकम टाइपराइटर, ऐतिहासिक दीवार घड़ियां और उस दौर के कानूनी दस्तावेज बताते हैं कि तकनीकी विकास ने न्यायपालिका को कैसे बदला है।
दो दिन वकीलों और स्टाफ के लिए खुलता है

यह म्यूजियम विशेष रूप से हाई कोर्ट के वकीलों और कर्मचारियों के लिए खोला गया है। शुक्रवार को हाई कोर्ट के वकीलों को यहां आने और म्यूजियम के ऐतिहासिक चीजों को देखने की अनुमति है।

शनिवार को वर्किंग डे के दिन हाई कोर्ट के स्टाफ भी यहां आ सकते हैं। धुर्वा स्थित नए हाई कोर्ट में बना म्यूजियम झारखंड की पहचान से जुड़ा है। पुराने कागजातों की पीली पड़ चुकी परतें आज भी न्याय की उस मजबूती को दर्शाती हैं, जो 100 साल पहले भी उतनी ही अडिग थी जितनी आज है।

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