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रांची में बिजली उत्पादन निगम की संपत्ति कुर्क करने की तैयारी, BHEL मामले में जारी हो सकता है वारंट

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कुर्की वारंट जारी होने की स्थिति बनी। (सांकेतिक फोटो)



राज्य ब्यूरो, रांची। प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश, रांची के वाणिज्यिक न्यायालय में भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड बनाम झारखंड ऊर्जा उत्पादन निगम लिमिटेड मामले में कुर्की वारंट जारी होने की स्थिति बन गई है।

वादकारी (डिक्री होल्डर) की ओर से अधिवक्ता अरविंद कुमार सिंह ने न्यायालय को सूचित किया है कि कुर्की वारंट के निष्पादन के लिए आवश्यक नाजिर शुल्क 500 रुपये जमा कर दिया गया है।

उन्होंने न्यायालय से वारंट जारी कर संपत्ति कुर्क करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाने का आग्रह किया। इधर निगम की तरफ से आवेदन दाखिल कर निष्पादन वाद की आगे की कार्यवाही पर स्थगन लगाने की मांग की गई है।

निगम का तर्क है कि मामले में कुछ विधिक बिंदुओं पर विचार आवश्यक है, जिसके चलते फिलहाल कुर्की की कार्रवाई रोकी जानी चाहिए।

डिक्री होल्डर की ओर से उक्त स्थगन आवेदन पर जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा गया, जिसे न्यायालय ने स्वीकार कर लिया है। अब इस प्रकरण में अगली सुनवाई 17 मार्च को निर्धारित की गई है।

उसी दिन न्यायालय यह तय करेगा कि कुर्की वारंट जारी कर संपत्ति जब्ती की कार्रवाई आगे बढ़ेगी या निष्पादन वाद पर स्थगन लगाया जाएगा।

यह मामला सिकिदरी हाइडेल घोटाला विवाद में देनदारी से जुड़ा है। निगम की तरफ से टाइम बार की स्थिति हो जाने के कारण 20 करोड़ के बदले 134 करोड़ से अधिक चुकाने की नौबत आ गई है।
साक्ष्य नहीं किए प्रस्तुत, गवाहों से जिरह भी नहीं की

सिकिदरी हाइडेल परियोजना की मरम्मत से जुड़े बहुचर्चित भुगतान विवाद में कामर्शियल कोर्ट ने पूर्व में गंभीर टिप्पणी करते हुए स्पष्ट कहा है कि प्रतिवादी पक्ष ने न तो अपने बचाव में कोई साक्ष्य प्रस्तुत किया और न ही वादी पक्ष के गवाहों से जिरह की। ऐसे में केवल लिखित विरोध को प्रमाण नहीं माना जा सकता।

यह मामला कामर्शियल सुइट संख्या 16/2015 से संबंधित है, जिसमें भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (भेल) ने अपने बकाया भुगतान को लेकर दावा दायर किया था।

भेल की ओर से अदालत में सिकिदरी परियोजना के पदाधिकारियों द्वारा जारी कार्य पूर्णता प्रमाणपत्र और सत्यापित बिल को साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया गया।

कंपनी की तरफ से सुधाकर राव, संदीप लाड़ा और सपन कुमार दास ने शपथपूर्वक बयान देते हुए कहा कि कार्य पूरा होने के बाद सक्षम अधिकारियों ने प्रमाणपत्र जारी किया और बिल का सत्यापन भी किया, बावजूद इसका भुगतान जानबूझकर रोका गया।
निर्देश के बावजूद कोर्ट नहीं पहुंचे अधिकारी

मामले में यह भी सामने आया था कि 20 फरवरी 2020 को तत्कालीन महाप्रबंधक (तकनीकी) ने वरीय प्रबंधक संजय सिंह को अदालत में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर पैरवी करने का लिखित निर्देश दिया था।

इसके बावजूद न संजय सिंह, न ही बाद में तत्कालीन महाप्रबंधक (तकनीकी) कुमुद रंजन सिन्हा और न ही महाप्रबंधक (मानव प्रशासन एवं विधि) अमर नायक अदालत में उपस्थित हुए।

यह तथ्य भी उजागर हुआ था कि कामर्शियल एग्जीक्यूशन से संबंधित नोटिस को लगभग 300 दिनों तक दबाकर रखा गया, जिससे न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हुई और विभागीय कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हुए।
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