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ओडिशा के पहले सरकारी कैंसर केंद्र की बदहाल स्थिति, सुविधाओं के विस्तार में सरकारी देरी पर सवाल

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संतोष कुमार पांडेय, अनुगुल। देशभर में तेजी से बढ़ रहे कैंसर मामलों के बीच ओडिशा के पहले और प्रमुख सरकारी कैंसर अस्पताल आचार्य हरिहर स्नातकोत्तर कैंसर संस्थान की कमजोर अवसंरचना ने गंभीर चिंता पैदा कर दी है।

एक ओर जहां हर साल मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है, वहीं दूसरी ओर अस्पताल में अत्याधुनिक सुविधाओं के विस्तार को लेकर सरकारी स्तर पर हो रही देरी और कथित उदासीनता अब सवालों के घेरे में है।
1.55 लाख से अधिक मरीजों का इलाज, लेकिन संसाधन सीमित

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2025 में संस्थान में करीब 1,55,559 कैंसर मरीजों का उपचार किया गया। प्रतिदिन लगभग 600 मरीज बाह्य रोगी विभाग (ओपीडी) में परामर्श के लिए पहुंच रहे हैं।

इसके बावजूद अस्पताल में केवल 507 बिस्तरों की व्यवस्था है, जो वास्तविक जरूरत की तुलना में काफी कम मानी जा रही है।विशेषज्ञों का कहना है कि मरीजों की लगातार बढ़ती संख्या के अनुपात में बिस्तरों, ऑपरेशन थिएटर (ओटी) और आधुनिक उपकरणों का विस्तार नहीं किया गया है। इसका सीधा असर गंभीर मरीजों के इलाज पर पड़ रहा है।
मॉड्यूलर ओटी की कमी से जटिल सर्जरी प्रभावित

अस्पताल में वर्तमान में छह पुराने सामान्य ओटी में सर्जरी की जा रही है। इनमें से अधिकांश का निर्माण वर्ष 2013 के आसपास हुआ था। आधुनिक मानकों के अनुरूप मॉड्यूलर ओटी की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जा रही है।

विशेषज्ञों के अनुसार, कम से कम 12 मॉड्यूलर ओटी की जरूरत है, ताकि जटिल कैंसर सर्जरी, विशेषकर श्रोणि (पेल्विस) क्षेत्र के कैंसर और रोबोटिक तकनीक आधारित ऑपरेशन प्रभावी ढंग से किए जा सकें।

अस्पताल प्रशासन द्वारा अतिरिक्त ओटी और बिस्तरों की स्वीकृति के लिए प्रस्ताव काफी पहले राज्य सरकार को भेजा जा चुका है, लेकिन तीन वर्षों से अधिक समय बीत जाने के बाद भी इस दिशा में ठोस निर्णय नहीं लिया गया।

चिकित्सकों का मानना है कि यदि समय रहते अवसंरचना का विस्तार नहीं किया गया तो मरीजों को या तो लंबा इंतजार करना पड़ेगा या फिर निजी अस्पतालों का रुख करना होगा।
पैलेटिव केयर में भी विशेषज्ञों की कमी

अस्पताल में अंतिम चरण के कैंसर मरीजों के लिए पैलेटिव मेडिसिन यूनिट को स्वतंत्र विभाग का दर्जा दिया गया है और कुछ विशेषज्ञ भी तैनात हैं।

बावजूद इसके एनेस्थीसिया विशेषज्ञों और अन्य प्रशिक्षित चिकित्सकों की कमी के कारण गंभीर मरीजों को समुचित राहत और दर्द प्रबंधन सेवाएं उपलब्ध कराने में कठिनाई हो रही है।
बढ़ते कैंसर मामलों के बीच सरकार की धीमी रफ्तार

राष्ट्रीय स्तर पर कैंसर के मामलों में लगातार वृद्धि दर्ज की जा रही है। जीवनशैली में बदलाव, प्रदूषण, तंबाकू सेवन और जागरूकता की कमी इसके प्रमुख कारण माने जा रहे हैं। ऐसे समय में राज्य के सबसे बड़े सरकारी कैंसर केंद्र की अवसंरचना का कमजोर रहना स्वास्थ्य नीति पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि कैंसर उपचार में केवल मरीजों की संख्या नहीं, बल्कि उपचार की गुणवत्ता और समयबद्धता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

आधुनिक उपकरण, प्रशिक्षित विशेषज्ञ, मॉड्यूलर ओटी और पर्याप्त बिस्तर उपलब्ध होने से न केवल मृत्यु दर कम की जा सकती है, बल्कि मरीजों की जीवन गुणवत्ता भी बेहतर की जा सकती है।
अन्य राज्यों पर निर्भरता बढ़ने का खतरा

यदि समय रहते संसाधनों का विस्तार नहीं हुआ तो मरीजों को बेहतर इलाज के लिए अन्य राज्यों का रुख करना पड़ सकता है, जिससे आर्थिक बोझ और मानसिक तनाव दोनों बढ़ेंगे।

विशेषज्ञों का मानना है कि कैंसर जैसे गंभीर रोग के लिए सरकारी अस्पतालों को सुदृढ़ करना सामाजिक दायित्व भी है और सार्वजनिक स्वास्थ्य की प्राथमिकता भी।

बढ़ते कैंसर संकट के इस दौर में अब निगाहें राज्य सरकार पर टिकी हैं कि वह लंबित प्रस्तावों को जल्द मंजूरी देकर राज्य के इस प्रमुख कैंसर केंद्र को आधुनिक और सक्षम स्वरूप कब प्रदान करती है।

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