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Holi : फागुन के रंग फीके: पारंपरिक फाग गीतों की समृद्ध परंपरा नष्ट, फिल्मी व भोजपुरी फूहड़ गीतों से प्रभावित हैं युवा

LHC0088 3 hour(s) ago views 844
  

Holi : प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर।  



संवाद सूत्र, अलीगंज (जमुई)। Holi : फागुन माह शुरू हुए कई दिन बीत चुके हैं, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में अब कहीं भी पारंपरिक फाग गीतों की गूंज सुनाई नहीं दे रही है। पहले फागुन आते ही पलाश के फूल खिल उठते थे और नगाड़े-ढोलक की थाप के साथ रसभरे गीतों की स्वर-लहरियां पूरे वातावरण को उल्लास से भर देती थीं। अलीगंज प्रखंड क्षेत्र में इस महीने के दौरान गांवों में फाग गीतों के आयोजन की खास व्यवस्था होती थी। शाम ढलते ही घरों से लोग बाहर निकलते और चौपालों पर बैठकर स्वच्छ और पारंपरिक गीतों का आनंद लेते थे। राहगीर भी कुछ पल रुककर इस आनंदमयी माहौल को अपने मन में संजो लिया करते थे।

ग्रामीण क्षेत्र के बुजुर्ग ब्रह्मदेव सिंह बताते हैं कि एक समय था जब फागुन शुरू होते ही क्षेत्र में ‘हई न देख सखी फागुन उत्पात…’, ‘रामा खेले होली हो, लखन खेले होली…’, ‘भर फागुन बुढ़वा देवर लागे…’ जैसे पारंपरिक गीत गूंजते थे। उत्साही युवाओं और बुजुर्गों की टोलियां पूरे माह अलग-अलग जगहों पर मंडली सजाकर फाग के आगमन का संदेश देती थीं।

लेकिन अब यह परंपरा धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही है। न तो फाग गवैयों की टोली दिखाई देती है और न ही नगाड़ा-ढोलक वादकों की वह उत्साहपूर्ण मौजूदगी। बुजुर्ग राघो यादव का कहना है कि जोगिरा और पौपट छंद गाने वाले कलाकारों की संख्या लगातार घटती जा रही है। नई पीढ़ी फिल्मी और भोजपुरी गीतों को ही होली गीत समझने लगी है, जिससे पारंपरिक फाग गीतों की पहचान धूमिल होती जा रही है।

स्थानीय लोग मानते हैं कि यदि समय रहते इस लोक परंपरा को संरक्षित करने की पहल नहीं की गई, तो आने वाली पीढ़ियां फाग गीतों की समृद्ध विरासत से वंचित रह जाएंगी। उनका कहना है कि प्रशासन और सामाजिक संगठनों को मिलकर युवाओं को पारंपरिक गीतों में शामिल करना चाहिए और इस सांस्कृतिक धरोहर को जीवित रखने की दिशा में कदम उठाना चाहिए।
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