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लाडली बहना से गृहलक्ष्मी तक.. मुफ्त की योजनाओं से घाटे में सरकारें, कैश बांटने के लिए कर्ज की नौबत, इसलिए SC सख्त

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कई राज्यों में कैश ट्रांसफर और मुफ्त योजनाएं चल रही हैं।



नई दिल्ली। मुफ्त अनाज, साइकिल, लैपटॉप और लाडली बहना जैसी कैश ट्रांसफर स्कीम (Unconditional Cash Transfer) को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की है। सर्वोच्च न्यायालय ने गुरुवार को राज्य सरकारों द्वारा चुनाव से पहले मुफ्त सहायता या (SC on Freebies) \“फ्रीबी\“ देने की घोषणा और ऐसी प्रथा की कड़ी आलोचना की। सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि यदि सरकारें ऐसे ही मुफ्त भोजन और मुफ्त बिजली देना जारी रखती हैं तो वे वास्तविक विकास के लिए धन की व्यवस्था कैसे करेंगी? दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव से पहले मुफ्त योजनाओ को लेकर तमिलनाडु सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि इस मामले को लेकर दूसरे राज्यों को भी कड़ा संदेश दिया जाएगा। भारत के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, “इस तरह के फिजूलखर्ची से देश का आर्थिक विकास बाधित होगा।“ सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि राजनीतिक पार्टियों को मुफ्त योजनाओं के माध्यम से संसाधन वितरित करने के बजाय, ऐसी सुनियोजित नीतियां बनानी चाहिए जिनसे लोगों के जीवन स्तर में सुधार हो सके।

मुफ्त की योजनाओं के बढ़ते चलन पर बड़े-बड़े अर्थशास्त्री चिंता जाहिर कर चुके हैं। क्या आप जानते हैं ऐसी तमाम मुफ्त की योजनाओं से सरकार का कितना पैसा खर्च होता है और इससे कितनी हानि होती है। चलिए आपको बताते हैं इनसे जुड़े आंकड़े...
मुफ्त की योजनाओं से कितना नुकसान?

फरवरी में पेश हुए आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में यह बात सामने आई है कि मुफ्त योजनाओं के वित्तीय परिणाम अब स्पष्ट होने लगे हैं।

  • वित्त वर्ष 2026 में अनकंडीशनल कैश ट्रांसफर स्कीम (UCTs) पर कुल खर्च 1.7 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है, जो राज्यों के सकल घरेलू उत्पाद (GSDP) का 0.19% से 1.25% और उनके बजटीय परिव्यय (स्कीमों के लिए किया नकद भुगतान) का 8.26% तक है।
  • इन योजनाओं को चलाने वाले लगभग आधे राज्य पहले से ही राजस्व घाटे में हैं, और वे परिसंपत्ति सृजन के बजाय उपभोग को वित्तपोषित करने के लिए लोन ले रहे हैं।
  • राज्यों का संयुक्त राजकोषीय घाटा वित्त वर्ष 2022 में सकल घरेलू उत्पाद के 2.6% से बढ़कर वित्त वर्ष 2025 में 3.2% हो गया है, और राजस्व घाटा भी बढ़ गया है, जो राज्य के वित्त पर बढ़ते दबाव को दर्शाता है।
  • सकल घरेलू उत्पाद के 28.1% के बराबर बकाया कर्ज और राजस्व का 62% पहले से ही वेतन, पेंशन, ब्याज और सब्सिडी में खर्च होने के कारण, राज्यों के पास अब विकास पर खर्च करने और पूंजीगत व्यय के लिए आवंटन करने की बहुत कम गुंजाइश बची है।

9 राज्यों में एक लाख करोड़ का बजट

2024-25 में, 9 राज्यों ने महिला लाभार्थियों के लिए लगभग बिना शर्त नकद हस्तांतरण योजनाओं को लागू करने के लिए कुल मिलाकर एक लाख करोड़ रुपये से अधिक खर्च करने का बजट बनाया है। 2024-25 के बजट अनुमानों के अनुसार, कर्नाटक द्वारा इस तरह के नकद हस्तांतरण पर लगभग 28,000 करोड़ रुपये खर्च किए जाने का अनुमान है। महाराष्ट्र ने इस योजना के लिए बजट में 10,000 करोड़ रुपये आवंटित किए थे। वार्षिक रूप से इसकी अनुमानित लागत लगभग 46,000 करोड़ रुपये है।
महिलाओं के लिए कैश ट्रांसफर योजनाएं
राज्ययोजना का नामयोजना में देय प्रतिमाह राशि (₹)FY24-25 में योजना के लिए आवंटित फंड (करोड़)
असमओरुनोदोई योजना1,2503,800
छत्तीसगढ़महतारी वंदन योजना1,0003,000
दिल्लीमुख्यमंत्री महिला सम्मान योजना1,0002,000
कर्नाटकगृहलक्ष्मी योजना2,00028,608
महाराष्ट्रमुख्यमंत्री माझी लड़की बहिन योजना1,50010,000 (योजना की वार्षिक लागत
46,000 करोड़)
मध्य प्रदेशमुख्यमंत्री लाडली बहना योजना1,25018,984
ओडिशासुभद्रा योजना83310,000
तमिलनाडुमगलीर उरिमाई थोगई योजना1,00013,720
पश्चिम बंगाललक्ष्मीर भंडार योजना1,000-1,20014,400

वित्त मंत्री भी दे चुकी हैं चेतावनी

इससे पहले वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने राज्य स्तर पर मुफ्त योजनाओं की बढ़ती संस्कृति पर तीखी चेतावनी देते हुए कहा था कि समस्या मुफ्त योजनाओं में नहीं है, बल्कि इस तथ्य में है कि “उनका बजट इसे वहन करने में सक्षम नहीं है।“


वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा था, “कई राज्य मुश्किल में हैं क्योंकि ये खर्चे बढ़ते जा रहे हैं। मैं किसी राज्य का नाम नहीं ले रही। लेकिन कुछ राज्य ऐसे हैं, और मुझे यह कहते हुए डर लग रहा है, कि उनकी 70 प्रतिशत आय निर्धारित खर्चों में जा रही है। ऐसे में 30 प्रतिशत से क्या किया जा सकता है? खासकर विकास के दौर में जब अर्थव्यवस्था को स्थिर रखने के लिए इतना कुछ करना जरूरी है।


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उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ऐसी योजनाओं के वित्तपोषण के लिए राज्यों द्वारा लिए जा रहे ऋण को लेकर चिंतित है, और इस बात पर जोर दिया कि “ऋण चुकाने के लिए उधार लेना अच्छी बात नहीं है,“ और कहा कि कई राज्य अब अपने ऋणों के पुनर्गठन के लिए केंद्र सरकार के साथ बातचीत कर रहे हैं।
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