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आखिरी सांसें ले रहा माओवाद, अब प्रभावित जिलों की संख्या सिर्फ सात

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आखिरी सांसें ले रहा माओवाद। (फाइल)



डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। देश में माओवाद अब आखिरी सांसें ले रहा है। केंद्र सरकार की हालिया समीक्षा के अनुसार, माओवादी हिंसा से प्रभावित जिलों की संख्या आठ से घटकर अब केवल सात रह गई है। नौ फरवरी से प्रभावी जिलों के इस नए वर्गीकरण को गृह मंत्रालय द्वारा सभी राज्यों के साथ साझा कर दिया गया है। यह प्रगति केंद्र सरकार के उस संकल्प के अनुरूप है, जिसमें इस वर्ष मार्च तक देश से माओवाद को पूरी तरह समाप्त करने का लक्ष्य रखा गया है।

सुरक्षा नीति और जिलों का नया वर्गीकरण केंद्रीय गृह मंत्रालय ने नौ राज्यों - झारखंड, बिहार, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, तेलंगाना और बंगाल - के 38 जिलों की व्यापक समीक्षा की है। पिछली समीक्षा दिसंबर 2025 में की गई थी। राष्ट्रीय नीति और कार्ययोजना के तहत जिलों को दो मुख्य श्रेणियों में बांटा गया है - \“एलडब्ल्यूई (वामपंथी उग्रवाद) प्रभावित जिले\“ और \“लिगेसी एवं थ्रस्ट जिले\“।

\“लिगेसी जिलों\“ का अर्थ है जहां माओवाद का प्रभाव खत्म हो चुका है पर विकास की जरूरत है और \“थ्रस्ट जिलों\“ का मतलब है जहां माओवाद के विस्तार की आशंका है।

वर्तमान वर्गीकरण के अनुसार, सात प्रभावित जिले इस प्रकार हैं - छत्तीसगढ़ के बीजापुर, नारायणपुर, सुकमा, कांकेर और दंतेवाड़ा; झारखंड का पश्चिमी सिहभूम; और ओडिशा का कंधमाल जिला। इनमें से बीजापुर, नारायणपुर और सुकमा को \“सबसे अधिक प्रभावित\“ माना गया है, जबकि कांकेर और पश्चिमी सिंहभूम \“चिंता वाले जिलों\“ की श्रेणी में हैं जहां माओवाद कम हो रहा है, लेकिन निरंतर निगरानी आवश्यक है।
लोकतंत्र के लिए चुनौती और भविष्य का लक्ष्य

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बार-बार दोहराया है कि जो माओवाद 2010 में आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती था, वह अब खत्म होने की कगार पर है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, माओवादी हिंसा में अब तक लगभग 17 हजार नागरिक और सुरक्षाकर्मी अपनी जान गंवा चुके हैं।

सरकार का स्पष्ट संदेश है कि सुरक्षा और विकास के दोहरे प्रहार से लोकतंत्र को इस ¨हसक चुनौती से मुक्त कराया जाएगा। उधर, गुवाहाटी में एक कार्यक्रम में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के महानिदेशक जीपी सिंह ने कहा कि माओवाद लगभग खत्म हो चुका है। उन्होंने इस सफलता का श्रेय सीआरपीएफ की जनरल ड्यूटी बटालियन और कोबरा कमांडो के साथ अन्य सुरक्षा एजेंसियों के बेहतर तालमेल को दिया।

(समाचार एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ)
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