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नोएडा में ऑटिज्म की होगी शुरुआती पहचान, PDGI ने 12-18 महीने के बच्चों के लिए शुरू किया स्क्रीनिंग क्लिनिक

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ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) की पहचान करने के लिए एक डेवलपमेंटल स्क्रीनिंग क्लिनिक शुरू। एआई इमेज



सुमित शिशोदिया, नोएडा। चाइल्ड डेवलपमेंट क्लिनिक (PDGI) के मेडिकल जेनेटिक्स डिपार्टमेंट ने 12 से 18 महीने के बच्चों में ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) की पहचान करने के लिए एक डेवलपमेंटल स्क्रीनिंग क्लिनिक शुरू किया है, जिसे केरल राज्य की तरह बनाया गया है।

चाइल्ड डेवलपमेंट क्लिनिक (PDGI) में यह स्क्रीनिंग क्लिनिक उत्तर प्रदेश में पहला और एक बड़ी सफलता है। एक क्रॉस-सेक्शनल पायलट स्टडी प्रोजेक्ट के आधार पर, यह क्लिनिक उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और झारखंड सहित कई राज्यों के ASD वाले बच्चों के लिए मुफ्त स्क्रीनिंग और इलाज देगा।

2002 में, केरल में चाइल्ड डेवलपमेंट क्लिनिक के एक सीनियर साइंटिस्ट बाबू जॉर्ज ने 12 से 18 महीने के बच्चों में ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर की स्क्रीनिंग पर रिसर्च की, जिसे जर्नल्स में पब्लिश किया गया है। अपनी रिसर्च के दौरान, उन्होंने “कर्नसन 9 टूल्स“ नाम का नौ सवालों का एक क्वेश्चनेयर बनाया, जिसका इस्तेमाल अब चाइल्ड डेवलपमेंट क्लिनिक में पश्चिमी उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, पश्चिम बंगाल और दूसरे राज्यों के बच्चों के लिए किया जा रहा है।

मेडिकल जेनेटिक्स डिपार्टमेंट के हेड डॉ. मयंक निलय ने खुद उत्तर प्रदेश और दूसरे राज्यों के बच्चों पर रिसर्च शुरू की है। उन्होंने बताया कि PGI में वैक्सीनेशन के लिए आने वाले 12 से 18 महीने के बच्चों के पेरेंट्स से कर्सन-9 टूल फॉर्म भरने को कहा जा रहा है। इसमें बच्चे की नॉर्मल एक्टिविटीज़ के बारे में सवाल होते हैं। इन जवाबों के आधार पर बच्चों की बीमारी के लिए स्कैनिंग की जाएगी। इस स्टडी को इंस्टीट्यूशनल एथिक्स कमेटी से भी मंज़ूरी मिल गई है।

डॉ. मयंक के मुताबिक, ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर एक न्यूरोडेवलपमेंटल कंडीशन है जो जन्म के तुरंत बाद बच्चों की बातचीत, सोशल पार्टिसिपेशन और बिहेवियर पर असर डालती है। इसके शुरुआती लक्षण 12 महीने की उम्र में ही दिख सकते हैं, लेकिन अक्सर पहचान में देर हो जाती है।

यह स्टडी कर्सन-9 टूल का इस्तेमाल करके रेगुलर वैक्सीनेशन के लिए आने वाले 12-18 महीने के बच्चों की जांच करेगी। एक्सपर्ट्स का मानना है कि अवेयरनेस और समय पर पहचान न होने की वजह से सैकड़ों बच्चे ज़रूरी काउंसलिंग से वंचित रह जाते हैं। समय पर स्क्रीनिंग और इवैल्यूएशन से रिस्क वाले बच्चों की पहचान की जा सकती है और डिस्ट्रिक्ट अर्ली इंटरवेंशन सेंटर में शुरुआती इंटरवेंशन शुरू किया जा सकता है।

इंस्टिट्यूट के डायरेक्टर डॉ. अरुण कुमार सिंह बताते हैं कि Cerson9 वैक्सीनेशन सेंटर और मेडिकल जेनेटिक्स डिपार्टमेंट में पेरेंट्स के लिए उपलब्ध होगा। ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर पर चल रही रिसर्च की जानकारी के लिए पेरेंट्स की सहमति ली जाएगी, जिसमें इसके मकसद, तरीके, रिस्क और फायदे, और दूसरी ज़रूरी बातें शामिल हैं।
20 बच्चों की स्क्रीनिंग में कोई ऑटिज़्म नहीं मिला

एक्सपर्ट्स का कहना है कि पेरेंट्स ने 20 बच्चों की स्क्रीनिंग के लिए Cerson9 टूल फ़ॉर्म भरा था। अच्छी बात यह है कि जब बच्चों के जवाबों के आधार पर उनकी स्क्रीनिंग की गई, तो कोई ऑटिज़्म नहीं मिला। इसके अलावा, डिस्ट्रिक्ट अर्ली इंटरवेंशन सेंटर और मेडिकल जेनेटिक्स डिपार्टमेंट ऑटिज्म की पहचान और डायग्नोसिस के लिए मिलकर काम करेंगे।

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