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भारत में गेहूं का भारी अधिशेष, कीमतें MSP से नीचे
अरविंद शर्मा, नई दिल्ली। देश में इस समय गेहूं का अधिशेष भंडार है। मांग सुस्त है, जबकि उपलब्धता ज्यादा है। सरकार ने चार साल से गेहूं निर्यात पर लगा प्रतिबंध हटाकर भी देख लिया, लेकिन इससे भी खास राहत नहीं मिली। बाजार में गेहूं की कीमतें दबाव में हैं और कई जगह किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से कम दाम पर फसल बेचनी पड़ रही है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थिति भी बहुत अलग नहीं है। वहां भी गेहूं की भरमार है और कीमतें कम हैं। साफ है कि उत्पादन और मांग के बीच संतुलन बिगड़ चुका है। ऐसे में किसानों के सामने फसल विविधीकरण अपनाने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं दिखता। जरूरत इस बात की है कि जिस फसल की मांग ज्यादा है, उसकी खेती बढ़ाई जाए। देश में गेहूं का भंडार असाधारण स्तर पर पहुंच चुका है।
भारत में गेहूं का भारी अधिशेष
कुल स्टाक 250 लाख टन से अधिक आंका जा रहा है। सरकारी एजेंसी एफसीआई के पास ही 182 लाख टन से ज्यादा गेहूं जमा है। इसके अलावा निजी व्यापारियों और कंपनियों के पास भी लगभग 75 लाख टन से अधिक गेहूं होने का अनुमान है। यह मात्रा बफर स्टाक और सार्वजनिक वितरण प्रणाली की जरूरत से काफी ज्यादा है।
यानी भंडार भरे हुए हैं, लेकिन मांग उतनी मजबूत नहीं है। कीमतों को सहारा देने के लिए सरकार ने 13 फरवरी 2026 को लगभग चार साल बाद 25 लाख टन गेहूं और पांच लाख टन गेहूं उत्पादों के निर्यात की अनुमति दी। उद्देश्य था कि अतिरिक्त स्टाक कम हो और घरेलू बाजार में दाम संभलें। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय बाजार में गेहूं की कीमतें ज्यादा नहीं होने के कारण निर्यात प्रतिस्पर्धी नहीं बन पा रहा है। पड़ोसी देश भी सस्ते विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं। ऐसे में निर्यात का फैसला फिलहाल सीमित असर ही डाल सका है।
नई फसल की आवक से कीमतों पर पड़ेगा दबाव
घरेलू बाजार की स्थिति भी किसानों के लिए अनुकूल नहीं है। फरवरी के तीसरे सप्ताह में औसत थोक भाव लगभग 2581 रुपये प्रति क्विंटल दर्ज किया गया, जो पिछले साल की तुलना में करीब 440 रुपये कम है। मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और गुजरात की कई मंडियों में दाम 2400 से 2500 रुपये प्रति क्विंटल के बीच चल रहे हैं, जबकि इस वर्ष गेहूं का एमएसपी 2585 रुपये प्रति क्विंटल तय है। मार्च-अप्रैल से नई रबी फसल की आवक शुरू होगी, जिससे आपूर्ति और बढ़ेगी। कीमतों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
पारंपरिक फसलों पर टिके हैं किसान
दरअसल पिछले कुछ वर्षों में रिकार्ड उत्पादन और सरकारी खरीद की गारंटी ने किसानों को गेहूं की खेती की ओर बनाए रखा। उन्हें भरोसा रहता है कि यदि खुले बाजार में दाम गिर भी जाएं तो सरकार एमएसपी पर खरीद करेगी। इसके विपरीत दलहन और तिलहन में खरीद व्यवस्था उतनी मजबूत नहीं है। यही कारण है कि किसान जोखिम लेने से बचते हैं और पारंपरिक फसलों पर टिके रहते हैं।
मगर दूसरा पहलू है कि देश में खाद्य तेल एवं दालों की मांग लगातार बढ़ रही है और पैदावार कम है। इससे आयात पर निर्भरता बढ़ रही है। यदि खेती का रुख दलहन-तिलहन की ओर मोड़ा जाए तो न केवल आयात घटेगा और किसानों को बेहतर दाम मिल सकेंगे। गेहूं का बढ़ता अंबार और घटती कीमत संकेत है कि कृषि नीति को मांग के अनुसार संतुलित करने की जरूरत है।  |
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