देश में सामाजिक दरारें अभी भी गहरी हैं : जस्टिस भुइयां (फाइल फोटो)
पीटीआई, हैदराबाद। सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्जल भुइयां ने समाज में व्याप्त गहरी दरारों पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि गणतंत्र के 75 वर्ष बाद भी हम \“संवैधानिक नैतिकता\“ के मानक से काफी दूर हैं।
हैदराबाद में आयोजित एक सेमिनार में उन्होंने स्पष्ट किया कि संवैधानिक नैतिकता को सार्वजनिक नैतिकता पर तरजीह दी जानी चाहिए, भले ही वह बहुमत का विचार ही क्यों न हो।
भेदभाव की कड़वी सच्चाई जस्टिस भुइयां ने अपनी बेटी की सहेली का उदाहरण दिया, जो एक पीएचडी स्कॉलर है। उसे दिल्ली में सिर्फ उसकी मुस्लिम पहचान के कारण छात्रावास में कमरा देने से मना कर दिया गया। उन्होंने एक अन्य घटना का भी जिक्र किया जहां दलित रसोइये द्वारा मिड-डे मील बनाने पर अभिभावकों ने विरोध किया था।
उन्होंने कहा, \“\“\“ये चंद उदाहरण यह दिखाते हैं कि हमारी सामाजिक दरारें कितनी गहरी हैं।\“\“\“ उनके अनुसार, विवाह और आवास जैसे मामलों में घरेलू और संवैधानिक नैतिकता का अंतर स्पष्ट दिखता है।
न्यायपालिका में प्रतिनिधित्व व चुनौतियां न्याय में बाधाओं पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि वकीलों की भारी फीस के कारण आम नागरिक के लिए अदालत पहुंचना लगभग असंभव हो गया है।
हालांकि, उन्होंने तेलंगाना न्यायपालिका में बढ़ती लैंगिक और सामुदायिक भागीदारी की सराहना की। राज्य में वर्तमान में 76 एससी, 46 एसटी और 25 अल्पसंख्यक न्यायिक अधिकारी कार्यरत हैं। उन्होंने कहा कि संवैधानिक मूल्यों पर आधारित नैतिकता ही मौलिक अधिकारों की रक्षा का एकमात्र आधार है।  |