फर्जी एनकाउंटर पर सवाल: कोर्ट की निगरानी में जांच की मांग
- हाफ एनकाउंटर का कल्चर: याचिका में जताई गहरी चिंता
- फेसबुक लाइव के बाद मौत: तिवारी के सरेंडर पर उठे गंभीर सवाल
- संविधान पर खतरा: एक्स्ट्रा-ज्यूडिशियल किलिंग्स रोकने को न्यायिक दखल जरूरी
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट मंगलवार को एक जनहित याचिका (पीआईएल) पर सुनवाई करेगा। इस याचिका में बिहार के भोजपुर जिले में भरत भूषण तिवारी की कथित फर्जी मुठभेड़ में हुई हत्या की कोर्ट की निगरानी में जांच की मांग की गई है। इसके साथ ही, याचिका में न्यायिक प्रक्रिया से इतर होने वाली हत्याओं (एक्स्ट्रा-ज्यूडिशियल किलिंग्स) और "हाफ एनकाउंटर" के बढ़ते चलन पर भी गहरी चिंता जताई गई है।
सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर जारी कॉज-लिस्ट के अनुसार, जस्टिस एम.एम. सुंदेश और जस्टिस शील नागू की बेंच मंगलवार को इस मामले पर सुनवाई करेगी।
वकील विशाल तिवारी ने खुद याचिकाकर्ता के तौर पर यह रिट याचिका दायर की है। इसमें भारत सरकार, बिहार सरकार, पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) और सेंट्रल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन (सीबीआई) को प्रतिवादी बनाया गया है।
इससे पहले, जब जस्टिस बी.वी. नागरत्ना की अध्यक्षता वाली बेंच के सामने इस मामले का जिक्र किया गया था, तो सुप्रीम कोर्ट ने इस पर तत्काल सुनवाई करने से इनकार कर दिया था और याचिकाकर्ता को मामले को लिस्ट कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री से संपर्क करने का निर्देश दिया था।
इस जनहित याचिका में भोजपुर में 17 जून को तिवारी की एनकाउंटर में हुई मौत के मामले में एफआईआर दर्ज करने का निर्देश देने की मांग की गई है। साथ ही, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज की अध्यक्षता में न्यायिक जांच और सीबीआई से जांच कराने की भी मांग की गई है।
याचिका के अनुसार, एनकाउंटर में होने वाली मौतें गैर-न्यायिक हत्याओं के बराबर हैं और लोकतांत्रिक समाज में कानून के शासन के लिए गंभीर खतरा पैदा करती हैं। एनकाउंटर में शामिल पुलिसकर्मी अक्सर एक ही तरह का तर्क देते हैं कि मारे गए व्यक्ति ने भागने की कोशिश करते हुए हथियार छीनने और गोली चलाने की कोशिश की, जिसके जवाब में पुलिस ने कार्रवाई की।
भोजपुर की घटना का जिक्र करते हुए याचिका में कहा गया है कि 28 वर्षीय भरत भूषण तिवारी की मौत फेसबुक लाइव प्रसारण के कुछ ही घंटों बाद हो गई, जिसमें उन्होंने कथित तौर पर कुछ मांगें पूरी होने पर सरेंडर करने की इच्छा जताई थी।
याचिका में मृतक के पिता काशीनाथ तिवारी के दावों का भी जिक्र किया गया है, जिन्होंने आरोप लगाया कि उनके बेटे का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था, न ही उसके खिलाफ कोई एफआईआर या चार्जशीट थी और हथियार डालने के बाद भी उसे गोली मार दी गई।
याचिका के अनुसार, इस घटना के बाद गांव में विरोध-प्रदर्शन हुए और निवासियों ने इस बात की जांच की मांग की कि क्या कथित सरेंडर के बाद जानलेवा बल का इस्तेमाल उचित था।
याचिका में कहा गया है, "इस एनकाउंटर के बाद गांव में विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं और लोग तिवारी की मौत के हालात की जांच की मांग कर रहे हैं।"
इसमें आगे कहा गया कि हालांकि पुलिस के खिलाफ हथियार उठाना गलत था और उस पर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए थी, लेकिन "कथित तौर पर सरेंडर करने के बाद जानलेवा बल का इस्तेमाल गंभीर सवाल खड़े करता है"।
याचिका में यह भी तर्क दिया गया कि फर्जी एनकाउंटर और एक्स्ट्रा-ज्यूडिशियल हत्याएं संविधान के तहत मिले जीवन और स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन हैं।
याचिका में कहा गया, "पुलिस को अंतिम न्याय करने या सजा देने वाली अथॉरिटी नहीं बनने दिया जा सकता। सजा देने की शक्ति केवल न्यायपालिका के पास है।"
भोजपुर एनकाउंटर की जांच की मांग के अलावा, पीआईएल में एक्स्ट्रा-ज्यूडिशियल हत्याओं और "हाफ एनकाउंटर" को रोकने और एनकाउंटर में हुई मौतों की जांच के संबंध में सुप्रीम कोर्ट के पीयूसीएल फैसले में तय गाइडलाइंस का सख्ती से पालन सुनिश्चित करने के निर्देश देने की मांग की गई है। इसमें उत्तर प्रदेश में हाल के कथित एनकाउंटर मामलों का भी जिक्र किया गया और दावा किया गया कि राज्य में "हाफ एनकाउंटर" का कल्चर पनपा है, जिसके लिए संवैधानिक अधिकारों की रक्षा और कानून के शासन को बनाए रखने के लिए न्यायिक दखल की जरूरत है।

Deshbandhu
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