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कौन हैं सुप्रीम कोर्ट में वकील के भेष में जज ...

deltin55 1970-1-1 05:00:00 views 64

नई दिल्ली/लखनऊ: देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट में एक सुनवाई के दौरान उस समय असामान्य स्थिति पैदा हो गई, जब वकील की पोशाक में मौजूद एक याचिकाकर्ता ने अदालत की कार्यवाही के दौरान कथित तौर पर न्यायाधीशों के साथ अभद्र व्यवहार किया और अदालत की मर्यादा का उल्लंघन किया। घटना के दौरान उसने अदालत में मौजूद अपनी फाइल के पन्ने हवा में उछाल दिए और न्यायालय के प्रति आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग किया। इसके बाद सुरक्षा कर्मियों ने तत्काल हस्तक्षेप करते हुए उसे कोर्ट रूम से बाहर ले गए। हालांकि अदालत ने घटना को गंभीर मानते हुए भी संबंधित व्यक्ति की मानसिक स्थिति को ध्यान में रखा और उसके खिलाफ तत्काल दंडात्मक कार्रवाई नहीं की। साथ ही उसकी याचिका को खारिज कर दिया।





His name is Prabal Pratap.

Justice Viswanathan said:
"We do not propose to take any action against him. As far as the merits of the case are concerned, we have perused the records. We find no good grounds to interfere with the impugned order. The Special Leave Petition is… https://t.co/DbvrEWdWxe
— Nalini Unagar (@NalinisKitchen) July 10, 2026


सुनवाई के दौरान क्या हुआ?

यह मामला न्यायमूर्ति के. वी. विश्वनाथन और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए सूचीबद्ध था। अदालत के आदेश के अनुसार, याचिकाकर्ता प्रबल प्रताप यादव ने सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों को असामान्य तरीके से संबोधित किया और कथित रूप से अदालत को निर्देश देने का प्रयास किया। उसने लखनऊ के विकासनगर क्षेत्र के एसीपी के खिलाफ तत्काल एफआईआर दर्ज कराने का आदेश देने की मांग की। जब पीठ ने उससे पूछा कि क्या वह अदालत को आदेश दे रहा है, तो उसने स्वयं को "संप्रभु" बताते हुए अपनी बात दोहराई। इसके बाद उसने अपने पास मौजूद लगभग 185 पन्नों की फाइल के कागज अदालत कक्ष में उछाल दिए और अनुचित भाषा का इस्तेमाल किया। स्थिति बिगड़ने पर सुरक्षा कर्मियों ने उसे तत्काल अदालत कक्ष से बाहर कर दिया।




अदालत ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में इस व्यवहार को न्यायालय की गरिमा के विपरीत माना। हालांकि पीठ ने यह भी उल्लेख किया कि संबंधित व्यक्ति की मानसिक स्थिति को देखते हुए फिलहाल उसके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जा रही है। इसके बावजूद अदालत ने उसकी याचिका को पूरी तरह निराधार मानते हुए खारिज कर दिया।
नौकरी से विवाद के बाद शुरू हुआ कानूनी संघर्ष

जांच में सामने आया कि प्रबल प्रताप यादव लखनऊ की एक निजी सॉफ्टवेयर कंपनी में कार्यरत था। कंपनी के अनुसार, उस पर अपनी एक मुस्‍लिम महिला सहकर्मी को आपत्तिजनक ईमेल भेजने और परेशान करने के आरोप लगे थे। कंपनी ने पहले उसे चेतावनी दी, लेकिन व्यवहार में सुधार नहीं होने पर उसकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं। नौकरी समाप्त होने के बाद उसने कंपनी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू की और उस पर देश विरोधी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप लगाते हुए एफआईआर दर्ज कराने की मांग की।




लखनऊ से सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला

प्रबल प्रताप ने नवंबर 2025 में लखनऊ की मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) अदालत में आवेदन देकर कंपनी के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की मांग की थी। अदालत ने इस संबंध में पुलिस से रिपोर्ट मांगी। बाद में पुलिस की रिपोर्ट के आधार पर अदालत ने मामले को एफआईआर के बजाय निजी शिकायत (कम्प्लेंट केस) के रूप में दर्ज कर सुनवाई आगे बढ़ाने का निर्णय लिया। इससे असंतुष्ट होकर उसने इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में याचिका दायर की और एफआईआर दर्ज कराने का निर्देश देने की मांग की।




हाईकोर्ट ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि मामला पहले से निचली अदालत में विचाराधीन है और वहीं उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर सुनवाई होनी चाहिए। इसके बाद प्रबल प्रताप सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां सुनवाई के दौरान यह विवादित घटनाक्रम सामने आया।
लखनऊ पुलिस ने दी जानकारी

लखनऊ की पुलिस उपायुक्त (पूर्वी) डॉ. दीक्षा शर्मा ने बताया कि प्रबल प्रताप यादव मूल रूप से उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के भरथना क्षेत्र का निवासी है। वह लखनऊ के जानकीपुरम इलाके में किराये पर रहकर निजी कंपनी में कार्य करता था। उन्होंने बताया कि नौकरी समाप्त होने के बाद उसने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 156(3) के तहत मजिस्ट्रेट अदालत में आवेदन देकर एफआईआर दर्ज कराने और जांच की मांग की थी। बाद में मामला उच्च न्यायालय और फिर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया। पुलिस के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने के बाद वह लखनऊ वापस नहीं लौटा और दिल्ली में ही रह रहा था।

न्यायालय की गरिमा बनाए रखने पर जोर

यह घटनाक्रम न्यायालयों में अनुशासित और सम्मानजनक व्यवहार की आवश्यकता को रेखांकित करता है। अदालतों में असहमति या कानूनी विवाद को केवल संवैधानिक और विधिक प्रक्रियाओं के माध्यम से ही उठाया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में याचिका को खारिज करते हुए यह स्पष्ट किया कि न्यायिक प्रक्रिया और अदालत की गरिमा सर्वोपरि है, जबकि किसी व्यक्ति की मानसिक स्थिति जैसे मानवीय पहलुओं को भी न्यायिक निर्णय में उचित महत्व दिया जा सकता है।






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