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प.एशिया में तनाव से फिर बढ़ी वैश्विक चिंता ... ...

deltin55 1970-1-1 05:00:00 views 0

पश्चिम एशिया में फिर तनाव बढ़ रहा है। पिछली 28 फरवरी से शुरु हुआ युद्ध अवांछित जान-माल के नुकसान के बाद बीते दिनों थमा तो दुनिया ने राहत की सांस ली थी। लेकिन  60 दिनों का युद्धविराम समाप्त होने के बाद एक बार फिर से अमेरिका और ईरान युद्ध के मुहाने पर हैं। हाल ही में अमेरिका और ईरान के बीच तीखी बयानबाजी का दौर तो चला ही, इसके अलावा शनिवार देर रात अमेरिका ने ईरान के ऊपर आरोप लगाया कि उसने साइप्रस के झंडे वाले एक जहाज पर हमला किया है। इसके बाद अमेरिका की तरफ से ईरान के करीब 140 ठिकानों पर हमला किया गया। इस हमले के बाद ईरान ने भी पलटवार किया और कुवैत, बहरीन समेत प.एशिया में मौजूद तमाम अमेरिकी ठिकानों और सैन्य उपकरणों के अड्डों को निशाना बनाया। इसके बाद ईरान की 'इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कॉर्प्स' आईआरजीसी ने चेतावनी दी है कि अगर अमेरिका आगे हमला करता है, तो वह तगड़ा पलटवार करेगा। ईरान ने दावा किया है कि उसकी नौसेना ने एक ऐसे मालवाहक जहाज को चेतावनी दी थी जो उसकी ओर से तय किए गए सुरक्षित मार्ग की बजाय दूसरे रास्ते से गुजर रहा था। अमेरिका की तरफ से हुए हमले पर पलटवार करने के साथ ही एक बार फिर से ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य मार्ग को बंद कर दिया है।




ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बाग़र ग़ालिबाफ़ ने एक्स पर पोस्ट कर कहा है कि 'एकतरफ़ा समझौतों का दौर अब ख़त्म हो चुका है। हमने आपसे कहा था, अपनी बात पर कायम रहें, वरना अंजाम भुगतें। हक़ीकत अब सामने आ रही है।' उन्होंने अमेरिका के साथ हुए समझौते के पांचवें बिंदु का स्क्रीनशॉट भी शेयर किया है, जिसमें लिखा है कि समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद ईरान 60 दिनों तक बिना किसी कर वसूली के वाणिज्यिक जहाज़ों को फ़ारस की खाड़ी से ओमान की खाड़ी तक सुरक्षित निकालने देगा।  




अब ईरान ने कहा है कि अगले आदेश तक होर्मुज़ जलडमरूमध्य बंद रहेगा। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने अमेरिका पर युद्धविराम समझौते का उल्लंघन करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि अमेरिका ने ईरान को डॉलर में कच्चा तेल बेचने की जो छूट दी थी, उसे अचानक ख़त्म कर दिया। अरागची ने सोशल मीडिया पर लिखा, 'समझौते तभी चलते हैं जब दोनों पक्ष उसका पालन करें।'  
इधर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फिर दावा किया कि ईरान उनकी हत्या की साजिश रच रहा है। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि यदि ईरान ने उनके खिलाफ कोई कार्रवाई की तो अमेरिका तुरंत जवाब देगा। ट्रंप ने कहा, 'ईरान की ओर 1000 मिसाइलें तैयार हैं और जरूरत पड़ने पर हजारों और दागी जाएंगी। 'उन्होंने यह भी दोहराया कि अमेरिका युद्धविराम को समाप्त मानता है, लेकिन बातचीत का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं किया गया है।  




इस तरह के बेतुके बयान ट्रंप शुरु से देते आए हैं। जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमला बोला था, तब भी ईरान की तरफ से खतरा बताया गया था और उस पर परमाणु बम बनाने की साजिश का आरोप तो अमेरिका लगाता ही रहता है। जिस तरह ईरान पर हमले के नए-नए बहाने अमेरिका तलाशता है, उससे जाहिर है कि उसकी दिलचस्पी विश्वशांति में कतई नहीं है। बल्कि हथियारों का कारोबार फलता-फूलता रहा, युद्ध के कारण शेयर बाजार में उथल-पुथल जारी रहे और तेल की कीमतों में मुनाफाखोरी का मौका ट्रंप को मिले, यही असली दिलचस्पी है।  




पिछले हफ्ते जब दिवंगत नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई के लिए शोकसभाएं हो रही थीं और उन्हें सुपुर्दे खाक करने की प्रक्रिया चल रही थी, तब भी ट्रंप ने अवांछित बयान दिया था कि वे चाहें तो एक साथ कई बड़े अधिकारियों को मार सकते हैं। 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल के हमलों में ही खामेनेई की उनके कई परिजनों के साथ हत्या कर दी गई थी। अमेरिका और इजरायल को मुगालता था कि खामेनेई को खत्म करके वे ईरान पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लेंगे, लेकिन ईरान पूरी मजबूती के साथ अमेरिका का मुकाबला करता रहा, जिसके बाद मजबूरन ट्रंप को समझौते के लिए राजी होना पड़ा। हालांकि इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू इसके लिए कतई राजी नहीं हैं। गज़ा के साथ-साथ लेबनान और ईरान दोनों जगह इजरायल की कुदृष्टि पड़ी हुई है। अपने हमलों को जायज ठहराने के लिए नेतन्याहू ने आत्मरक्षा के मनमाने सिद्धांत प्रतिपादित किए हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय न्यायालय जब उन्हें युद्धअपराधी ठहरा चुका है, तो उनके किसी भी तर्क  पर यकीन करना मुश्किल है। ट्रंप के लिए घरेलू स्तर पर कई कठिनाइयां ईरान युद्ध के बाद खड़ी हुईं, तो उन्होंने समझौते का रास्ता अपनाया। मगर इतनी जल्दी ट्रंप उस रास्ते से विचलित हो चुके हैं, तो इसके पीछे कोई बड़ा दबाव या दुरभि संधि काम कर रही है, ऐसा माना जा सकता है।  

ईरान को इस युद्ध में दोषी की तरह देखने वाले लोग इस बात को क्यों नहीं देखते कि पहला हमला उसकी तरफ से नहीं हुआ और न ही उसने ऐसा कोई इरादा जाहिर किया था। लेकिन अगर उस पर वार होंगे तो पलटवार करना उसका हक बनता है। इस बार भी उसने यही किया। लेकिन उसके पड़ोसी और अमेरिका के सहयोगी सऊदी अरब की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि ईरान की ओर से अंतरराष्ट्रीय कानून, संयुक्त राष्ट्र चार्टर, ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन के चार्टर और पड़ोसी संबंधों के नियमों का उल्लंघन हो रहा है। इसका सबूत कमर्शियल जहाजों पर ईरान के बार-बार होने वाले हमले हैं, जिनसे नेविगेशन की सुरक्षा और आजादी को खतरा पैदा होता है। ईरान पर उंगली उठाने वाले सऊदी अरब को यह नजर क्यों नहीं आ रहा है कि अमेरिका और इजरायल ने कितने अंतरराष्ट्रीय नियमों, कानूनों और संधियों का उल्लंघन किया है। उन्हें कभी कोई नसीहत क्यों नहीं दी जाती।  

इधर पाकिस्तान ने फिर से ईरान से चर्चा की है और शांति की पहल पर जोर दिया है। पिछला युद्धविराम भी पाकिस्तान की मध्यस्थता के कारण संभव हुआ था, जिससे वैश्विक पटल पर पाकिस्तान को काफी मजबूती और बढ़त हासिल हो गई थी। भारत ने तब एक अच्छा मौका खो दिया था, क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी चाहते तो ईरान के साथ हजारों साल के रिश्ते निभाते हुए अमेरिका से भी दोस्ती निभाते और दोनों के बीच समझौता करवाने की पहल करते। अब एक बार फिर मोदी के सामने मौका आया है कि वे भारत की नेतृत्व क्षमता दुनिया को दिखाएं, सवाल यही है कि क्या मोदी ऐसा कर पाएंगे। वैसे होर्मुज़ जलडमरूमध्य का दोबारा बंद होना और अमेरिका के नए हमले इस बात का संकेत हैं कि यदि दोनों देशों के बीच जल्द कोई कूटनीतिक समाधान नहीं निकला तो इसका असर केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक तेल बाजार, समुद्री व्यापार और विश्व अर्थव्यवस्था पर भी गंभीर पड़ सकता है।  






DB Desk



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