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7 करोड़ छात्र, 58 हजार करोड़ के कोचिंग इंडस्ट्री पर लगाम लगाने की तैयारी में सरकार

deltin55 Half hour(s) ago views 36

कोचिंग के नाम पर चल रही ये ‘मार्केटिंग वाली पढ़ाई’ अब शायद अपने सबसे मुश्किल दौर की तरफ बढ़ रही है. किसी भी बड़े शहर के जंक्शन पर उतर जाइए, चाहे कोटा हो, मुखर्जी नगर या राजेंद्र नगर, नज़रों के सामने एक ही तस्वीर बिखरी मिलती है. हर तरफ सपनों की फैक्ट्री का शोर, पोस्टरों पर चमकते टॉपर्स के चेहरे और सफलता के बड़े बड़े दावे. लेकिन अब यही सिस्टम सरकार की निगाह में आ चुका है और सवाल सिर्फ शिक्षा का नहीं, बल्कि करोड़ों बच्चों के भविष्य का है. बात ऐसे सेक्टर की है जो करीब 58 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का कारोबार बन चुका है और जिसमें लगभग 7 करोड़ छात्र किसी न किसी रूप में जुड़े हुए हैं.

‘इंडियन एक्सप्रेस’ की खबर के मुताबिक अब सरकार इस पूरे ढांचे को एक दायरे में लाने की तैयारी कर रही है. वजह साफ है, मामला सिर्फ फीस या एडमिशन तक सीमित नहीं रह गया है. इसके पीछे मानसिक दबाव, बच्चों का लगातार पढ़ाई और कोचिंग के बीच फंसा बचपन और डमी स्कूलिंग जैसी गंभीर समस्याएं भी खड़ी हो चुकी हैं. नीट और जेईई जैसी बड़ी परीक्षाओं की तैयारी कराने वाले कोचिंग संस्थान अब उस मोड़ पर हैं, जहां मनमानी करना पहले जितना आसान नहीं रहेगा.



शिक्षा मंत्रालय की तरफ से इस दिशा में नई गाइडलाइंस सामने आई हैं. सबसे बड़ा बदलाव ये माना जा रहा है कि 16 साल से कम उम्र के बच्चों का कोचिंग में दाखिला अब सीधे तौर पर सवालों के घेरे में आ सकता है. सरकार का कहना है कि इतनी कम उम्र में स्कूल के बाद कोचिंग का अतिरिक्त बोझ बच्चों की मानसिक और शारीरिक सेहत पर असर डालता है. इसके साथ ही भ्रामक विज्ञापनों पर भी सख्ती की तैयारी है. अब कोई भी कोचिंग संस्थान ये दावा नहीं कर पाएगा कि उसके यहां 100 प्रतिशत चयन की गारंटी है. अगर किसी ने फर्जी या बढ़ा चढ़ाकर दिखाए गए रिजल्ट के जरिए छात्रों और अभिभावकों को गुमराह किया, तो उस पर भारी जुर्माने की कार्रवाई तय मानी जा रही है.

कोचिंग सेंटरों के नियमन और परीक्षाओं के स्वरूप में बदलाव को लेकर शिक्षा मंत्रालय की एक समिति की ड्राफ्ट रिपोर्ट सामने आई है. ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की खबर के मुताबिक इस समिति की सिफारिशों में कई खास बातें शामिल हैं,  



कोचिंग पर लगाम: समिति ने कोचिंग सेक्टर को विनियमित (regulate) करने के लिए एक राष्ट्रीय कानून और कड़े नियमों की सिफारिश की है. इसका उद्देश्य कोचिंग संस्थानों की जवाबदेही तय करना और छात्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है.



परीक्षाओं का स्वरूप बदलना: रिपोर्ट का मानना है कि केवल कोचिंग को नियंत्रित करने से बात नहीं बनेगी. इसलिए, JEE, NEET-UG और CUET-UG जैसी प्रवेश परीक्षाओं को इस तरह से फिर से डिजाइन करने का सुझाव दिया गया है ताकि वे 'कम कोचिंग-योग्य' (less coachable) हो सकें. यानी परीक्षा सीधे स्कूली पाठ्यक्रम और कक्षा की पढ़ाई पर आधारित हो.



गुमराह करने वाले विज्ञापनों पर रोक: कोचिंग सेंटर जो भारी-भरकम दावे करते हैं (जैसे- टॉपर सीधे उनके संस्थान से थे), उन पर नकेल कसी जाएगी. संस्थानों को अब फैकल्टी की योग्यता और सफल छात्रों के नामांकन का पूरा और सही डेटा सार्वजनिक करना होगा.

'डमी स्कूल' और कोचिंग के घंटे: डमी स्कूलों की समस्या से निपटने के लिए रीयल-टाइम बायोमेट्रिक उपस्थिति का सुझाव दिया गया है. साथ ही, स्कूल जाने वाले छात्रों के लिए कोचिंग के घंटों को सीमित करने (संभवतः 2-3 घंटे की कैप) पर भी विचार किया जा रहा है.

सिफारिशों का मकसद: इस पूरी कवायद का मकसद छात्रों पर दबाव कम करना, कोचिंग पर उनकी अत्यधिक निर्भरता को खत्म करना और स्कूली शिक्षा की विश्वसनीयता को फिर से मजबूत करना है.



नौ सदस्यों वाली ये समिति जून 2025 में बनाई गई थी और मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इसकी अंतिम रिपोर्ट जल्द ही सरकार को सौंपी जाएगी.



अब इससे पहले की हम इस खबर की गहराई तक उतरें, इस ग्राफिक्स के जरिए ये जान लेते हैं कि भारत में कोचिंग कारोबार असल में कितना बड़ा है?
कोचिंग सेंटर्स पर लगेगी लगाम? (ग्राफिक्स-AI)
(सोर्स: शिक्षा मंत्रालय, नई दिल्ली)



डमी स्कूलिंग का खेल तो जैसे एक नासूर बन चुका है. बच्चा स्कूल जाता ही नहीं, बस नाम के लिए रजिस्टर में हाजिरी लगती है और वो पूरा दिन कोचिंग सेंटर की किसी अंधेरी क्लास में बैठा रहता है. सरकार अब इसे पूरी तरह खत्म करने के मूड में है. जो कोचिंग संस्थान स्कूल के साथ मिलकर ये धंधा कर रहे हैं, उनका रजिस्ट्रेशन रद्द हो सकता है. नियम ये है कि अब कोचिंग का समय स्कूल के साथ क्लैश नहीं करेगा. अगर कोचिंग लेनी है, तो वो स्कूल टाइम के बाद ही होगी.

तनाव का स्तर इतना बढ़ गया है कि कोचिंग हब कहे जाने वाले शहरों से लगातार दुखद खबरें आती रही हैं. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो यानी NCRB के आंकड़े एक डरावनी तस्वीर पेश कर रहे हैं. आत्महत्याओं के बढ़ते मामलों ने सिस्टम की चूलें हिला दी हैं. गाइडलाइंस में स्पष्ट कहा गया है कि कोचिंग सेंटर्स को छात्रों के लिए काउंसलिंग सेल बनाना होगा और अगर कोई छात्र तनाव में है, तो उसकी तुरंत मदद करनी होगी. ये सिर्फ कागज पर नहीं होगा, बल्कि कोचिंग सेंटर्स को इसका ऑडिट रिपोर्ट भी देना पड़ सकता है.

डमी स्कूलों के काले कारोबार पर ‘द लल्लनटॉप’ ने विस्तार से एक लेख लिखा है, शीर्षक है- "डमी स्कूलों का मायाजाल, कोटा से लेकर 'कोचिंग की मंडी' तक, कमीशन का 'रेफरल बोनस' खेल". दिलचस्पी हो तो क्लिक करिएगा.

अब सवाल ये उठता है कि क्या ये नियम जमीन पर उतर पाएंगे? कोचिंग लॉबी बहुत मजबूत है. हजारों करोड़ का ये खेल आसानी से हार नहीं मानने वाला. कोचिंग सेंटर्स का कहना है कि वे तो बस डिमांड पूरी कर रहे हैं. अगर स्कूलों की पढ़ाई इतनी सक्षम होती कि बच्चों को कोचिंग की जरूरत नहीं पड़ती, तो शायद ये धंधा इतना फलता-फूलता ही नहीं. लेकिन क्या ये तर्क जायज है? ये एक बड़ा डिबेट का विषय है.
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