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विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस : स्वस्थ तन में ...

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  • डॉ अशोक कुमार वर्मा
भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 किसी भी व्यक्ति को कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अलावा उसके जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित नहीं करता है, जो मौलिक अधिकार के रूप में सभी नागरिकों और विदेशियों को समान रूप से उपलब्ध है। इस अधिकार के दायरे में स्वास्थ्य, चिकित्सा, आश्रय और स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार शामिल है।  
भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 25 जुलाई 2025 को सुकदेब साहा बनाम आंध्र प्रदेश राज्य एवं अन्य, 2025 लाइव लॉ (एससी) 740 में एक निर्णय में मानसिक स्वास्थ्य को संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन के अधिकार का अभिन्न अंग घोषित किया है अर्थात मानसिक स्वास्थ्य देखभाल पाना एक संवैधानिक अधिकार है और राज्य का यह कर्तव्य है कि वह सभी के लिए मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं सुनिश्चित करे।   




भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 किसी भी व्यक्ति को कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अलावा उसके जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित नहीं करता है, जो मौलिक अधिकार के रूप में सभी नागरिकों और विदेशियों को समान रूप से उपलब्ध है। इस अधिकार के दायरे में स्वास्थ्य, चिकित्सा, आश्रय और स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार शामिल है, और यह जीवन को गरिमापूर्ण तरीके से जीने की क्षमता की रक्षा करता है।  
यद्यपि भारत में 7 अप्रैल 2017 को मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम 2017 पारित किया गया था जो 29 मई 2018 को अस्तित्व में आया। इस अधिनियम ने आत्महत्या के प्रयास को प्रभावी रूप से अपराधमुक्त कर दिया। भारतीय दंड संहिता की धारा 309 के अंतर्गत आत्महत्या एक दंडनीय अपराध था। इस अधिनियम में मानसिक बीमारी दौरान ऐसे व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा, संवर्धन और पूर्ति करने और उससे जुड़े या उसके आकस्मिक मामलों के लिए प्रावधान हैं। इस अधिनियम के अस्तित्व में आने के पश्चात पूर्व में लागू मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम, 1987 को निरस्त कर दिया गया है जो 22 मई 1987 को पारित किया गया था।  




आज भौतिकतावाद के युग में मानसिक समस्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। मनुष्य अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए हर संभव प्रयास कर रहा है लेकिन कहीं न कहीं एक सीमा तक ही वह सफल हो पाता है और जहां उसे सफलता नहीं मिलती वहां से अवसाद आरम्भ होता है। अवसाद एक मनोदशा विकार है जिसमें निरंतर उदासी, निराशा, और किसी भी चीज़ में रुचि की कमी महसूस होती है, जिससे व्यक्ति की सामान्य दैनिक गतिविधियों को करने की क्षमता प्रभावित होती है। यह स्थिति हफ्ते या महीने भर तक रह सकती है और शारीरिक व भावनात्मक दोनों तरह की समस्याओं को जन्म दे सकती है। अवसाद के कारण व्यक्ति कुसंग का शिकार हो सकता है। आज के समय में व्यक्ति एकाकी होकर रह गया है। आज किसी के पास समय नहीं है। मोबाइल की लत ने इसे और अधिक भयंकर रूप दे दिया है। नशे की और आकर्षण भी इस अवसाद का ही कारण है। वास्तव में ये सब मानसिक रोग की श्रेणी में आते हैं।  




अवसाद के एक उदाहरण में कोटा में आत्महत्या करने वाली छात्रा कृति का स्वलिखित सुसाइड नोट भारत सरकार और मानव संसाधन मंत्रालय को इंगित करता है जिसमें वह कह रही है कि अगर वो चाहते हैं कि कोई बच्चा न मरे तो जितनी जल्दी हो सके इन कोचिंग संस्थानों को बंद करवा दें। ये कोचिंग छात्रों को खोखला कर देते हैं। पढ़ने का इतना दबाव होता है कि बच्चे बोझ तले दब जाते हैं। कृति ने लिखा है कि वो कोटा में कई छात्रों को डिप्रेशन और स्ट्रेस से बाहर निकालकर सुसाईड करने से रोकने में सफल हुई लेकिन खुद को नहीं रोक सकी। अपनी मां के लिए उसने लिखा कि-आपने मेरे बचपन और बच्चा होने का फायदा उठाया और मुझे विज्ञान पसंद करने के लिए मजबूर करती रहीं लेकिन मैं आपको बता दूं कि मुझे आज भी अंग्रेजी साहित्य और इतिहास बहुत अच्छा लगता है क्योंकि ये मुझे मेरे अंधकार के वक्त में मुझे बाहर निकालते हैं।  




दूसरी और लोगों के पास बहुत धन और सुख-सुविधाएं होने पर भी वे संतुष्ट नहीं हैं। यहां पर संत कबीरदास की पंक्तियां वर्णनीय है जिसमें उन्होंने लिखा है-   
गौ धन, गज धन, बाजि धन और रत्न धन खान।   
जब आवै संतोष धन, सब धन धूरि समान।  
संत कबीरदास जी इस दोहे के द्वारा यह सन्देश दे रहे हैं कि सच्चा धन भौतिक संपदा नहीं हैं बल्कि मानसिक तृप्ति और संतोष है। वे कहते हैं कि इच्छाएं कभी खत्म नहीं होती। श्री रामचरितमानस के पंचम सोपान श्री सुंदरकांड में वर्णन मिलता हैं जब हनुमान जी मां सीता की खोज में समुद्र पार कर रहे थे तब सुरसा ने हनुमान जी का मार्ग रोक दिया और हनुमान जी को खाने के लिए आतुर हुई। हनुमान जी ने अपने शरीर का आकार बड़ा कर लिया। सुरसा ने अपने मुख का आकार और बढ़ा दिया। अंत में हनुमान जी ने अपना लघु रूप बना लिया और सुरसा के मुख में प्रवेश कर गए और बाहर निकल आए। इसी प्रकार माया रूपी संसार में तृष्णा का रूप सुरसा के समान हैं। मनुष्य अपनी तृष्णा को लघु करके इस माया रूपी भव सागर से पार जा सकता हैं अर्थात तृष्णा से मुक्ति के बिना संतोष नहीं मिल सकता। जो संतोष धारण कर लेता है, वही वास्तव में सुखी और धनवान है।   

यहां पर स्वास्थ्य ही धन है का वर्णन करना भी अत्यावश्यक हैं। यदि मनुष्य स्वस्थ होगा तो उसे संसार के सभी भौतिक सुख उसे अच्छे लगेंगे लेकिन यदि व्यक्ति अस्वस्थ होगा तो उसको प्रिय पकवान भी नहीं भाएंगे अर्थात अच्छे नहीं लगेंगे। दूसरी और यही बात मानसिक स्वास्थ्य पर भी लागू होती हैं क्योंकि स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मस्तिष्क का निवास होता है। सभी धर्म इसीलिए मनुष्य को स्वार्थ के स्थान पर परमार्थ का मार्ग अपनाने के लिए प्रेरित करते हैं ताकि मनुष्य का मानसिक विकास हो और मानसिक स्वास्थ्य की वृद्धि हो।  
अंत में किसी पंजाबी कवि ने लिखा है-  
बन्दे दी आसां कदे हुन्दियां न पूरियां।   
तड़पदा बहुतेरा फिर भी रहन्दियां अधूरियां।   
इसका अभिप्राय यह है कि मनुष्य की एक इच्छा पूरी होती है तो दूसरी तैयार हो जाती है यह प्रक्रिया निरंतर चलती रहती हैं।






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