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कानपुर के भूमाफिया और वकील अखिलेश दुबे की जमानत अर्जी हाई कोर्ट में खारिज, बचाव पक्ष ने दी ये दलील

Chikheang 2025-10-30 03:36:21 views 1262
  

कानपुर का भूमाफिया और वकील अखिलेश दुबे। जागरण अर्काइव



विधि संवाददाता, जागरण, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कानपुर नगर जिला न्यायालय में अधिवक्ता अखिलेश दुबे की जमानत अर्जी खारिज कर दी है। न्यायमूर्ति संतोष राय ने यह आदेश दिया है। छह अगस्त, 2025 से जेल में बंद अधिवक्ता के खिलाफ बर्रा थाने में बीएनएस की विभिन्न धाराओं में केस दर्ज है। उसके अधिवक्ता ने कोर्ट से कहा कि कोई ऐसा अपराध नहीं किया है, जैसा प्राथमिकी में आरोप है। विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

शिकायतकर्ता रवि सतीजा के खिलाफ पाक्सो एक्ट में दर्ज केस में कोई दबाव नहीं डाला और न ही उसका उस मामले से कोई संबंध है। शिकायतकर्ता ने सत्य नारायण अग्रवाल, वीरेंद्र कुमार मल्लू, संदीप अग्रवाल और विमल यादव के खिलाफ 29 फरवरी 2024 की घटना का हवाला देते हुए शिकायत दर्ज कराई है, जिसका उल्लेख वर्तमान एफआइआर में भी है। हालांकि न तो आवेदक का नाम उस एफआइआर में था और न ही जांच के दौरान उसका नाम सामने आया।

सत्र न्यायाधीश कानपुर नगर ने चार सितंबर को जमानत अर्जी खारिज करते हुए सह-आरोपित निशा कुमारी और गीता कुमारी द्वारा वर्तमान मामले में हिरासत के दौरान बीएनएसएस की धारा 180 और 183 के तहत दर्ज किए गए बयान का उल्लेख किया है, लेकिन बयान कानून के अनुसार विश्वसनीय नहीं है। इस आरोप का कोई विश्वसनीय प्रमाण नहीं है कि याची ने रवि सतीजा से 50 लाख रुपये की मांग की थी।

अपर महाधिवक्ता मनीष गोयल ने जमानत अर्जी का विरोध किया। कहा कि गवाह सुशील त्रिवेदी ने प्राथमिकी के इस कथन का समर्थन किया कि अभियुक्त ने रवि सतीजा को अपने कार्यालय में धमकाया और उसके सामने 50 लाख रुपये की मांग की थी। रवि सतीजा और अखिलेश दुबे की आडियो रिकार्डिंग है। अखिलेश दुबे और उसके गिरोह के खिलाफ विशेष जांच दल के समक्ष 46 जांचें लंबित हैं। वर्तमान छह आपराधिक मामले जघन्य अपराधों से संबंधित हैं।

एक अन्य मामला जिसमें तत्कालीन जांच अधिकारी, राजेश कुमार तिवारी ने पांच घंटे के भीतर अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत की, लेकिन विरोध के बाद संबंधित मजिस्ट्रेट ने कानपुर नगर के पुलिस आयुक्त को तत्कालीन जांच अधिकारी के विरुद्ध विभागीय कार्यवाही शुरू करने के लिए निर्देशित किया है। सरकार की तरफ से कहा गया कि अपीलार्थी निर्दोष है अथवा नहीं, यह विचारण आंका जा सकता है। इसलिए वह किसी भी रियायत का हकदार नहीं है।

कोर्ट ने कहा कि अपराध की गंभीरता, पेशेवर पद का दुरुपयोग करने की आशंका और अभियोजन के गवाहों पर दबाव डालने-धमकाने, साक्ष्यों से छेड़छाड़ जैसी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए जमानत आवेदन स्वीकार करने का कोई पर्याप्त कारण नहीं दिखता।

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