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मुकेश कुमार श्रीवास्तव, दरभंगा। Darbhanga Raj: भारत में राज-घरानों की कोई कमी नहीं रही, लेकिन दरभंगा राज की पहचान हमेशा सत्ता या वैभव से अधिक संवेदना, दान और राष्ट्रभक्ति से बनी। लोकतंत्र आने के बाद भी जिस राज-परिवार को लोग आदर और सम्मान से याद करते हैं, उनमें दरभंगा राज अग्रणी रहा है।
इसकी सबसे बड़ी वजह रहे तिरहुत स्टेट के अंतिम और 20वें महाराजाधिराज स्वर्गीय कामेश्वर सिंह। जो एक ऐसी परंपरा छोड़ गए जो दानशीलता के ऐसे प्रतीक बने कि इतिहास में स्वर्णाक्षरों में दर्ज हो गया।
जीवन ही नहीं, विरासत भी देश को समर्पित
महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह ने अपने जीवन का हर क्षण शिक्षा, संस्कृति, समाज कल्याण और राष्ट्रहित को समर्पित किया। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने तीन फाइटर विमान और 50 एम्बुलेंस देश को दान कर अपनी देशभक्ति का परिचय दिया।
ऐसा इसलिए क्योंकि महायुद्ध में अंग्रेजों की ओर से लड़ने वाले भारतीय सिपाहियों को कम से कम परेशानी हो, लेकिन दरभंगा राज की दानशीलता की सबसे अनोखी मिसाल उनके निधन के बाद सामने आई। जब उनकी संपत्ति की देखरेख करने वाले एग्जीक्यूटर भी उसी मार्ग पर चल पड़े।
हमेशा राष्ट्रहित को प्राथमिकता
01 अक्टूबर 1962 को महाराजाधिराज के निधन के बाद देश एक बार फिर संकट के दौर से गुजर रहा था। भारत-चीन युद्ध ने राष्ट्र के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी थी। ऐसे समय में दरभंगा राज परिवार और ट्रस्ट के एग्जीक्यूटरों ने निजी हित से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को प्राथमिकता दी।
हवाई पट्टियां, विमान और पूरा खजाना देश के नाम
महाराजाधिराज की वसीयत के तहत संपत्ति की देखरेख की जिम्मेदारी जिन तीन एग्जीक्यूटरों को सौंपी गई थी, उनमें प्रमुख नाम था पटना हाईकोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस लक्ष्मीकांत झा का। उनके नेतृत्व में यह ऐतिहासिक निर्णय लिया गया कि दरभंगा राज की संपत्ति का उपयोग राष्ट्ररक्षा में किया जाएगा।
सबसे पहले दरभंगा (90 एकड़), पूर्णिया और कूचबिहार की हवाई पट्टियों के साथ राजपरिवार का लग्जरी विमान भारत सरकार को सौंप दिया गया। आज इन तीनों स्थानों पर भारतीय वायुसेना के एयरबेस हैं। उड़ान योजना के तहत दरभंगा एयरपोर्ट नागरिक उड्डयन के लिए भी संचालित हो रहा है।
सोना दान इतिहास का स्वर्णिम अध्याय
इसके बाद आया वह क्षण, जिसने दरभंगा राज को दानशीलता की पराकाष्ठा पर पहुंचा दिया। दरभंगा राज परिसर के इंद्र मंदिर प्रांगण में 15 मन यानी लगभग 600 किलो सोना सार्वजनिक रूप से देश को दान कर दिया गया।
बताया जाता है कि 3 नवंबर 1962 को यह निर्णय लिया गया और 10 जनवरी 1963 को तत्कालीन वित्त मंत्री मोरारजी देसाई स्वयं दरभंगा पहुंचे। उनके सामने पूरे खजाने का सोना तौलकर डिफेंस फंड में समर्पित कर दिया गया। उस समय कुल मिलाकर करीब 15 मन सोना सरकार को दिया गया था, जिसकी गूंज राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया तक पहुंची।
आलोचना भी हुई, लेकिन इतिहास ने दिया उत्तर
इस ऐतिहासिक निर्णय पर आलोचनाएं भी हुईं। कुछ लोगों ने लक्ष्मीकांत झा पर यह आरोप लगाया कि उन्होंने विधि आयोग के अध्यक्ष बनने की लालसा में यह फैसला लिया। लेकिन समय ने इन आरोपों को खारिज कर दिया।
विधानपरिषद के पूर्व विकास पदाधिकारी और दरभंगा राज के शोधार्थी रमणदत्त झा कहते हैं कि लक्ष्मीकांत झा पहले भारतीय नागरिक थे, जो पटना हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस बने। उन्होंने राजपरिवार की मर्यादा और देशहित, दोनों को समान रूप से निभाया।
महारानी की उपस्थिति में दान
उस दौर के एक प्रतिष्ठित अंग्रेजी अखबार में 15 मन यानी 600 किग्रा सोना दान किए जाने की खबर पहले पन्ने पर प्रकाशित हुई थी। यह आज भी दस्तावेजी साक्ष्य के रूप में सुरक्षित है। खबर में सोना दान के समय दोनों महारानी यानी महारानी राजलक्ष्मी और तीसरी महारानी काम सुंदरी देवी की मौजूदगी का भी उल्लेख मिलता है। इससे यह साबित होता है कि इस दान को लेकर कोई विवाद नहीं था।
वसीयत, ट्रस्ट और संपत्ति का न्यायपूर्ण बंटवारा
महाराजाधिराज ने 5 जुलाई 1961 को अपनी संपत्ति की देखरेख के लिए वसीयत तैयार की थी। इसमें पहली महारानी राजलक्ष्मी और तीसरी महारानी काम सुंदरी देवी को अधिकार से अलग रखते हुए मुकुंद झा, गिरींद्र मोहन मिश्र और न्यायमूर्ति लक्ष्मीकांत झा को एग्जीक्यूटर नियुक्त किया गया। तीनों महारानियों से कोई संतान नहीं होने के कारण यह व्यवस्था की गई थी।
दूसरी महारानी कामेश्वरी प्रिया का निधन महाराज के जीवन काल में ही हो गया था। महाराज के निधन उपरांत तीन सदस्यीय टीम को जवाबदेही सौंप दी गई। वसीयत के तहत एग्जीक्यूटर को अपना कार्य निष्पादित करने के बाद समस्त चीजें ट्रस्टियों को सौंप देनी थीं।
इस बीच लक्ष्मीकांत झा की मृत्यु 3 मार्च 1978 को हो गई। इसके बाद कोलकाता हाई कोर्ट ने दो अवकाश प्राप्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति एसए मसूद और शिशिर कुमार मुखर्जी की नियुक्ति प्रशासक के रूप में की।
एक हिस्सा जनहित के लिए भी
उनकी मौजूदगी में वर्तमान संपत्ति और बकाया का दस्तावेज तैयार कर 26 मई 1979 को तत्कालीन ट्रस्टी में शामिल द्वारकानाथ झा, मदन मोहन मिश्र और कामनाथ झा को इसे सौंप दिया गया। इसके तहत 27 मार्च 1987 को दाखिल फैमिली सेटेलमेंट पर सर्वोच्च न्यायालय ने 15 अक्टूबर 1987 को अपनी मुहर लगा दी थी। इसके तहत परिवार के बीच में संपत्ति का बंटवारा हुआ। इसमें एक भाग पब्लिक यानी जनहित के लिए भी सुरक्षित रखा गया। |
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