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भारत के केंद्रीय बजट का इतिहास।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। 1 फरवरी 2026 को देश की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण बजट पेश करने वाली हैं। भारत का केंद्रीय बजट केवल सरकार की आय और व्यया का केवल लेखा-जोखा नहीं होता, बल्कि यह एक देश की आर्थिक नीति, सुधारों और विकास की दिशा तय करने वाला सबसे अहम दस्तावेज है। बजट से पता चलता है कि सरकार नागरिकों, उद्योगो और निवेशकों के लिए आगे किस रास्ते पर चलने वाली है।
बीते चार दशकों में कई केंद्रीय बजट ऐसे आए जिन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था की सोच और संरचना को बदल कर रख दिया। आइए देखते हैं ऐसे ही कुछ बजटों की बड़ी बातें।
बजट 1983-84
तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी साल 1983-84 के बजट में भारत में आउटकम बेस्ड गवर्वेंस की पहली बार झलक दिखाई थी। प्रणव मुखर्जी ने राज्यों को दिए जाने वाले 300 करोड़ रुपए के अनुदानों को प्रदर्शन से जोड़ दिया था। साथ ही उन्होंने कॉरपोरेट सेक्टर के लिए मिनिमम अल्टनेट टैक्स की अवधारणा पेश की, जिससे टैक्स छूट के बावजूद कंपनियां न्यूनतम कर जरूर दें। यही सिद्धांत आगे चलकर आधुनिक सुधारों का आधार बने।
बजट 1985-86
वित्त मंत्री वीपी सिंह ने 1985-86 के बजट में टैक्स सिस्टम में सरलता की शुरूआत की। उन्होंने आयकर छूट की सीमा बढ़ाई और टैक्स स्लैब को 8 से घटाकर 4 कर दिया। अधिकतम टैक्स दर 61.8% से घटकर 50% हो गया। जिसने कॉरपोरेट सेक्टर को निवेश के लिए प्रोत्साहित किया और इंडस्ट्रीयल डी-लाइसेंसिंग की प्रकिया शुरू हुई।
बजट 1987-88
राजीव गांधी ने 1987-88 के बजट में आर्थिक संस्थानों के निर्माण पर जोर दिया। उन्होंने बाजर संस्थानों की नींव रखी। बतौर वित्त मंत्री उन्होंने शिक्षा बजट में ऐतिहासिक वृद्धि की। पूंजी बाजार सुधारों की शुरूआत हुई और म्यूचुअल फंड सेक्टर में प्रतिस्पर्धा बढ़ी। इसी सोच से आगे चलकर सेबी जैसी संस्थाएं मजबूत हुईं।
बजट 1991-92
यह बजट भारत के आर्थिक इतिहास का टर्निंग प्वाइंट माना जाता है। तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने बैलेंस ऑफ पेमेंट क्राइसिस जैसे संकट से देश को बाहर निकाला। मनमोहन सिंह ने कहा था कि अत्याधिक केंद्रीकरण औपृर नौकरशाही ने अर्खव्यवस्था को कमजोर किया है। इसी के साथ भारत में लाइसेंस राज का अंत, उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण के साथ विदेशी निवेश की शुरूआत हुई। यह बजट भारत की मजबूरी नहीं बल्कि आर्थिक दर्शन की क्रांति था।
बजट 1996-97
वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने माना कि भारत में इंफ्रास्ट्रक्चर विकास के लिए 15-20 साल की फंडिंग की व्यवस्था जरूरी है। इसके लिए उन्होंने इंफ्रास्ट्रक्चर फाइनेंस का ढांचा तैयार किया। इसी के साथ देश में IDFC स्थापना की गई, NHAI को पूंजी दी गई साथ ही डिसइनवेस्टमेंट कमीशन का गठन किया गया।
बजट 1997-98
साल 1997-98 का बजट टैक्स रिफॉर्म कि दिशा में भारत के लिए मील का पत्थर साबित हुआ। इनकम टैक्स की दरें घटाकर 10-20-30% कर दी गईं। शेयर बायबैक और डीमेट सुधार जैसे कदमों को उठाया गया। साथ ही आईटी सेक्टर को भविष्य का इंजन घोषित किया गया।
बजट 1999-2000
वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा इस बजट में पहली बार कहा कि गैर-रणनीतिक सार्वजनिक क्षेत्र की इकाईयों (PSUs) के निजीकरण की शुरूआत की। जिससे सार्वजनिक उपक्रमों में प्रतिस्पर्धा बढ़ी। डिसइनवेस्टमेंट से सामाजिक क्षेत्रों में निवेश शुरू हुआ।
बजट 2003-04
वित्त मंत्री जसवंत सिंह ने वित्तीय अनुशासन को कानून बनाया। इस बजट की सबसे बड़ी देन FRBM Act और राजकोषीय घाटे पर कानूनी सीमा तय करके सरकार की वित्तीय जवाबदेही तय की।
बजट 2004-05
इस बजट में वित्त मंत्री पी चिदंबरम टैक्स और शिक्षा का सीधा संबंध जोड़ दिया। देश में पहली बार एजूकेशन सेस लागू हुआ। कर और सामाजिक विकास के बीच सीधा संबंध जनता के सामने आया।
बजट 2009-12
वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी ने 2009-12 तक के बजट में भारत में डिजिटल शासन की नींव रखी। आधार और यूआईएडीआई, डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर की शुरुआत और JAM Trinity की नींव इसी दौर में रखी गई।
बजट 2017-18
वित्त मंत्री अरुण जेटली GST लेकर आए, जो भारत का सबसे बड़ा Federal Tax Reform बना। देश में वन नेशन, वन टैक्स लागू हुआ। इसमें केंद्र-राज्यों सहयोग को बढ़ावा मिला। GST काउंसिल के जरिए सहमति आधारित फैसले किए जाते हैं।
बजट 2020-21
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट 2020-21 में देश में नया टैक्स और इंफ्रास्टक्चर का खाका पेश किया। इसमें राष्ट्रीय इंफ्रास्ट्रक्चर पाइपलाइन, एसेट मोनेटाइजेशन और नई इनकम टैक्स व्यवस्था को लागू किया गया।
बजट 2025-26
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट 2025-26 में नया आयकर विधेयक पेश किया। देश की जनमानस को बड़ी राहत देते हुए 12 लाख रुपए की आय को टैक्स फ्री कर दिया। इसके साथ ही जन विश्वास बिल 2.0 पेश किया और ईज ऑफ डूइंग बिजनेस पर फोकस किया।
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