search
 Forgot password?
 Register now
search

Uttarakhand News: पीएम मोदी की पहल से पारंपरिक मेलों के नए युग की शुरुआत, हर साल निभाई जाती है यह परंपरा

LHC0088 2025-11-11 14:37:04 views 1251
  

पहाड़ों पर हर साल 300 से अधिक छोटे-बड़े मेलों का आयोजन होता है



अश्वनी त्रिपाठी, जागरण, देहरादून। उत्तराखंड में पारंपरिक मेलों और लोक उत्सवों को पर्यटन व आर्थिकी से जोड़ने की पीएम नरेन्द्र मोदी की पहल ने राज्य के पारंपरिक मेलों के लिए नए युग की शुरुआत कर दी है। अब प्राचीन मेलों का आयोजन केवल परंपरा नहीं, बल्कि स्थायी विकास और सांस्कृतिक पर्यटन के अवसर के रूप में देखा जा रहा है।  विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

उत्तराखंड की धरती मेले-उत्सवों की भूमि है। यहां के पहाड़ों और घाटियों में साल लगभग 300 से अधिक छोटे-बड़े मेलों का आयोजन होता है। कभी देवी-देवताओं कीआराधना के रूप में, तो कभी लोकजीवन व व्यापारिक महोत्सव के रूप में। उत्तराखंड के मेले केवल उत्सव नहीं, यहां की सामाजिक, आर्थिक व सांस्कृतिक व्यवस्था की आत्मा हैं।

उत्तराखंड का प्रत्येक मेला अपने साथ एक लोककथा, परंपरा और आस्था की गूंज लेकर आता है। चंपावत का देवीधुरा बग्वाल मेले में जहां परंपरागत पत्थर युद्ध की परंपरा का निर्वहन होता है, वहीं चमोली का गौचर मेला पशु व्यापार के साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था व पर्यटन का संगम है। बागेश्वर के उत्तरायणी मेले में होने वाले चोलिया लोकनृत्य की थाप पूरे कुमाऊं की आत्मा को झंकृत कर देती है।

अल्मोड़ा के नंदा देवी मेले में देवी की झांकियां, लोकगीत और नृत्य से आस्था का पर्व उत्सव में बदल जाता है, तो पिथौरागढ़ का जौलजीबी मेला दशकों से नेपाल व भारत के रिश्तों के बीच की कड़ी बना हुआ है। उत्तराखंड के सुदूर क्षेत्रों में मेले सीमांत अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक संवाद के संवाहक बने हुए हैं।

यह भी पढ़ें- दिल्ली-सहारनपुर-देहरादून राजमार्ग पर लगेंगे सोलर पैनल, NHAI ने समझौते पर किया हस्ताक्षर

देवीधुरा बग्वाल मेला पत्थर युद्ध परंपरा के लिए विख्यात
अल्मोड़ा का नंदा देवी मेला नंदा देवी को समर्पित है, जबकि हरेला मेला कृषि समृद्धि का प्रतीक है। चंपावत का देवीधुरा बग्वाल मेला अपनी पत्थर युद्ध परंपरा के लिए विख्यात है और पूर्णागिरी मेला शक्ति आराधना का केंद्र है। पौड़ी का बिन्सर महादेव और गिंदी मेला धार्मिक और लोकनृत्य से सराबोर रहते हैं। देहरादून में बिस्सू मेला जनजातीय उत्सव है, तो झंडा मेला साम्प्रदायिक एकता का प्रतीक। नैनीताल का हरेला और मुक्तेश्वर कृषि मेला प्रकृति व खेती से जुड़ा है।

बागेश्वर का उत्तरायणी मेला सरयू-गोमती संगम पर लगता है, वहीं उत्तरकाशी का माघ मेला गंगा स्नान और देव-डोली यात्रा से प्रसिद्ध है। रुद्रप्रयाग का मध्यमेश्वर मेला शिव आराधना का पर्व है। टिहरी का कुंजापुरी मेला और टिहरी झील मेला धार्मिक व पर्यटन आकर्षण का केंद्र है।

हरिद्वार का कांवड़ मेला और कुंभ विश्व प्रसिद्ध हैं। उधम सिंह नगर में चैती व नानकमत्ता मेले सांस्कृतिक सद्भाव को बढ़ाते हैं, जबकि चमोली का गौचर मेला और राजजात यात्रा उत्तराखंड की आस्था और लोक परंपरा की जीवंत झलक प्रस्तुत करते हैं।
like (0)
LHC0088Forum Veteran

Post a reply

loginto write comments

Explore interesting content

LHC0088

He hasn't introduced himself yet.

510K

Threads

0

Posts

1510K

Credits

Forum Veteran

Credits
156138

Get jili slot free 100 online Gambling and more profitable chanced casino at www.deltin51.com