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शास्त्र का ज्ञान देने वाली नगरी काशी को थामनी होगी तीरंदाजी की कमान, महिला खिलाड़ियों के लिए खास मौका

deltin33 2025-11-26 14:07:07 views 1158
  

तीरंदाज सुमंगला शर्मा। जागरण  



सुमंगला शर्मा, वाराणसी। शास्त्र व शस्त्र का पुराना नाता है, दुनिया को शास्त्र का ज्ञान देने वाली नगरी काशी को तीरंदाजी की शिक्षा भी देनी चाहिए। खास तौर पर महिला खिलाड़ियों को इस खेल जुड़ना चाहिए। यहां की महिला खिलाड़ियों में खूब दम है, जरूरत है उन्हें तैयार करने की। इसके लिए बेहतर कोच और थोड़ से स्थान की जरूरत होगी।
तीरंदाजी दुनिया के सबसे पुराने खेलों में शामिल है। विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

इसका पहला साक्ष्य पुरापाषाण काल में लगभग दस हजार ईसा पूर्व का मिलता है। प्राचीन भारत में तीरंदाजी का उल्लेख दो ग्रंथ रामायण और महाभारत में मिलता है। भगवान राम, भगवान परशुराम, अर्जुन, एकलव्य, कर्ण, भीष्म पितामह द्रोणाचार्य सभी का चित्रण धनुर्धारी के रूप में किया गया है। इसमें महिलाओं का नाम भी शामिल है। देवी दुर्गा को कई हथियारों के साथ दर्शाया जाता है, जिसमें धनुष और बाण भी शामिल हैं।

वायु देव ने उन्हें यह धनुष और बाण प्रदान किया था। महाभारत में भगवान कृष्ण की पत्नी सत्यभामा एक कुशल योद्धा और धनुर्धर थीं। अर्जुन की पत्नियों में से एक चित्रांगदा मणिपुर की राजकुमारी थीं और वह युद्ध कलाओं में बहुत निपुण थीं। उन्होंने तीरंदाजी का गहन प्रशिक्षण लिया था लेकिन वर्तमान में इस खेल के प्रति महिलाओं का रुझान कुछ कम है। भारत की महिला तीरंदाजी टीम को पहली बार वर्ष 2004 के एथेंस ओलिंपिक में देश का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला था।

इस टीम में उनके साथ दो और महिलाएं थी। टीम ने ओलिंपिक में आठवां स्थान प्राप्त किया था जबकि उन्हें व्यक्तिगत स्पर्धा में 20वां स्थान मिला था। उन्होंने कहा कि जिस वक्त में उन्होंने खेल शुरू किया था उस वक्त उतनी सुुविधा नहीं थी। आज सरकार स्कूल स्तर की एक प्रतियोगिता कराने में लाखों रुपये खर्च करती है। बीस साल पहले ओलिंपिक से लौटने के बाद उन्हें पांच हजार रुपये मिले थे। आज सिर्फ ओलिंपिक में सहभागिता पर ही खिलाड़ी को 25 लाख रुपये मिलते हैं।

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इस सुविधा का उपयोग तभी हो पाएगा जब अभिभावक अपनी बेटियों को खेल के लिए प्रेरित करेंगे। तीरंदाजी लड़कियों के लिए बेहतर करियर साबित हो सकता है। इसमें खास कद-काठी की जरूरत नहीं होती। वाराणसी में खेल सुविधाएं बढ़ रही हैं लेकिन विडंबना है कि इसमें तीरंदाजी को स्थान नहीं मिल रहा है। यहां कुछ प्राइवेट एकेडमी को छोड़ दें तो कोई ऐसा मैदान हीं जहां इसका प्रशिक्षण दिया जाता है।

एक संस्था हो बालिकाओं को तीरंदाजी सिखाती है लेकिन उन्हें खिलाड़ी के तौर पर तैयार नहीं करती है। जबकि तीरंदाजी में ओलिंपिक में नौ मेडल हैं। वाराणसी की लड़कियां कुश्ती, जूडो, बाक्सिंग, शूटिंग जैसे खेलों में अपना पराक्रम दिखा रही हैं तो तीरंदाजी को क्यों नहीं अपना रहीं हैं। मैं बरेली की रहने वाली हैं, सोनभद्र के स्पोर्ट्स हास्टल में तीरंदाजी की कोच हूं। मुझे यहां की खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देने का मौका मिलेगा तो अपने अनुभवों का लाभ उन्हें दे सकूंगी।

-लेखिका पूर्व ओलिंपियन वर्तमान में सोनभद्र स्पोर्ट्स हॉस्टल में तीरंदाजी कोच हैं।
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