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इलेक्शन कराने की आड़ में विधायी कार्य नहीं कर सकता चुनाव आयोग, SIR के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दलील

LHC0088 2025-11-28 04:07:34 views 507
  

सुप्रीम कोर्ट।  



डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में कहा कि चुनाव आयोग चुनाव कराने की आड़ में संसद और विधानसभाओं की विशुद्ध रूप से विधायी गतिविधियों को अपने ऊपर नहीं ले सकता। कई राज्यों में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआइआर) के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान उन्होंने यह दलील दी। विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ ने चुनाव आयोग के अधिकारों की विस्तृत जांच की, जबकि अभिषेक सिंघवी और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने तर्क दिया कि चुनाव आयोग अपनी संवैधानिक सीमाओं से बाहर जा रहा है। यह एसआइआर के दौरान नागरिकों पर अनुचित प्रक्रियात्मक बोझ डाल रहा है।

सिंघवी ने कहा कि चुनाव आयोग चुनाव कराने की आड़ में विधायी कार्य नहीं कर सकता। संवैधानिक प्रविधानों के तहत सिर्फ संसद और राज्य विधानसभाएं यह कार्य कर सकती हैं। किसी भी मानक से यह नहीं कहा जा सकता कि चुनाव आयोग संविधान की योजना के अंतर्गत विधायी प्रक्रिया में एक तीसरा सदन है।

केवल संविधान का अंग होने से उसे विधानसभाओं द्वारा बनाए गए कानून का संदर्भ लिए बिना अपनी इच्छा के अनुसार कानून बनाने की पूर्ण शक्ति नहीं मिल जाती है। चुनाव आयोग इसकी आड़ में मूलभूत परिवर्तन कर रहा है।

सिंघवी ने जून 2025 में जारी किए गए एक फार्म पर कड़ी आपत्ति जताई, जिसमें सत्यापन के लिए 11 से 12 विशेष दस्तावेज की आवश्यकता थी। उन्होंने पूछा कि नियमों में यह कहां है? केवल वैधानिक शक्ति से यह फार्म जारी हो सकता है। सिब्बल ने अपनी दलीलें पूरी करते हुए बूथ लेवल अधिकारियों की शक्ति पर सवाल उठाया।

उन्होंने पूछा कि क्या बीएलओ यह तय कर सकता है कि कोई व्यक्ति मानसिक रूप से विक्षिप्त है या नहीं? नागरिकता निर्धारित करने के लिए एक स्कूल शिक्षक को बीएलओ के रूप में तैनात करना एक खतरनाक और अनुचित प्रस्ताव है।

सिब्बल ने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 16 का हवाला देते हुए कहा कि कोई व्यक्ति भारतीय नागरिक है या नहीं, इसका निर्णय गृह मंत्रालय द्वारा किया जाता है। कोई व्यक्ति मानसिक रूप से विक्षिप्त है या नहीं, इसका निर्धारण सक्षम न्यायालय द्वारा किया जाता है। लागू किए जा रहे नियम विदेशी अधिनियम के समान हैं, जहां नागरिकता साबित करने का दायित्व संबंधित व्यक्ति पर है कि वह विदेशी नहीं है।

(समाचार एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ)
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